August 23, 2026 11:48 pm
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अब उत्तराखंड में भी BJP का खेला, मुसलमान वोटरों का नाम कटवाने की खुली साज़िश!

उत्तराखंड में SIR के दौरान वोटर लिस्ट से नाम हटाने की बड़ी संख्या में आपत्तियों पर सवाल उठ रहे हैं। किच्छा में 4,857 में से 4,855 आपत्तियां एक व्यक्ति ने दर्ज कीं। काजी निजामुद्दीन ने भी SIR नोटिस पर सवाल उठाए हैं।

SIR के दौरान वोट कटने पर सवाल: किच्छा में 4,857 आपत्तियां, 4,855 एक ही व्यक्ति की

उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल की गई हैं और इनमें एक खास पैटर्न दिखाई देता है। न्यूज़लॉन्ड्री की पड़ताल के मुताबिक, राज्य की पांच विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा आपत्तियां दाखिल करने वाले पांच लोग बीजेपी से जुड़े बताए गए हैं। इनमें से चार सीटों पर जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई, वे सभी मुस्लिम बताए गए हैं।

हालांकि, किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज होना अपने आप में उसका नाम वोटर लिस्ट से हट जाना नहीं है। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक आपत्तियों की जांच, फील्ड वेरिफिकेशन और संबंधित मतदाता को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही अंतिम फैसला किया जाना है।

किच्छा में 4,857 आपत्तियां, 4,855 एक ही व्यक्ति की

सबसे ज्यादा सवाल ऊधम सिंह नगर जिले की किच्छा विधानसभा सीट को लेकर उठ रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यहां मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कुल 4,857 आपत्तियां दाखिल की गईं। इनमें से 4,855 आपत्तियां अकेले राजेश तिवारी नाम के व्यक्ति ने दाखिल कीं। रिपोर्टों में तिवारी को बीजेपी का बूथ लेवल एजेंट बताया गया है।

इन आपत्तियों में शामिल मतदाताओं के नामों को लेकर भी सवाल उठे हैं। न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार किच्छा में राजेश तिवारी द्वारा जिन नामों को हटाने की मांग की गई, वे सभी मुस्लिम मतदाताओं के नाम थे। अधिकांश आवेदनों में वजह ‘पहले से ही नामांकित’ बताई गई, जबकि कुछ मामलों में मतदाता के दूसरी जगह शिफ्ट होने का उल्लेख था।

किच्छा में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 28.4 फीसदी बताई गई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ ने बीजेपी के तत्कालीन विधायक राजेश शुक्ला को 10 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया था।

बीजेपी के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की ओर से यह दावा किया गया है कि पार्टी की बूथ स्तर की आंतरिक जांच में किच्छा में 8 हजार से ज्यादा ऐसे मतदाताओं के नाम मिले, जो उत्तर प्रदेश के बरेली, पीलीभीत और रामपुर की मतदाता सूचियों में भी दर्ज बताए गए। ऐसे दावों की अंतिम पुष्टि चुनाव आयोग की जांच के बाद ही हो सकती है।

खटीमा, गदरपुर और रुद्रपुर में भी बड़ी संख्या में आपत्तियां

किच्छा अकेला मामला नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक गदरपुर विधानसभा सीट पर 1,370 आपत्तियों में से 670 एक व्यक्ति ने दाखिल कीं। उन्हें बीजेपी का बूथ लेवल एजेंट बताया गया है। वहीं खटीमा में 394 आपत्तियों में से 392 एक ही व्यक्ति, अमित कुमार पांडे, द्वारा दाखिल किए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों में पांडे को बीजेपी के जिला उपाध्यक्ष और बूथ लेवल एजेंट के तौर पर बताया गया है।

रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में भी कुल 2,818 आवेदन दाखिल होने की रिपोर्ट है। इनमें बीजेपी एससी मोर्चा के शहर महासचिव और बीएलए सनी पासवान की ओर से 230 नामों पर आपत्ति दर्ज कराने की बात सामने आई है।

इस पैटर्न ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या SIR के दौरान मतदाता सूची में गड़बड़ियों की पहचान करने की प्रक्रिया का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नामों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जा रहा है।

क्या SIR में एक व्यक्ति बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल कर सकता है?

