September 8, 2026 2:28 pm
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‘मॉब लिंचिंग की चर्चा बंद हुई है, मॉब लिंचिंग नहीं’

‘अखलाक’ के लेखक दयाशंकर मिश्र से खास बातचीत। भारत में मॉब लिंचिंग, नफरत की राजनीति, मीडिया, न्याय और पीड़ित परिवारों की कहानियों पर विस्तृत चर्चा।

Politics of Hate की जमीनी पड़ताल करती है दयाशंकर मिश्र की किताब

‘अखलाक’ के लेखक दयाशंकर मिश्र ने भारत में मॉब लिंचिंग की घटनाओं, उसके बदलते स्वरूप, न्याय की प्रक्रिया और समाज में फैलती नफरत पर लंबी जमीनी पड़ताल की है। किताब के सिलसिले में उन्होंने पीड़ित परिवारों, प्रत्यक्षदर्शियों और घटनाओं से जुड़े लोगों से मुलाकात की। बेबाक भाषा के लिए भाषा सिंह से खास इस बातचीत में वे बताते हैं कि आखिर उन्होंने ‘अखलाक’ क्यों लिखी और उनके लिए मॉब लिंचिंग सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता का सवाल क्यों है।

भारत में मॉब लिंचिंग पर चर्चा अब पहले जैसी नहीं रही। मीडिया की सुर्खियों से ऐसी घटनाएं कई बार गायब दिखाई देती हैं, लेकिन लेखक दयाशंकर मिश्र का कहना है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मॉब लिंचिंग खत्म हो गई है। उनकी किताब ‘अखलाक’ इसी खामोशी के बीच उन घटनाओं और उनके पीछे मौजूद सामाजिक मानसिकता को समझने की कोशिश है।

मिश्र ने इस किताब के लिए अलग-अलग जगहों की यात्रा की और पीड़ितों तथा उनके परिवारों से मिलने की कोशिश की। कई जगहों पर उन्हें लोगों का भरोसा जीतने में कई दिन लगे। उनका कहना है कि वे जल्दबाजी में किसी घटना को लिखना नहीं चाहते थे, बल्कि पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा को समझने और उसके बाद उसे पाठकों के सामने रखने की कोशिश कर रहे थे।

‘मॉब लिंचिंग की चर्चा बंद हुई है, मॉब लिंचिंग नहीं’

दयाशंकर मिश्र के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग की घटनाओं की मीडिया कवरेज में कमी आई है। वे इसे एक तरह के मीडिया प्रोटोकॉल से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि मॉब लिंचिंग की खबरें कई बार उस तरह सामने नहीं आतीं, जिस तरह पहले आती थीं।

वे कहते हैं कि उनकी पिछली किताब, जो नवंबर 2023 में प्रकाशित हुई थी, उसमें भी मॉब लिंचिंग पर एक छोटा अध्याय था। उसी समय से इस विषय पर विस्तृत काम करने का विचार उनके मन में था। 2024 से उन्होंने इस पर व्यवस्थित तरीके से काम शुरू किया।

मिश्र के लिए ‘अखलाक’ सिर्फ 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या की कहानी नहीं है। किताब का दायरा उससे कहीं बड़ा है। वे बताते हैं कि उन्होंने हिंदू और मुस्लिम—दोनों समुदायों से जुड़े उन मामलों को शामिल करने की कोशिश की है, जहां भीड़ की हिंसा ने किसी की जान ली या किसी को निशाना बनाया।

इसी क्रम में किताब में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या और आर्यन मिश्रा जैसे मामलों का भी उल्लेख आता है।

अखलाक से पहले और अखलाक के बाद की कहानी

किताब का नाम ‘अखलाक’ होने की वजह से पहली नजर में इसे केवल मुस्लिमों के खिलाफ मॉब लिंचिंग की घटनाओं की किताब समझा जा सकता है। लेकिन लेखक इस दायरे को व्यापक बनाते हैं।

बातचीत में वे बताते हैं कि उन्होंने मोहसिन शेख से लेकर ग्राहम स्टेन्स और सुबोध कुमार सिंह तक अलग-अलग घटनाओं और उनके सामाजिक संदर्भों को देखने की कोशिश की है।

उनकी नजर में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भीड़ की हिंसा सिर्फ उस दिन पैदा नहीं होती, जिस दिन हत्या होती है। उसके पीछे लंबे समय से तैयार की जा रही सामाजिक और मानसिक जमीन भी होती है।

ओडिशा से दादरी तक—जमीन पर जाकर कहानी समझने की कोशिश

किताब के महत्वपूर्ण हिस्सों में ओडिशा को काफी जगह दी गई है। मिश्र ग्राहम स्टेन्स की हत्या से जुड़े इलाके में गए। 1999 में ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जलाकर मार दिए जाने की घटना ने देश को झकझोर दिया था।

