August 25, 2026 1:05 pm
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आरक्षण विरोध के नाम पर नफ़रत की राजनीति

आरक्षण विरोधी आंदोलन के बीच अजीत भारती पर SC/ST Act में FIR के बाद जातिगत नफरत, हिंसक भाषा और संविधान पर हमलों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

किसका हाथ है अजीत भारती जैसे भोंडे लोगों के पीछे

आरक्षण के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच जातिगत और आपत्तिजनक बयानबाजी ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यूट्यूबर अजीत भारती के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने अनुसूचित जाति समुदाय, सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. बी.आर. आंबेडकर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में FIR दर्ज की है।

आरक्षण का विरोध लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब यह विरोध संविधान, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों के खिलाफ अपमानजनक भाषा, धमकी और हिंसा की संस्कृति में बदलने लगे।

इसी सवाल को लेकर हमारे कार्यक्रम ‘दो टूक’ में चर्चा की गई—क्या आरक्षण विरोध के नाम पर ऐसी भाषा को सामान्य बनाया जा रहा है, जो समाज के कमजोर तबकों को सीधे निशाना बनाती है?

अजीत भारती पर FIR, क्या है मामला?

दिल्ली पुलिस ने अजीत भारती के खिलाफ 22 अगस्त 2026 को प्रसारित एक वीडियो से जुड़े मामले में FIR दर्ज की है। शिकायत में अनुसूचित जाति समुदाय, नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. बी.आर. आंबेडकर को लेकर कथित आपत्तिजनक और जातिसूचक टिप्पणियों के आरोप लगाए गए हैं। मामला नॉर्थ एवेन्यू थाने में दर्ज हुआ है और पुलिस डिजिटल सामग्री की जांच कर रही है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने वीडियो और उसके स्क्रीनशॉट भी पुलिस को उपलब्ध कराए हैं। फिलहाल यह याद रखना जरूरी है कि FIR में लगाए गए आरोप जांच के अधीन हैं और अदालत में आरोप सिद्ध होना अलग कानूनी प्रक्रिया है।

इस मामले ने इसलिए भी व्यापक बहस छेड़ी है क्योंकि भारती आरक्षण-विरोधी अभियान से जुड़े प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में शामिल रहे हैं और हमेशा से सोशल मीडिया पर इतने ही भौंडे व अश्लील हिंसक बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं।

आरक्षण का विरोध या वंचितों के खिलाफ नफरत?

आरक्षण पर असहमति कोई अपराध नहीं है। संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी भी नागरिक को नीतियों की आलोचना करने का अधिकार देती है।

लेकिन आरक्षण की आलोचना और किसी जाति या समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने में स्पष्ट अंतर है।

जब बहस आरक्षण की उपयोगिता से आगे बढ़कर दलितों और वंचित समुदायों को अपमानित करने, महिलाओं के खिलाफ अश्लील भाषा इस्तेमाल करने या सामाजिक रूप से कमजोर तबकों को धमकाने तक पहुंचती है, तब यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं रह जाता।

यह सामाजिक बराबरी और संवैधानिक मूल्यों का सवाल बन जाता है।

जंतर-मंतर पर आरक्षण विरोध और संविधान पर सवाल

21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण विरोधी आंदोलन आयोजित होने की रिपोर्टें सामने आई थीं। इसके कुछ ही दिनों बाद अजीत भारती के खिलाफ FIR की खबर आई।

ऐसे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरक्षण-विरोधी आंदोलन की सार्वजनिक भाषा कैसी हो रही है?

क्या आंदोलन केवल आरक्षण नीति को खत्म करने की मांग तक सीमित है, या इसके भीतर ऐसी आवाजें भी जगह बना रही हैं जो संविधान की उस बुनियादी भावना को चुनौती देती हैं जिसमें समानता और सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान दिया गया है?

यह फर्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरक्षण भारत में केवल रोजगार या शिक्षा की नीति नहीं है। यह सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमानता के जवाब में बनाई गई संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।

सत्ता और राजनीतिक संरक्षण पर सवाल

कार्यक्रम में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि सार्वजनिक मंचों पर किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक या हिंसक भाषा इस्तेमाल होती है तो राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए?