यही इस विवाद का एक अहम पहलू है। न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट मैनुअल में बूथ लेवल एजेंट के लिए एक दिन में 10 से अधिक आवेदन दाखिल करने की सीमा का प्रावधान था। बाद में कुछ राज्यों में यह सीमा बढ़ाकर 50 आवेदन प्रतिदिन की गई। इस साल जनवरी में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजे गए एक पत्र में इस सीमा को हटाए जाने का उल्लेख सामने आया।

उत्तराखंड में अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां आने पर क्रॉस-वेरिफिकेशन जरूरी है। चुनाव प्रक्रिया में आपत्ति दर्ज होने के बाद संबंधित मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और दस्तावेज देने का अवसर दिया जाता है।

इसलिए बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि कितनी आपत्तियां दाखिल हुईं, बल्कि यह भी है कि इन आपत्तियों की स्वतंत्र जांच कैसे हुई और कितने मामलों में लगाए गए आरोप सही पाए गए।

मंगलौर विधायक काजी निजामुद्दीन को भी SIR नोटिस

SIR को लेकर विवाद अब जनप्रतिनिधियों तक पहुंच गया है। मंगलौर से कांग्रेस नेता काजी मोहम्मद निजामुद्दीन ने चुनाव आयोग की ओर से मिले नोटिस पर सवाल उठाया है।

निजामुद्दीन के मुताबिक उन्हें नोटिस में यह आधार बताया गया कि उनकी और उनके माता-पिता की उम्र के बीच 15 साल से कम का अंतर है। उनका कहना है कि 2003 की मतदाता सूची में उनके पिता की उम्र 63 साल, मां की उम्र 50 साल और उनकी अपनी उम्र 27 साल दर्ज थी। उनके अनुसार ये पुराने रिकॉर्ड खुद चुनाव आयोग की मतदाता सूची का हिस्सा हैं।

निजामुद्दीन का सवाल है कि जब 2003 की मतदाता सूची में उम्र संबंधी रिकॉर्ड पहले से मौजूद हैं, तो वर्तमान SIR प्रक्रिया में उन्हें नोटिस जारी करने का आधार क्या है।

उन्होंने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि नोटिस जारी करने के लिए इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड और गणना का आधार क्या है।

SIR पर सवाल, लेकिन अंतिम वोट कटने से पहले जांच जरूरी

उत्तराखंड में SIR को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में आपत्तियों और कथित फर्जी शिकायतों पर चिंता जताई है। दूसरी ओर बीजेपी का कहना है कि यदि किसी मतदाता का नाम एक से ज्यादा जगह दर्ज है या वह गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल है तो उसके खिलाफ आपत्ति दर्ज करना वैध प्रक्रिया है। बीजेपी ने यह भी कहा है कि आपत्ति दर्ज होने का मतलब यह नहीं कि संबंधित मतदाता का नाम स्वतः काट दिया जाएगा।

चुनाव आयोग की प्रक्रिया में भी आपत्ति के बाद जांच और सुनवाई का प्रावधान है। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर SIR 2026 के तहत 2003 की मतदाता सूची, ड्राफ्ट रोल और अनुपस्थित/स्थानांतरित/मृत मतदाताओं की सूची समेत संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई गई है।

यही वजह है कि उत्तराखंड में SIR को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मतदाता सूची को साफ करने की प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से चल रही है, या बड़ी संख्या में आपत्तियों के जरिए कुछ खास इलाकों और समुदायों के मतदाताओं पर असामान्य दबाव बनाया जा रहा है?

इसका निर्णायक जवाब आपत्तियों की जांच, फील्ड वेरिफिकेशन और अंतिम मतदाता सूची सामने आने के बाद ही मिलेगा। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े इतना जरूर दिखाते हैं कि किच्छा समेत कुछ विधानसभा क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति द्वारा असाधारण रूप से बड़ी संख्या में नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल की गई हैं। इन मामलों में पारदर्शी जांच और सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए गए नतीजे ही यह तय करेंगे कि ये आपत्तियां वास्तविक डुप्लीकेट/स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान का हिस्सा थीं या मतदाता सूची से वैध नाम हटाने का प्रयास।

मुकुल सरल

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