धीरेंद्र शास्त्री के सामने बिछले के बाद सुवेंदु ने जादवपुर जैसी यूनिवर्सिटी के खिलाफ़ भी छेड़ दी जंग!
धर्म, खान-पान और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता—पश्चिम बंगाल में हालिया घटनाएं एक बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष की ओर इशारा कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों लड़ाई सिर्फ चुनावी नारों या सत्ता की कुर्सी तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई अब इस सवाल तक पहुंच गई है कि बंगाली होने, हिंदू होने और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीने का अर्थ आखिर कौन तय करेगा?
एक तरफ बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का बंगाल में दिया गया वह बयान है, जिसमें उन्होंने दुर्गा पूजा और नवरात्रि के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर आपत्ति जताई और बंगाल के हिंदुओं से अपील की कि दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन न बेचा जाए। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का कालिघाट मंदिर में पारंपरिक मछली-भोग ग्रहण करते हुए सामने आया वीडियो है।
इन दोनों घटनाओं के बीच बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सांस्कृतिक सवाल खड़ा हो गया है—क्या बंगाल की धार्मिक परंपराओं को देश के दूसरे हिस्सों से आए एक समान शाकाहारी धार्मिक मानक के मुताबिक परिभाषित किया जाएगा?
धीरेंद्र शास्त्री का बयान और बंगाल में उठता विवाद
सितंबर के पहले सप्ताह में पश्चिम बंगाल के हावड़ा के लिलुआ में आयोजित हनुमंत कथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर टिप्पणी की।
उन्होंने बंगाल के हिंदुओं से अपील की कि नवरात्रि के दौरान दुर्गा प्रतिमाओं के आसपास मांसाहारी भोजन न बेचा जाए। उनके बयान को लेकर बंगाल में तीखी प्रतिक्रिया हुई। कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इसे बंगाली खान-पान और धार्मिक परंपराओं में बाहरी हस्तक्षेप के रूप में देखा।
विवाद इसलिए भी बड़ा हुआ क्योंकि इससे पहले विश्व हिंदू परिषद की ओर से भी दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन को लेकर एक सलाह सामने आई थी। बाद में वीएचपी ने स्पष्ट किया कि उसका आशय लोगों की व्यक्तिगत खान-पान की पसंद पर रोक लगाना नहीं था।
लेकिन बंगाल में सवाल सिर्फ मांस खाने या न खाने का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक दृष्टिकोण को पूरे बंगाल के हिंदुओं के लिए मानक बनाया जा सकता है?
बंगाल की धार्मिक परंपरा में मछली और मांस का सवाल
बंगाल की धार्मिक संस्कृति एकरंगी नहीं रही है। शाक्त परंपरा में देवी उपासना के अलग-अलग रूपों के साथ अलग-अलग प्रकार के भोग और अनुष्ठान जुड़े रहे हैं।
इसी संदर्भ में कालिघाट मंदिर का उदाहरण खास महत्व रखता है।
धीरेंद्र शास्त्री के बयान के कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता के कालिघाट मंदिर में पूजा की और पारंपरिक भोग ग्रहण किया, जिसमें मछली, मछली का सिर और बासंती पुलाव शामिल था। यह घटना 10 सितंबर को कौशिकी अमावस्या के अवसर पर हुई।
अधिकारी ने बाद में कहा कि संत ने अपनी राय व्यक्त की है और जिसे स्वीकार करना हो वह करे, जिसे नहीं करना हो वह न करे। उन्होंने यह भी कहा कि वह बंगाली होने के नाते भगवान को चढ़ाए जाने वाले मछली और मांस के प्रसाद को ग्रहण करते हैं, जबकि महाष्टमी जैसे अवसरों पर सात्त्विक भोजन करते हैं।
यानी स्वयं मुख्यमंत्री का सार्वजनिक रुख यह रहा कि हिंदू धार्मिक आचरण में एक से अधिक परंपराएं मौजूद हैं।
लेकिन यही बात एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न भी पैदा करती है।
अगर बंगाल की अपनी धार्मिक परंपराओं में मछली और मांस का स्थान है, तो फिर बंगाली हिंदुओं को किसी दूसरे सांस्कृतिक मॉडल के अनुसार अपनी धार्मिक पहचान क्यों परिभाषित करनी चाहिए?
