September 10, 2026 11:23 pm
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नीशु आजाद के उत्पीड़न पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नीशु आजाद और परिवार को कथित धमकियों व उत्पीड़न पर सुप्रीम कोर्ट सख्त। अदालत ने सुरक्षा और पुलिस कार्रवाई पर सरकार से जवाब मांगा।

नाबालिग छात्रा और परिवार की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलनों में हिस्सा लेने वाली नाबालिग दलित छात्रा नीशु आजाद और उनके परिवार को कथित धमकियों, ऑनलाइन उत्पीड़न और डराने-धमकाने के आरोपों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मामले पर गंभीर चिंता जताई। तीन जजों की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा वी. मोहना शामिल थे, ने छात्रा और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने सवाल उठाया कि यदि ऐसी धमकियों के बीच छात्रा या उसके परिवार के साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी।

यह मामला केवल एक छात्रा की सुरक्षा का सवाल नहीं रह गया है। इसके केंद्र में अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, जातिगत भेदभाव और सोशल मीडिया के जरिए महिलाओं तथा नाबालिगों को निशाना बनाने की गंभीर चुनौती भी है।

जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ विवाद

नीशु आजाद 2026 में जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान चर्चा में आईं। इन प्रदर्शनों में छात्रों ने NEET प्रश्नपत्र लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाया था। प्रदर्शन के दौरान उनके पिता संजय आजाद के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया, जिसके बाद विवाद और गहरा गया।

मामले में स्वतंत्र भारद्वाज पर संजय आजाद के साथ मारपीट करने का आरोप लगा। बाद में भारद्वाज के एक वायरल वीडियो/पॉडकास्ट क्लिप को लेकर विवाद बढ़ा, जिसमें उन पर घटना के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक ढंग से बात करने का आरोप लगा। दिल्ली पुलिस ने बाद में उन्हें गिरफ्तार किया और मामले में SC/ST Act सहित अन्य धाराएं जोड़े जाने की खबर सामने आई।

नीशु ने इसके बाद अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें यह पता नहीं है कि उन पर कब और कहां हमला हो सकता है और परिवार को सुरक्षा की जरूरत है।

आरोपों के बीच बढ़ता ऑनलाइन उत्पीड़न

नीशु और उनके समर्थकों का आरोप है कि विवाद के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें लगातार गालियों, धमकियों और यौन हिंसा से जुड़ी धमकियों का सामना करना पड़ा। सितंबर की शुरुआत में उन्होंने अपने घर पर पत्थर फेंके जाने का भी आरोप लगाया और पुलिस से परिवार की सुरक्षा की मांग की।

इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या किसी नाबालिग छात्रा को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा सकता है क्योंकि उसने किसी राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी?

यही वह बिंदु है जहां नीशु आजाद का मामला व्यापक नागरिक अधिकारों के सवाल से जुड़ जाता है।

‘घर छोड़ने’ के दबाव का आरोप

नीशु ने अपने वीडियो में आरोप लगाया है कि उनके परिवार पर आवासीय सोसायटी छोड़ने का दबाव बनाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस की ओर से उनके मकान मालिक से संपर्क किया गया और परिवार को घर खाली कराने के लिए कहा गया।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि का सवाल महत्वपूर्ण है। यदि किसी पुलिस अधिकारी या स्थानीय प्रभावशाली समूह की ओर से किसी परिवार को केवल उसकी सामाजिक पहचान या राजनीतिक गतिविधियों के कारण घर छोड़ने के लिए दबाव डाला गया है, तो यह कानून के शासन और नागरिक स्वतंत्रता दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।

इसीलिए इस मामले में आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप क्यों महत्वपूर्ण है?

सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख इस मामले को एक नए स्तर पर ले जाता है। अदालत ने नाबालिग छात्रा और उसके परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है और सरकार से सुरक्षा व्यवस्था तथा की गई कार्रवाई के बारे में जवाब मांगा है।

यह संदेश महत्वपूर्ण है कि किसी भी नागरिक—खासकर नाबालिग—को धमकी, हिंसा या लगातार उत्पीड़न के सामने अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।

लोकतंत्र में विरोध करना अपराध नहीं है। किसी सरकार, मंत्री या व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठाना भी अपने-आप में अपराध नहीं है। लेकिन विरोध के जवाब में हिंसा, धमकी या डिजिटल उत्पीड़न का इस्तेमाल लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करता है।

दलित छात्रा होने का सवाल

नीशु आजाद के मामले में जाति का पहलू भी सामने आया है। उनके खिलाफ दर्ज शिकायतों और उनके परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों के बीच SC/ST Act का इस्तेमाल भी विवाद का हिस्सा बना है। पुलिस ने स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ पहले दर्ज मामले में SC/ST Act की धाराएं जोड़ी थीं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी आरोप को बिना जांच के सही मान लिया जाए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि जातिगत उत्पीड़न के आरोपों की जांच कानून के मुताबिक गंभीरता से होनी चाहिए।

भारत का संविधान समानता और गरिमा का अधिकार देता है। किसी दलित छात्रा को अपनी राजनीतिक या सामाजिक आवाज उठाने के कारण डराया-धमकाया जाता है तो सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं रह जाता—वह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का सवाल बन जाता है।

विरोध के अधिकार की असली परीक्षा

नीशु आजाद की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि एक नाबालिग छात्रा सार्वजनिक दबाव के बावजूद अपनी आवाज बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

लेकिन लोकतंत्र में किसी नागरिक की बहादुरी की परीक्षा इस बात से नहीं होनी चाहिए कि वह कितनी धमकियां सह सकती है।

परीक्षा राज्य की है।

पुलिस की है।

न्याय व्यवस्था की है।

और समाज की भी है।

क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ेंगे जहां असहमति का जवाब तर्क से दिया जाएगा या धमकी से?

क्या किसी छात्रा के राजनीतिक विचारों से असहमति रखने वाला व्यक्ति उसके परिवार को डराने का अधिकार रखता है?

और क्या किसी आवासीय सोसायटी को किसी परिवार से केवल इसलिए दूरी बनाने का अधिकार है क्योंकि उस परिवार का सदस्य किसी आंदोलन में सक्रिय है?

इन सवालों के जवाब सिर्फ नीशु आजाद के मामले के लिए नहीं, बल्कि भारत में आने वाली पूरी पीढ़ी के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आगे क्या?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नीशु और उनके परिवार को वास्तविक सुरक्षा मिलती है या नहीं और जिन धमकियों तथा उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच कितनी निष्पक्षता से होती है।

इस मामले में सोशल मीडिया पर चल रहे दावों और आरोपों को भी जांच की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। जिस तरह नीशु के खिलाफ शिकायतें सामने आई हैं, उसी तरह उनके द्वारा लगाए गए धमकियों और उत्पीड़न के आरोपों की भी कानून के मुताबिक जांच होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता ने कम-से-कम एक बात साफ कर दी है—किसी नाबालिग प्रदर्शनकारी को धमकाकर या उसके परिवार को भयभीत करके लोकतांत्रिक असहमति को दबाया नहीं जा सकता।

नीशु आजाद का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सवाल उठाता है कि संविधान में मिले अधिकार जमीन पर कितने सुरक्षित हैं—खासकर तब, जब कोई युवा, दलित और महिला/नाबालिग अपनी आवाज सत्ता, प्रभावशाली समूहों या सामाजिक दबाव के सामने उठाती है।

लोकतंत्र में असहमति का जवाब असहमति ही होना चाहिए—धमकी नहीं।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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