January 15, 2026 9:00 am
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27 लाख मनरेगा मज़दूर सूची से गायब

मनरेगा eKYC अनिवार्य होने के बाद एक महीने में 27 लाख मजदूर सूची से हटाए गए। तकनीकी खामियाँ और प्रशासनिक दबाव से गरीबों का रोज़गार खतरे में।

 

eKYC की आड़ में मज़दूरों को काम से बाहर करने की नई रणनीति

देश में सबसे गरीब और सबसे मेहनतकश तबके—मनरेगा मज़दूरों—पर एक बार फिर गाज गिरी है। सिर्फ एक महीने से भी कम समय में 27 लाख मनरेगा मज़दूरों के नाम जॉब कार्ड सूची से हटा दिए गए हैं। इससे पहले पिछले कुछ वर्षों में 9 करोड़ से अधिक मज़दूरों के नाम हटाए जा चुके हैं। यह साफ संकेत है कि मोदी सरकार मनरेगा मज़दूरी करने वाले लोगों की संख्या लगातार कम कर रही है।

इस बार नाम हटाने का आधार है—eKYC, यानी Electronic Know Your Customer

सरल शब्दों में कहें तो सरकार ने 1 नवंबर 2025 से मनरेगा के लिए eKYC को अनिवार्य कर दिया है। और यही एक महीने में लाखों का रोज़गार छीनने की वजह बन गया है।

eKYC क्या है और यह मनरेगा मज़दूरों के लिए कैसे खतरा बन गया?

मनरेगा में अब फील्ड अधिकारी मज़दूरों की दो ग्रुप फ़ोटो लेते हैं। इन्हें ही उस दिन की हाजिरी माना जाता है।
eKYC लागू होने के बाद सिस्टम चेहरे की तुलना भी करता है। प्रक्रिया इस तरह है—

  1. पहला चरण:
    मज़दूर का एक रेफ़रेंस फ़ोटो लिया जाता है और सिस्टम में सुरक्षित कर दिया जाता है।
  2. दूसरा चरण:
    रोज़ के काम की ग्रुप फ़ोटो में ऐप मज़दूर के चेहरे को eKYC वाली फ़ोटो से मिलाता है।
  3. समस्या:
    अगर रोशनी खराब हुई, तस्वीर धुंधली आई या मोबाइल में नेटवर्क न था—तो चेहरा मैच न होने पर मज़दूर अनुपस्थित माना जा सकता है।
    यानी पूरा दिन काम करने के बाद भी मजदूरी नहीं।
  4. सबसे बड़ी दिक्कत:
    जो मज़दूर eKYC नहीं करा पाए—उनका जॉब कार्ड ही डिलीट कर दिया जा रहा है।

सिर्फ एक महीने में 27 लाख नाम क्यों हटे?

10 अक्टूबर से 14 नवंबर 2025 के बीच, आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार:

करीब 27 लाख मज़दूर मनरेगा सूची से हटा दिए गए।

यह आकड़ा बेहद असामान्य और चौंकाने वाला है।
लैफ्ट टेक इंडिया (Left Tech India)—जो मनरेगा पर शोध और डेटा जाँच करता है—के मुताबिक:

  • प्रशासन पर eKYC पूरा करने का बहुत ज़्यादा दबाव है।
  • फील्ड अधिकारियों को आदेश है कि हर मज़दूर का eKYC “हर हाल में” पूरा करें।
  • और जहां eKYC नहीं हो पा रहा, वहां सबसे आसान तरीका
    “नाम ही डिलीट कर दो”।

यानी—
ना रहेगा जॉब कार्ड, ना देनी पड़ेगी eKYC हाजिरी।

लैफ्ट टेक इंडिया के शोधकर्ता चंद्राकर बुद्धा के अनुसार, यह नया हटाना एक गंभीर प्रशासनिक अन्याय है, क्योंकि:

  • मज़दूरों को पता ही नहीं कि उनका नाम काट दिया गया।
  • ग्रामीणों के लिए eKYC करवाना तकनीकी रूप से कठिन है—नेटवर्क, मोबाइल, ऐप—सब चुनौतियाँ हैं।
  • और यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब सरकार कहती है कि वह 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रही है।

तो सवाल उठता है—
अगर देश में इतनी गरीबी है कि 80 करोड़ लोग राशन पर निर्भर हैं, तो उन्हीं गरीबों के काम के अधिकार को क्यों छीना जा रहा है?

पहले भी ऐसा हो चुका है: आधार आधारित भुगतान का संकट

2020–2023 के बीच, जब सरकार ने आधार-आधारित भुगतान प्रणाली अनिवार्य की थी, तब भी:

  • लाखों मज़दूरों को “तकनीकी असंगति” के नाम पर हटाया गया
  • भुगतान महीनों तक पेंडिंग रहे
  • लोगों को बिना कारण “अवैध” या “ग़ैर-मौजूद” घोषित कर दिया गया

अब बिल्कुल वही मॉडल eKYC के नाम पर दोहराया जा रहा है।

सरकार का दावा और जमीनी हकीकत

हाल ही में सरकार ने गलत तरीके से हटाए गए मज़दूरों को बहाल करने के निर्देश जारी किए थे।
लेकिन अब जिस तेज़ी से नए नाम काटे जा रहे हैं—वह बहाली को पूरी तरह बेअसर कर देता है।

स्थिति यह है—

  • तकनीकी आधारों पर मज़दूर काम के अधिकार से वंचित हो रहे हैं
  • लाखों ईमानदार मेहनतकश लोग अपनी मजदूरी खो बैठते हैं
  • और प्रशासनिक दबाव में अधिकारी बिना जाँच-पड़ताल के लोगों को सूची से बाहर कर दे रहे हैं

यह सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं — यह एक राजनीतिक निर्णय है

मनरेगा भारत के ग्रामीण गरीबों के लिए जीवनरेखा है।
साल में 100 दिन का काम—यही उनके परिवार को संभालने का आधार है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में:

  • बजट में लगातार कटौती
  • भुगतान में देरी
  • जॉब कार्ड डिलीट
  • और अब eKYC के नाम पर डिजिटल बाधाएँ

इन सबने मिलकर मनरेगा को कमज़ोर करने की साफ़ रणनीति दिखाई है।

27 लाख नामों का हटना उसी व्यापक नीति का हिस्सा लगता है—
गरीबों को काम से बाहर करो, और मनरेगा को धीरे-धीरे खत्म करो।

निष्कर्ष

eKYC की अनिवार्यता ने देशभर में डर फैला दिया है।
तकनीकी खामियों की वजह से लाखों मजदूरों की आजीविका खतरे में है।

सवाल यह है—
क्या सरकार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सुविधा देने के लिए कर रही है, या गरीबों के अधिकार छीनने के लिए?

और सबसे बड़ा सच यह है—
जिस देश में 80 करोड़ लोग राशन पर जीवित हैं, वहाँ मनरेगा के लाखों सबसे गरीब मज़दूरों को सूची से हटाना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं—बल्कि लोकतांत्रिक और मानवीय संवेदना पर चोट है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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