September 7, 2026 1:18 am
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फर्ज़ी राजनीतिक दलों को करोड़ों का चंदा, क्या भाजपा की बल्ले-बल्ले!

BBC की पड़ताल में गुजरात की छह Registered Unrecognised Political Parties को 2023-24 में करीब ₹1,700 करोड़ चंदा मिलने का खुलासा हुआ। आम जनमत पार्टी को ₹620 करोड़ मिले, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार उतरा।

बीबीसी पड़ताल: गुजरात की छह छोटी राजनीतिक पार्टियों को 1,700 करोड़ का चंदा, चुनाव में उतारे सिर्फ 15 उम्मीदवार

क्या भारत में राजनीतिक फंडिंग का ऐसा मॉडल विकसित हो रहा है, जिसमें ऐसी छोटी राजनीतिक पार्टियां बड़ी रकम का चंदा हासिल कर रही हैं, लेकिन चुनावी मैदान में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित है? BBC News Hindi की एक नई पड़ताल ने इस सवाल को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

BBC की पत्रकार शुभांगी मिश्रा की पड़ताल में गुजरात से जुड़ी छह Registered Unrecognised Political Parties (RUPPs) का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023-24 में इन छह पार्टियों को कुल करीब 1,700 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसी अवधि में पांच राष्ट्रीय पार्टियों—कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, CPI(M) और नेशनल पीपुल्स पार्टी—को मिलाकर करीब 1,480 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। इस तुलना में BJP शामिल नहीं थी।

सबसे ज्यादा चंदा पाने वाली पार्टी आम जनमत पार्टी रही। BBC की रिपोर्ट के अनुसार उसे 2023-24 में करीब 620 करोड़ रुपये मिले। इसके मुकाबले कांग्रेस को इसी वित्त वर्ष में करीब 281 करोड़ रुपये का चंदा मिला। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में आम जनमत पार्टी ने सिर्फ एक उम्मीदवार मैदान में उतारा।

छह पार्टियां, 1,700 करोड़ रुपये और सिर्फ 15 उम्मीदवार

BBC की पड़ताल में जिन छह पार्टियों का जिक्र है, वे हैं—

  • आम जनमत पार्टी
  • भारतीय नेशनल जनता दल
  • गरीब कल्याण पार्टी
  • न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी
  • सत्यवादी रक्षक पार्टी
  • स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी

इन छह पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर केवल 15 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से चार पार्टियों का पता अहमदाबाद के नरोदा इलाके से जुड़ा बताया गया है।

यहीं से सवाल उठता है कि इतनी बड़ी रकम हासिल करने वाली राजनीतिक पार्टियों की चुनावी गतिविधियां इतनी सीमित क्यों रहीं?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर आयकर कानून के तहत कई तरह की छूट और सुविधाएं लागू होती हैं। BBC की रिपोर्ट ने यह भी बताया कि आयकर विभाग ने कुछ चंदों की जांच की थी और कुछ मामलों में दान देने वालों से टैक्स की वसूली भी हुई। हालांकि BBC ने इन छह पार्टियों पर किसी अवैध वित्तीय गतिविधि का आरोप नहीं लगाया है।

आम जनमत पार्टी की कहानी सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है

आम जनमत पार्टी का मामला इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है।

चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक पार्टी को 2022-23 में करीब 216 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। अगले वित्त वर्ष यानी 2023-24 में यह रकम बढ़कर करीब 620 करोड़ रुपये हो गई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने केवल एक उम्मीदवार उतारा।

BBC ने पार्टी की पृष्ठभूमि और उसके पदाधिकारियों की भी पड़ताल की। पार्टी की स्थापना 2020 में पटना में हुई थी। इसकी संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान ने BBC को बताया कि उन्होंने 2022 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद पार्टी का बेस गुजरात के अहमदाबाद में स्थानांतरित हो गया।

वर्तमान में पार्टी की वेबसाइट पर गौरव मिश्रा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है और अहमदाबाद का पता दिया गया है।

सवाल सिर्फ छह पार्टियों का नहीं है

BBC की पड़ताल से पहले अगस्त 2025 में दैनिक भास्कर ने गुजरात की दस ऐसी राजनीतिक पार्टियों की वित्तीय गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019-20 से 2023-24 के बीच इन दस पार्टियों को करीब 4,300 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इस अवधि में गुजरात में हुए तीन प्रमुख चुनावों—2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव—में इन पार्टियों ने कुल 43 उम्मीदवार उतारे और उन्हें कुल 54,069 वोट मिले।

रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण बिंदु चुनावी खर्च और ऑडिट रिपोर्ट के बीच अंतर से जुड़ा था। दैनिक भास्कर के अनुसार इन पार्टियों ने चुनावी रिपोर्टों में कुल करीब 39.02 लाख रुपये का खर्च बताया, जबकि उनकी ऑडिट रिपोर्टों में करीब 3,500 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज था।

BBC की रिपोर्ट में शामिल छह पार्टियों में से पांच का नाम दैनिक भास्कर की पिछली पड़ताल में भी आया था। इस तरह दोनों रिपोर्टों को साथ पढ़ने पर गुजरात में छोटी, Registered Unrecognised Political Parties और उनके वित्तीय रिकॉर्ड को लेकर एक बड़ा सवाल सामने आता है।

क्या यह BJP से जुड़ा कोई फंडिंग मॉडल है?

यहीं इस पूरी कहानी का सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील पहलू शुरू होता है।

सोशल मीडिया और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में इन पार्टियों को BJP से जोड़कर कई दावे किए जा रहे हैं। खासकर आम जनमत पार्टी की पूर्व अध्यक्ष अनामिका पासवान के BJP की बिहार इकाई में पद पर होने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। BBC की रिपोर्ट में भी इस संबंध का उल्लेख है।

लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा।

BBC की पड़ताल यह साबित नहीं करती कि इन छह पार्टियों को मिला पैसा BJP का पैसा था, या कि इन पार्टियों का इस्तेमाल BJP की चुनावी फंडिंग या money laundering के लिए किया गया। उपलब्ध रिपोर्ट में ऐसा कोई निर्णायक सबूत पेश नहीं किया गया है।

इसलिए इस मामले को सीधे “BJP का money laundering racket” कहना फिलहाल उपलब्ध प्रमाणों से आगे जाना होगा।

लेकिन इससे मूल सवाल खत्म नहीं होता।

अगर कोई राजनीतिक पार्टी करोड़ों रुपये का चंदा हासिल करती है और उसके चुनावी प्रदर्शन तथा संगठनात्मक गतिविधियां बेहद सीमित हैं, तो उसके दानदाताओं, खर्च, बैंक खातों, ऑडिट और राजनीतिक गतिविधियों की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?

Registered Unrecognised Political Party क्या होती है?

RUPP यानी Registered Unrecognised Political Party ऐसी राजनीतिक पार्टी होती है जो चुनाव आयोग के पास पंजीकृत तो है, लेकिन उसे अभी राष्ट्रीय या राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं हुई है।

भारत में ऐसी पार्टियों की संख्या बहुत बड़ी है। ADR के आंकड़ों में हजारों Registered Unrecognised Political Parties का रिकॉर्ड मौजूद है। ऐसे दलों की वित्तीय रिपोर्ट और चंदे की पारदर्शिता इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जनता के सामने उनका राजनीतिक और चुनावी प्रदर्शन अक्सर सीमित रहता है।

यही वजह है कि BBC की पड़ताल सिर्फ छह पार्टियों की कहानी नहीं रह जाती। यह भारत में राजनीतिक दलों के पंजीकरण, चंदा व्यवस्था, टैक्स छूट, ऑडिट और चुनावी पारदर्शिता की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है।

और फिर आता है चुनावी लोकतंत्र का बड़ा सवाल

लोकतंत्र में राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव लड़ने वाली संस्थाएं नहीं हैं। वे जनता और सत्ता के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

ऐसे में यदि किसी पार्टी के पास सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा हो, लेकिन उसके उम्मीदवार नगण्य हों और उसकी जमीनी राजनीतिक गतिविधियां दिखाई न दें, तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहां से आया और कहां गया।

इसीलिए इस पूरे मामले में सबसे जरूरी सवाल किसी एक पार्टी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

चुनाव आयोग, आयकर विभाग और संबंधित नियामक संस्थाओं से यह पूछा जाना चाहिए कि—

इतना बड़ा चंदा किन लोगों और कंपनियों ने दिया?

यह पैसा किस उद्देश्य से दिया गया?

इन पार्टियों ने इसे कहां खर्च किया?

ऑडिट रिपोर्ट और चुनावी खर्च के आंकड़ों में अंतर क्यों है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या भारत की मौजूदा राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था ऐसी पार्टियों के लिए पारदर्शिता से बच निकलने की गुंजाइश छोड़ती है?

BBC की पड़ताल ने इन सवालों को सामने ला दिया है। अब इनका जवाब जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलना बाकी है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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