मिश्रा के मुताबिक, उन्होंने वहां पुराने मामलों को सिर्फ इतिहास की तरह देखने के बजाय उन लोगों से बातचीत की, जिन्होंने उस दौर को देखा या उसके बारे में जाना था।

किताब में शिल्पा मरांडी समेत कई लोगों की गवाहियां और बातचीत शामिल हैं। लेखक का कहना है कि ओडिशा की कहानियां राष्ट्रीय मीडिया की चर्चा में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं और इसलिए उन्होंने इस हिस्से को विस्तार दिया।

‘WhatsApp यूनिवर्सिटी’ से पहले भी नफरत फैलती थी

बातचीत में एक दिलचस्प प्रसंग चंचु हांसदा और दारा सिंह से जुड़ा है। लेखक बताते हैं कि उस दौर में आज की तरह सोशल मीडिया और WhatsApp मौजूद नहीं था, फिर भी दारा सिंह लोगों की मानसिकता को प्रभावित करने में सफल रहा।

मिश्र के मुताबिक, चंचु हांसदा ने उन्हें बताया कि दारा सिंह के बारे में किस तरह की कहानियां लोगों के बीच फैलाई गई थीं—मसलन, उसके बारे में यह धारणा बनाई गई कि पुलिस उसे पकड़ नहीं सकती।

लेखक के लिए यह प्रसंग यह सवाल उठाता है कि हिंसा और साम्प्रदायिकता के लिए तकनीक जरूरी नहीं है। तकनीक उसके प्रसार को तेज कर सकती है, लेकिन नफरत की सामाजिक और राजनीतिक जमीन उससे पहले भी मौजूद रही है।

‘जो मारा गया, वही दोषी बना दिया जाता है’

‘अखलाक’ में लेखक जिस पैटर्न की ओर इशारा करते हैं, उसमें हिंसा का शिकार व्यक्ति ही कई बार आरोपी की तरह पेश किया जाता है।

उनका कहना है कि किताब में ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें हिंसा के बाद पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा और कई मामलों में उन्हें वह न्याय नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे।

मोहसिन शेख के मामले का उल्लेख करते हुए मिश्र बताते हैं कि उन्होंने उनके भाई मुबीन से शोलापुर में बातचीत की। मोहसिन एक IT प्रोफेशनल थे और उनके पास दूसरे शहरों में काम करने के अवसर थे, लेकिन वे पुणे से जुड़े हुए थे। लेखक इस प्रसंग के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि किसी शहर से इंसान का लगाव कितना गहरा हो सकता है और वही शहर किस तरह हिंसा का स्थल भी बन सकता है।

अखलाक केस और न्याय का सवाल

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अखलाक मामले और न्यायिक प्रक्रिया पर है।

मिश्र 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अखलाक मामले के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की मांग से जुड़ी कार्रवाई का उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि अदालत द्वारा उस पर आपत्ति जताया जाना महत्वपूर्ण था। वे न्यायाधीश सौरभ द्विवेदी के रुख को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण मानते हैं।

लेखक के लिए यह केवल एक केस की कानूनी प्रक्रिया नहीं है। उनके मुताबिक, सवाल इससे बड़ा है—क्या किसी व्यक्ति की हत्या के आरोपी के जेल में रहने या बाहर आने का फैसला राजनीतिक सत्ता की इच्छा से तय होगा या कानून की प्रक्रिया से?

आर्यन मिश्रा का मामला: ‘नफरत की राजनीति’ की दूसरी परत

किताब के दसवें अध्याय में आर्यन मिश्रा के मामले को शामिल किया गया है। बातचीत में इस घटना को इसलिए महत्वपूर्ण बताया गया है क्योंकि यहां भीड़ की हिंसा में एक हिंदू युवक की हत्या हुई।

लेखक इस मामले के जरिए यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि भीड़ की हिंसा का चरित्र केवल पीड़ित की धार्मिक पहचान से तय नहीं होता। हिंसा करने वाली मानसिकता, अफवाह, पहचान और भीड़ की मनोवृत्ति—ये सभी सवाल इसमें शामिल हैं।

सबसे मुश्किल अध्याय: दोस्ती, परिवार और नफरत का टूटना

मिश्र बताते हैं कि किताब का एक अध्याय लिखना उनके लिए बेहद कठिन रहा। यह नूरुल और उनकी पत्नी आयशा से जुड़ी कहानी है।

