दिल्ली में पीड़ितों की गवाही ने उठाए सवाल: ‘आज भी शुष्क शौचालय साफ कर रहे हैं’
देश से मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म होने के सरकारी दावे के बीच दिल्ली में उन लोगों की गवाही सामने आई है, जो आज भी इंसानी मल को हाथ से उठाने और सूखे शौचालय साफ करने के काम में लगे होने का दावा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से दिल्ली पहुंचे इन लोगों ने कहा कि कानून बनने और सरकारी योजनाओं के बावजूद जाति, छुआछूत, गरीबी और सामाजिक बहिष्कार उन्हें इस अमानवीय काम से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं।
यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में संसद में कहा था कि 2024-25 में देश के सभी जिलों में किए गए ताजा सर्वे में एक भी मैनुअल स्कैवेंजर नहीं मिला। सरकार के मुताबिक, 2013 और 2018 के सर्वे में कुल 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान हुई थी और सभी को 40 हजार रुपये की एकमुश्त सहायता दी जा चुकी है। सरकार ने यह भी बताया कि 2023-24 से 2025-26 के बीच 5,632 लोगों और उनके आश्रितों को कौशल प्रशिक्षण तथा 483 लाभार्थियों को पूंजीगत सब्सिडी दी गई।
लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन ने सरकार के इस दावे को चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कम-से-कम 46 जिलों में आज भी सूखे शौचालयों से मानव मल उठाने की प्रथा मौजूद है। संगठन ने ऐसी तस्वीरों और प्रभावित लोगों की गवाही होने का दावा किया है और सरकार से इन इलाकों में दोबारा सर्वे कराकर कार्रवाई की मांग की है।
‘सरकार कहती है मैला ढोने वाला कोई नहीं, हम अपनी गवाही लेकर आए हैं’
दिल्ली पहुंचे सफाईकर्मियों और उनके परिवारों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की हकीकत के बीच बड़ा अंतर है। कार्यक्रम में शिरकत करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस सुधांशु धूलिया और बिहार हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश थे। बड़ी संख्या में सिविल सोसायटी के लोग इन गवाहियों को सुनने के लिए मौजूद रहे।
कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने बताया कि उन्हें आज भी घरों में बने सूखे शौचालय साफ करने पड़ते हैं। इसके बदले कई जगह 50 रुपये, कहीं 100 रुपये और कहीं 200 रुपये तक महीने में मिलते हैं। कुछ महिलाओं ने बताया कि उम्र 60-65 वर्ष तक पहुंच जाने के बावजूद वे यह काम करने को मजबूर हैं।
एक महिला ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मैला उठाते हुए गुजार दी, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उनके बच्चों का है—क्या अगली पीढ़ी भी यही काम करेगी?
उनकी चिंता सिर्फ रोजगार की नहीं है। उनके मुताबिक, इस काम के कारण परिवारों को सामाजिक बहिष्कार और छुआछूत का सामना करना पड़ता है। बच्चों तक को स्कूल में भेदभाव झेलना पड़ता है।
‘मेरे बच्चे यह काम न करें’
जम्मू-कश्मीर से पहुंचे एक युवक ने बताया कि उसके परिवार में कई पीढ़ियों से यह काम होता आया है। उसका कहना था कि वह इस पहचान से बाहर निकलना चाहता है और नहीं चाहता कि उसका बच्चा भी मैनुअल स्कैवेंजिंग करे।
यही बात बिहार और उत्तर प्रदेश से आई महिलाओं ने भी कही। उनका कहना था कि वे इस काम को छोड़ना चाहती हैं, लेकिन उनके पास वैकल्पिक रोजगार, जमीन या पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं।
कई लोगों ने बताया कि गरीबी उन्हें ऐसे काम स्वीकार करने के लिए मजबूर करती है जिसे कानून पहले ही प्रतिबंधित कर चुका है।
कानून में रोक, फिर भी सवाल बरकरार
भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक कोई नई बात नहीं है। 1993 में कानून बनाया गया था और इसके बाद Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 लागू हुआ। इस कानून का उद्देश्य मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक लगाने के साथ-साथ इससे जुड़े लोगों और उनके परिवारों का पुनर्वास करना है। कानून में अस्वास्थ्यकर शौचालयों की पहचान, उन्हें बदलने, मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान और उनके पुनर्वास के प्रावधान हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर सरकारों की जवाबदेही तय कर चुका है। 27 मार्च 2014 के Safai Karamchari Andolan बनाम Union of India फैसले में अदालत ने मैनुअल स्कैवेंजर्स के पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा, आवास और वैकल्पिक आजीविका जैसे कदमों के निर्देश दिए थे। अदालत ने सीवर और मैनहोल की सफाई के दौरान मौत के मामलों में आश्रित परिवारों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया था।
इसके बाद 20 अक्टूबर 2023 के डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग को पूरी तरह खत्म करना और पुनर्वास सुनिश्चित करना सरकारों की जिम्मेदारी है। अदालत ने सर्वे, मशीनीकरण और सुरक्षित सफाई व्यवस्था पर भी जोर दिया।
2024-25 का सरकारी सर्वे बनाम जमीन पर सामने आई गवाही
यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।
केंद्र सरकार का कहना है कि 2024-25 के राष्ट्रव्यापी सर्वे में किसी भी जिले में मैनुअल स्कैवेंजर नहीं मिला और सभी जिलों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजिंग मुक्त घोषित किया है।
दूसरी तरफ, सफाई कर्मचारी आंदोलन का दावा है कि सिर्फ सरकारी सर्वे के आधार पर इस प्रथा के खत्म होने की घोषणा नहीं की जा सकती। संगठन ने चार राज्यों के प्रभावित लोगों को दिल्ली बुलाकर उनकी गवाही सामने रखी है। संगठन के मुताबिक उसके पास कई इलाकों में सूखे शौचालयों और मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़ी तस्वीरें भी हैं।
यह विरोधाभास अपने आप में एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या सरकारी सर्वे में वे सभी लोग और परिवार शामिल हो पा रहे हैं जो सामाजिक दबाव, डर, गरीबी या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण खुद को मैनुअल स्कैवेंजर के रूप में दर्ज नहीं करा पाते?