सवाल सिर्फ मछली का नहीं, सांस्कृतिक स्वायत्तता का है
यहीं से इस पूरे विवाद को केवल “वेज बनाम नॉन-वेज” की बहस के रूप में देखना अपर्याप्त होगा।
बंगाल में भोजन सिर्फ भोजन नहीं है। वह सामाजिक स्मृति, पारिवारिक परंपरा, लोकाचार और धार्मिक विविधता का हिस्सा है।
इसलिए जब कोई बाहरी धार्मिक वक्ता यह कहता है कि दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन करने वाले बंगाली हिंदू गलत या पाखंडी हैं, तो प्रतिक्रिया सिर्फ भोजन की पसंद पर नहीं होती। यह प्रतिक्रिया इस बात पर होती है कि बंगाल की अपनी धार्मिक संस्कृति की व्याख्या कौन करेगा।
और यही वह बिंदु है जहां राजनीति इस सांस्कृतिक बहस में प्रवेश करती है।
विरोध करने वालों पर कार्रवाई का सवाल
विवाद के बीच कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा धीरेंद्र शास्त्री की तस्वीर जलाकर प्रदर्शन किए जाने की घटना भी सामने आई।
इसके बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने विधानसभा में कोलकाता पुलिस आयुक्त से ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई और गिरफ्तारी के निर्देश दिए। अधिकारी ने साथ ही कहा कि शास्त्री ने अपनी व्यक्तिगत मान्यता व्यक्त की थी और उसे थोपने की कोशिश नहीं की थी।
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है।
एक तरफ मुख्यमंत्री कहते हैं कि धार्मिक नेता को अपनी राय रखने का अधिकार है। दूसरी तरफ उस राय के विरोध में सार्वजनिक प्रदर्शन करने वालों पर पुलिस कार्रवाई की मांग की जाती है।
यहां लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल उठना स्वाभाविक है:
क्या किसी धार्मिक वक्तव्य का विरोध करना भी उतना ही वैध लोकतांत्रिक अधिकार नहीं होना चाहिए जितना उस वक्तव्य को देना?
कानून-व्यवस्था के नाम पर हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई अलग विषय है। लेकिन किसी विचार का शांतिपूर्ण विरोध और उस विचार को व्यक्त करना—दोनों के लिए लोकतांत्रिक स्पेस होना जरूरी है।
और फिर पहुंचता है विवाद जादवपुर विश्वविद्यालय तक
लेकिन पश्चिम बंगाल में चल रही यह कहानी केवल भोजन और धार्मिक संस्कृति तक सीमित नहीं है।
इसी दौरान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने जादवपुर विश्वविद्यालय को लेकर बेहद आक्रामक राजनीतिक रुख अपनाया।
9 सितंबर को उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय तक निकाली गई लगभग तीन किलोमीटर लंबी “गेरुआ सम्मान यात्रा” का नेतृत्व किया और विश्वविद्यालय परिसर में कथित “राष्ट्रविरोधी” गतिविधियों को खत्म करने की बात कही।
इसके अगले दिन पश्चिम बंगाल विधानसभा ने West Bengal Universities and Colleges (Administration and Regulation) Amendment Bill, 2026 पारित किया। इस संशोधन के तहत राज्य की विश्वविद्यालयों में शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के तबादले की व्यवस्था को विस्तार दिया गया। सरकार ने इसे विश्वविद्यालयों के बीच मानव संसाधन के बेहतर इस्तेमाल और पिछड़े संस्थानों को मजबूत करने की जरूरत से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने विश्वविद्यालयी स्वायत्तता पर संभावित असर को लेकर सवाल उठाए।
अधिकारी ने विधानसभा में जादवपुर विश्वविद्यालय और वामपंथी विचारधारा से जुड़े शिक्षकों पर तीखे हमले किए। उन्होंने कथित “राष्ट्रविरोधी” नारों और गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी और विश्वविद्यालय में “नक्सलवाद की जड़ों” को उखाड़ने की बात कही।
यहां सवाल विश्वविद्यालय की राजनीति से आगे जाता है।
क्या किसी विश्वविद्यालय का राजनीतिक रूप से असहमत होना अपने आप में राष्ट्रविरोधी होना है?