आरक्षण-विरोधी प्रदर्शनों के बीच कुछ राजनीतिक नेताओं की तस्वीरें और बयान सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बने हैं। हालांकि किसी नेता के साथ तस्वीर होना अपने आप में किसी व्यक्ति के कथित बयानों या अपराध का समर्थन साबित नहीं करता। इसलिए राजनीतिक संरक्षण के आरोपों की जांच ठोस प्रमाणों के आधार पर ही होनी चाहिए।

लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग जातिगत नफरत और हिंसक भाषा के खिलाफ कितनी स्पष्टता से खड़े होते हैं।

चिराग पासवान के बयान से भी उठा सवाल

आरक्षण को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर भी अलग-अलग आवाजें सुनाई देती रही हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान आरक्षण और संविधान की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते रहे हैं।

ऐसे में कार्यक्रम में यह सवाल उठाया गया कि यदि सरकार और उसके सहयोगी आरक्षण को खत्म न करने की बात करते हैं, तो आरक्षण विरोध के नाम पर कथित तौर पर दलित-विरोधी या जातिसूचक भाषा इस्तेमाल करने वालों पर कार्रवाई को लेकर भी उतनी ही स्पष्टता क्यों नहीं दिखाई जाती?

यह सवाल केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का नहीं, बल्कि राज्य की समानता और कानून के राज के प्रति प्रतिबद्धता का है।

एक तरफ नफरत के आरोप, दूसरी तरफ स्कूलों की बदहाली दिखाने वालों पर कार्रवाई

इसी कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने वाले युवाओं पर हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया गया।

24 अगस्त की रिपोर्टों के मुताबिक, मेरठ में सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति के वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के मामले में दो युवकों के खिलाफ कार्रवाई की गई। पुलिस और शिक्षा विभाग का पक्ष है कि बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश किया गया और वीडियो के जरिए संस्थान की छवि प्रभावित करने की कोशिश हुई। दूसरी ओर, संबंधित युवकों का कहना है कि वे स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने ला रहे थे।

यहां भी सवाल सिर्फ FIR या गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी संस्थानों की कमियों को उजागर करने वाले पत्रकारों, नागरिकों और एक्टिविस्टों के साथ राज्य का रवैया कैसा होना चाहिए।

अगर किसी ने कानून तोड़ा है तो कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाली सामने लाने वाली पत्रकारिता और सार्वजनिक जवाबदेही को अपराध मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।

मेरठ और देवरिया के मामलों ने बढ़ाई बहस

रिपोर्टों के अनुसार, मेरठ में दो युवकों पर स्कूल परिसर में कथित अनधिकृत प्रवेश के मामले में कार्रवाई हुई, जबकि देवरिया में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति का वीडियो सामने लाने वाले युवक के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

ऐसे मामलों में यह जरूरी है कि पुलिस और प्रशासन अपने पक्ष को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करें और यह स्पष्ट करें कि कार्रवाई किस कानून और किन परिस्थितियों में की गई।

क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही केवल चुनाव के समय नहीं होती। सरकारी स्कूल, अस्पताल, सड़क, राशन व्यवस्था और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति पर सवाल पूछना भी नागरिक अधिकारों और पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

असली सवाल: कानून सबके लिए बराबर है या नहीं?

अजीत भारती के मामले में FIR दर्ज हो चुकी है। अब पुलिस जांच करेगी और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों का क्या आधार है।

लेकिन इस घटना ने उससे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच से किसी जाति या समुदाय के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करता है, तो क्या कानून उसी तरह सक्रिय होगा जैसे किसी दूसरे नागरिक के मामले में?

और यदि सरकारी संस्थानों की कमियां दिखाने वाले युवाओं पर तत्काल पुलिस कार्रवाई होती है, तो जातिगत नफरत और हिंसा भड़काने के आरोपों वाले मामलों में भी क्या वही तत्परता दिखाई जाएगी?

कानून का राज तभी विश्वसनीय होता है जब उसका इस्तेमाल व्यक्ति की राजनीतिक पहचान, जाति या विचारधारा देखकर नहीं, बल्कि समान कानूनी मानकों के आधार पर हो।

आरक्षण की बहस हो, लेकिन संविधान की कीमत पर नहीं

भारत में आरक्षण पर बहस होनी चाहिए। इसकी समीक्षा, प्रभावशीलता, लाभार्थियों और नीतिगत ढांचे पर सवाल भी उठने चाहिए।

लेकिन यह बहस तथ्यों और तर्क के आधार पर होनी चाहिए—गाली, जातिगत अपमान, महिलाओं के खिलाफ अश्लील भाषा या हिंसा की धमकी के आधार पर नहीं।

संविधान ने सामाजिक न्याय को लोकतांत्रिक भारत की बुनियाद का हिस्सा बनाया है। इसलिए आरक्षण पर असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए भी दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों के खिलाफ नफरत को सामान्य बनाने की कोशिश का विरोध करना जरूरी है।

सवाल आखिरकार यही है: क्या आरक्षण पर बहस संविधान के दायरे में होगी या सामाजिक नफरत को राजनीतिक हथियार बनाकर?

यह फैसला सिर्फ सरकारों या राजनीतिक दलों का नहीं है। यह समाज और नागरिकों के सामने भी एक बड़ी जिम्मेदारी है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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