‘एक तरफ कहते हैं काम खत्म हो गया, दूसरी तरफ लोग आज भी कर रहे हैं’
दिल्ली में सामने आई गवाहियों में सिर्फ काम की मजबूरी नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव का भी जिक्र हुआ।
कुछ महिलाओं ने बताया कि उनके साथ सामान्य सामाजिक व्यवहार नहीं किया जाता। पानी और भोजन देने तक में भेदभाव किया जाता है। बच्चों को भी इस पहचान का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
यानी समस्या केवल एक पेशे की नहीं है। यह उस सामाजिक व्यवस्था की भी कहानी है जिसमें एक खास समुदाय को पीढ़ियों से सफाई और मानव मल उठाने जैसे काम से जोड़ दिया गया।
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी मैनुअल स्कैवेंजिंग को जाति व्यवस्था और छुआछूत से जुड़ी सामाजिक समस्या के संदर्भ में रेखांकित किया था।
‘इंडिया@80’ के तहत आंदोलन की नई घोषणा
दिल्ली के कार्यक्रम में सफाई कर्मचारी आंदोलन ने ‘India@80’ अभियान की घोषणा की। संगठन के मुताबिक अगले एक साल में चार राज्यों के उन जिलों में अभियान चलाया जाएगा जहां उसके अनुसार आज भी मैनुअल स्कैवेंजिंग मौजूद है।
संगठन का कहना है कि उसका लक्ष्य सिर्फ लोगों को इस काम से बाहर निकालना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मानजनक और स्थायी वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराना भी है।
आंदोलन की मांग है कि सरकार प्रभावित परिवारों का व्यापक और पारदर्शी सर्वे कराए, उन्हें पुनर्वास का पूरा लाभ दे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी परिवार को जीविका के लिए दोबारा इस काम में लौटना न पड़े।
सिर्फ पुनर्वास नहीं, सामाजिक बराबरी भी जरूरी
कार्यक्रम में बोलने वाले वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि केवल आर्थिक सहायता से समस्या खत्म नहीं होगी।
अगर कोई महिला मैनुअल स्कैवेंजिंग छोड़ भी देती है, लेकिन समाज उसे बराबरी का दर्जा नहीं देता, उसके बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव होता है या उसके परिवार को पानी और भोजन तक में छुआछूत झेलनी पड़ती है, तो पुनर्वास अधूरा रह जाएगा।
इसलिए सवाल सरकार से जितना है, उतना ही समाज से भी है।
मैनुअल स्कैवेंजिंग कानूनन प्रतिबंधित है। लेकिन कानून का उद्देश्य सिर्फ किसी व्यक्ति के हाथ से टोकरी छीन लेना नहीं है। असली उद्देश्य उसे ऐसी जिंदगी देना है जिसमें उसे दोबारा वही काम करने की मजबूरी न हो।
असली चुनौती सरकारी आंकड़े और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी
सरकार के मुताबिक देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म हो चुकी है और 2024-25 के सर्वे में किसी जिले में मैनुअल स्कैवेंजर नहीं मिला। दूसरी तरफ, सफाई कर्मचारी आंदोलन प्रभावित लोगों की गवाही और अपने पास मौजूद साक्ष्यों के आधार पर इसके जारी रहने का दावा कर रहा है।
इस विरोधाभास का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि स्वतंत्र, पारदर्शी और दोबारा सत्यापित सर्वे से निकल सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन लोगों ने दिल्ली आकर अपनी गवाही दी है, उनकी शिकायतों और दावों की जांच कौन करेगा?
अगर वे गलत हैं तो सरकारी सर्वे की विश्वसनीयता के लिए इसकी पुष्टि होनी चाहिए। और अगर उनकी गवाही सही है, तो यह सिर्फ आंकड़ों की गलती नहीं बल्कि कानून, प्रशासन और पुनर्वास व्यवस्था की गंभीर विफलता होगी।
क्योंकि जिस दिन देश में किसी व्यक्ति को इंसानी मल अपने हाथों से उठाकर जीविका कमाने की मजबूरी नहीं होगी, उसी दिन मैनुअल स्कैवेंजिंग के खिलाफ दशकों से चल रही लड़ाई वास्तव में अपने मुकाम तक पहुंचेगी।
