September 4, 2026 3:41 am
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GDP के नंबर में भी घोटाला करके जनता को मूर्ख बना रही मोदी सरकार?

भारत की GDP ग्रोथ 7.8% पहुंची, लेकिन सुभाष चंद्र गर्ग और रघुराम राजन ने आंकड़ों और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाए। जानिए पूरा विवाद।

जीडीपी 7.8% बढ़ा या फिर 2.6%? सुभाष चंद्र गर्ग से लेकर रघुराम राजन तक ने उठाए सवाल

भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में 7.8 फीसदी की GDP ग्रोथ दर्ज की है। सरकार के लिए यह आंकड़ा आर्थिक मजबूती और विकास की रफ्तार का बड़ा संकेत है। यह वृद्धि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 7 फीसदी के अनुमान से भी अधिक है।

लेकिन इसी 7.8 फीसदी के आंकड़े ने एक बड़ा आर्थिक और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग, पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन और विपक्ष समेत कई आवाजों ने GDP के आंकड़ों, उनकी गणना और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाए हैं। सरकार और सांख्यिकी मंत्रालय ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आलोचना पुरानी और नई GDP सीरीज के आंकड़ों की तुलना पर आधारित है।

7.8 फीसदी GDP ग्रोथ की कहानी क्या है?

31 अगस्त 2026 को जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 फीसदी रही। पिछले साल इसी तिमाही के लिए नई GDP सीरीज के तहत वृद्धि दर 6.9 फीसदी बताई गई है।

नई GDP सीरीज में बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है। सरकार का कहना है कि नई सीरीज में बेहतर और अधिक विस्तृत आंकड़ों तथा नई कीमत संबंधी पद्धतियों को शामिल किया गया है।

यहीं से विवाद शुरू होता है।

सुभाष चंद्र गर्ग का सवाल: पिछले साल के आंकड़े में इतनी बड़ी कमी क्यों?

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के नए आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पिछले साल की पहली तिमाही की मौजूदा कीमतों पर GDP करीब 86 लाख करोड़ रुपये बताई गई थी, जिसे नई सीरीज में लगभग 80 लाख करोड़ रुपये किया गया।

गर्ग के तर्क के मुताबिक अगर पिछले साल के आंकड़े को इस तरह नीचे नहीं किया जाता तो मौजूदा कीमतों पर GDP वृद्धि करीब 2.6 फीसदी के आसपास दिखाई देती।

उनका कहना है कि headline GDP growth 7.8 फीसदी दिख रही है, लेकिन आंकड़ों के पीछे इस्तेमाल किए गए आधार को समझना जरूरी है।

यानी विवाद इस बात पर है कि क्या पिछले साल के GDP बेस में बदलाव ने इस साल की वृद्धि दर को असामान्य रूप से ज्यादा दिखाया है।

सरकार का जवाब: यह ‘हेराफेरी’ नहीं, नई GDP सीरीज है

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने इन आरोपों को खारिज किया है। मंत्रालय का कहना है कि 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पुरानी 2011-12 बेस वाली GDP सीरीज का था, जबकि मौजूदा आंकड़े 2022-23 बेस वाली नई सीरीज से निकाले गए हैं।

मंत्रालय के मुताबिक पुरानी सीरीज के आंकड़े और नई सीरीज के आंकड़ों को सीधे आपस में तुलना करना उचित नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि पिछले आंकड़ों में संशोधन बेहतर डेटा, नई पद्धति और सामान्य सांख्यिकीय प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि GDP ग्रोथ को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की कोशिश।

सांख्यिकी मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने भी कहा है कि 7.8 फीसदी की वृद्धि दर पर सवाल उठाने के लिए जिस तुलना का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह अलग-अलग GDP सीरीज के आंकड़ों को मिला रही है। उनके अनुसार वास्तविक GDP ग्रोथ की तुलना constant prices पर की जानी चाहिए।

फिर सवाल यह है कि 7.8 फीसदी की ग्रोथ आम आदमी को क्यों महसूस नहीं होती?