कहानी इसलिए और भयावह हो जाती है क्योंकि जिस व्यक्ति की हत्या होती है, उसके जीवन में शामिल कुछ लोग उसके पुराने दोस्त थे। बातचीत में आयशा अपने पति नूरुल और उनके दोस्तों के रिश्ते के बारे में बताती हैं—बचपन से चली आ रही दोस्ती, शादी-ब्याह के रिश्ते और रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-छोटे भरोसे।

फिर वही लोग आगे चलकर उस भीड़ का हिस्सा बनते हैं, जो नूरुल की हत्या करती है।

मिश्र बताते हैं कि इस अध्याय को लिखते समय वे मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गए थे। दिल्ली लौटने के बाद कुछ समय तक वे किसी से बात करने की स्थिति में नहीं थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आयशा की पीड़ा, उनके आंसुओं और उनके साथ हुए धोखे को शब्दों में कैसे रखा जाए।

मंटो ने लेखक को इस कहानी तक पहुंचाया

इस अध्याय को लिखने के दौरान मिश्र ने सआदत हसन मंटो को फिर से पढ़ा। वे बताते हैं कि मंटो के लेखन और उनके बयानों ने उन्हें यह समझने में मदद की कि लेखक हर त्रासदी को ठीक नहीं कर सकता, लेकिन उसकी सच्चाई को पाठक के सामने रख सकता है।

यही उनके लिए ‘अखलाक’ लिखने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण क्षण था।

उनके मुताबिक, आयशा की कहानी में सबसे भयावह बात यह थी कि हिंसा किसी अनजान दुश्मन ने नहीं, बल्कि उन लोगों ने की थी जो कभी परिवार और दोस्ती का हिस्सा रहे थे।

‘नफरत धीरे-धीरे उतरती है’

बातचीत में मॉब लिंचिंग को सिर्फ अचानक पैदा हुई भीड़ की हिंसा मानने के बजाय उसके पीछे मौजूद मानसिक प्रक्रिया पर भी चर्चा होती है।

मिश्र का कहना है कि अलग-अलग समय पर दिए गए नफरती बयान हमारी स्मृति से पूरी तरह गायब नहीं होते। वे धीरे-धीरे हमारे दिमाग में जमा होते रहते हैं।

इसी को वे एक रूपक के जरिए समझाते हैं—नफरत धीरे-धीरे उतरती है।

उनके मुताबिक, इसका अंतिम रूप हमेशा मॉब लिंचिंग ही हो, ऐसा जरूरी नहीं। कोई व्यक्ति हिंसा में शामिल हो सकता है, या फिर मानसिक रूप से ऐसी हिंसा का समर्थन करने की स्थिति तक पहुंच सकता है।

मॉब लिंचिंग के ‘बदलते रूप’ पर सवाल

बातचीत में मॉब लिंचिंग के बदलते स्वरूप पर भी चर्चा होती है। इसमें भीड़ द्वारा प्रत्यक्ष हत्या से लेकर बुलडोजर कार्रवाई, नागरिकता पर सवाल और किसी समुदाय को ‘बाहरी’ या ‘बांग्लादेशी’ बताने जैसी राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रियाओं को एक व्यापक संदर्भ में देखने की बात सामने आती है।

लेखक की मूल चिंता यह है कि अगर किसी समुदाय या व्यक्ति को लगातार ‘दूसरा’ बताने की प्रक्रिया चलती रहे, तो हिंसा सिर्फ सड़क पर होने वाली हत्या तक सीमित नहीं रहती।

‘अखलाक’ आखिर किस बारे में है?

‘अखलाक’ को सिर्फ मॉब लिंचिंग की घटनाओं का दस्तावेज मानना शायद इसके दायरे को छोटा करना होगा। बातचीत से स्पष्ट होता है कि दयाशंकर मिश्र का प्रयास घटनाओं के पीछे मौजूद सामाजिक मानसिकता, राजनीतिक माहौल, मीडिया की भूमिका, न्याय की प्रक्रिया और पीड़ित परिवारों की पीड़ा को एक साथ देखने का है।

किताब के लिए उन्होंने कई जगहों की यात्रा की, लोगों से लंबे समय तक बातचीत की और कई ऐसी कहानियों तक पहुंचने की कोशिश की जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम चर्चा हुई।

इसलिए ‘अखलाक’ का केंद्रीय सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मॉब लिंचिंग क्यों होती है। बड़ा सवाल यह है कि एक समाज किस तरह उस स्थिति तक पहुंचता है जहां किसी इंसान की पहचान उसके इंसान होने से पहले तय कर दी जाती है—और उसकी हत्या के बाद भी न्याय की मांग कमजोर पड़ जाती है।

दयाशंकर मिश्र की यह किताब उसी बदलती मानसिकता और उस पर चढ़ती चुप्पी को दर्ज करने की कोशिश है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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