और क्या सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि विश्वविद्यालय के भीतर कौन-सा राजनीतिक विचार स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं?
गेरुआ राजनीति बनाम विश्वविद्यालय की स्वायत्तता
जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से बंगाल के राजनीतिक और बौद्धिक जीवन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। वहां वामपंथी विचारों की मजबूत उपस्थिति रही है और छात्र राजनीति भी बंगाल की व्यापक राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रही है।
आज सरकार जिस भाषा में विश्वविद्यालय के राजनीतिक माहौल को चुनौती दे रही है, उसमें “राष्ट्रवाद”, “राष्ट्रविरोध”, “गेरुआ”, “नक्सलवाद” और “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” जैसे शब्द लगातार सामने आ रहे हैं।
यह महज राजनीतिक बयानबाजी नहीं है।
जब राज्य सरकार विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव करती है और उसी समय मुख्यमंत्री किसी विश्वविद्यालय के राजनीतिक चरित्र को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाते हैं, तब विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और सत्ता के हस्तक्षेप के बीच की सीमा पर बहस होना स्वाभाविक है।
बंगाल की लड़ाई आखिर है किस बात पर?
इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक साथ रखा जाए तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—
एक तरफ बंगाल की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जिनमें शाक्त उपासना, मछली, मांस, लोकाचार और विविध धार्मिक प्रथाओं का स्थान रहा है।
दूसरी तरफ हिंदुत्व की ऐसी राजनीतिक व्याख्या है जो पूरे देश के लिए एक समान धार्मिक-सांस्कृतिक आचरण की कल्पना करती है।
और तीसरी तरफ वह बंगाली समाज है जो अपनी स्थानीय पहचान और व्यापक हिंदू पहचान—दोनों को एक साथ जीता रहा है।
यही वजह है कि वर्तमान विवाद को सिर्फ “नॉन-वेज खाने वालों” और “वेज खाने वालों” की लड़ाई कहना गलत होगा।
असल सवाल है:
क्या भारत की हिंदू संस्कृति एक ही रूप में परिभाषित होगी या उसकी क्षेत्रीय विविधताओं को भी उतना ही सम्मान मिलेगा?
बंगाल की दुर्गा पूजा क्या सिर्फ एक धार्मिक उत्सव है, या वह बंगाली समाज की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है?
क्या बंगाली हिंदू को अपनी धार्मिक पहचान के लिए किसी बाहरी प्रमाणपत्र की जरूरत है?
और क्या किसी राज्य की सरकार को विश्वविद्यालयों के वैचारिक चरित्र को बदलने के लिए अपनी प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए?
बंगाल को कौन परिभाषित करेगा?
धीरेंद्र शास्त्री का बयान, सुवेंदु अधिकारी का कालिघाट में मछली-भोग ग्रहण करना, विरोध करने वालों की गिरफ्तारी के निर्देश और जादवपुर विश्वविद्यालय को लेकर सरकार का आक्रामक रुख—इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने से पूरी तस्वीर दिखाई नहीं देती।
इनके बीच एक साझा राजनीतिक प्रश्न मौजूद है:
बंगाल की पहचान को परिभाषित करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
राजनीतिक दलों के पास?
धार्मिक नेताओं के पास?
सरकार के पास?
या फिर बंगाल के लोगों के पास—जो सदियों से अपनी भाषा, भोजन, पूजा, लोकाचार, साहित्य, संगीत और राजनीतिक चेतना के जरिए अपनी संस्कृति बनाते आए हैं?
यही असली बहस है।
क्योंकि लड़ाई सिर्फ मछली और मांस की नहीं है।
लड़ाई इस बात की है कि बंगाल की संस्कृति को कौन परिभाषित करेगा—बंगाल के लोग या उनके लिए कोई और?