यही सवाल पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन ने भी उठाया है।

राजन ने GDP के आंकड़ों और अर्थव्यवस्था की जमीनी स्थिति के बीच संभावित अंतर की ओर इशारा करते हुए पूछा कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रही है तो पर्याप्त और अच्छी नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही हैं।

उन्होंने निवेश को भी महत्वपूर्ण संकेतक बताया। उनका सवाल है कि अगर आर्थिक गतिविधियां इतनी मजबूत हैं तो निजी क्षेत्र का निवेश अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं दिखाई देता और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर भी चिंता क्यों बनी हुई है।

यानी बहस सिर्फ GDP के एक आंकड़े की नहीं है। असली सवाल यह है कि GDP की तेज रफ्तार का फायदा रोजगार, आय, निवेश और उपभोग में कितना दिखाई दे रहा है।

GDP बढ़ी, लेकिन रोजगार का सवाल बरकरार

GDP किसी देश में पैदा होने वाली वस्तुओं और सेवाओं के कुल आर्थिक मूल्य को मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना है। लेकिन GDP बढ़ना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हर नागरिक की आय या रोजगार उसी अनुपात में बढ़ रहा है।

यही वजह है कि 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ के साथ रोजगार का सवाल भी बहस के केंद्र में आ गया है।

आलोचकों का तर्क है कि भारत को केवल headline growth पर ध्यान देने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि कितनी नई नौकरियां पैदा हो रही हैं, निजी निवेश कितना बढ़ रहा है और घरेलू मांग किस स्थिति में है।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि GDP के ताजा आंकड़े अर्थव्यवस्था की मजबूत गति को दिखाते हैं और इन आंकड़ों को लेकर उठाए जा रहे सवाल नई GDP सीरीज को पुरानी सीरीज से गलत तरीके से तुलना करने का नतीजा हैं।

क्या 7.8 फीसदी GDP का मतलब ‘अर्थव्यवस्था में सब ठीक’ है?

जरूरी नहीं।

GDP ग्रोथ मजबूत होना निश्चित तौर पर सकारात्मक संकेत है। लेकिन अर्थव्यवस्था का आकलन केवल एक आंकड़े से नहीं किया जा सकता।

रोजगार, वास्तविक मजदूरी, निजी निवेश, घरेलू खपत, महंगाई, निर्यात, विदेशी निवेश और अलग-अलग आय वर्गों की आर्थिक स्थिति जैसे कई संकेतकों को साथ देखकर ही यह समझा जा सकता है कि विकास कितना व्यापक और टिकाऊ है।

यही वह जगह है जहां सुभाष चंद्र गर्ग और रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्रियों के सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

आंकड़ों की लड़ाई से आगे असली सवाल

7.8 फीसदी GDP ग्रोथ भारत की आर्थिक क्षमता की मजबूत तस्वीर पेश करती है। लेकिन इसके साथ उठ रहे सवालों को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज करना भी पर्याप्त नहीं होगा।

नई GDP सीरीज में बेस ईयर बदलने और आंकड़ों के संशोधन की प्रक्रिया को लेकर सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। दूसरी तरफ आलोचकों का सवाल है कि headline growth और आम नागरिक के अनुभव के बीच अंतर क्यों दिखाई देता है।

इसलिए असली बहस शायद यह नहीं है कि GDP 7.8 फीसदी है या 2.6 फीसदी।

असली सवाल यह है कि क्या भारत की आर्थिक वृद्धि पर्याप्त रोजगार पैदा कर रही है, क्या निजी निवेश बढ़ रहा है, क्या लोगों की क्रय शक्ति मजबूत हो रही है और क्या विकास का लाभ व्यापक आबादी तक पहुंच रहा है?

क्योंकि आंकड़ों में दर्ज विकास तभी वास्तविक आर्थिक बदलाव माना जाएगा, जब उसका असर लोगों की जेब, नौकरी, कारोबार और भविष्य की उम्मीदों में भी दिखाई दे।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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