November 5, 2026 12:15 am
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RSS पर सवाल उठाने वाले दिल्ली पुलिस के निशाने पर?

दिल्ली पुलिस के X पोस्ट हटाने के नोटिस, IFF और SFLC विवाद पर सेंसरशिप की बहस तेज। क्या मोदी सरकार में RSS की आलोचना करने वाली आवाजें निशाने पर हैं?

IFF और SFLC के X पोस्ट पर नोटिस से सेंसरशिप की बहस तेज

दिल्ली पुलिस की ओर से X को कथित तौर पर आपत्तिजनक पोस्ट हटाने और कुछ अकाउंट्स को ब्लॉक करने के निर्देश दिए जाने के मामले ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर से जुड़े पोस्ट पर कार्रवाई की मांग के बीच सवाल है कि क्या सरकार और RSS की आलोचना को दबाने के लिए सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है?

भारत में सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हाल के हफ्तों में कई Instagram अकाउंट्स के हटाए जाने की खबरों के बीच अब दिल्ली पुलिस की ओर से X (पूर्व में ट्विटर) पर कई अकाउंट्स और पोस्ट के खिलाफ कार्रवाई की मांग किए जाने का मामला सामने आया है। इनमें इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) से जुड़े पोस्ट भी शामिल बताए जा रहे हैं।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या भारत में सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वाले नागरिकों, संगठनों और स्वतंत्र आवाजों को निशाना बनाया जा रहा है?

RSS की आलोचना और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम को मोदी-शाह सरकार के दौर में बढ़ती सेंसरशिप के संदर्भ में देखा जा रहा है। जब भी कोई संगठन या नागरिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा, उसकी राजनीतिक भूमिका या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज हो जाती है।

IFF और SFLC जैसे डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों से जुड़े पोस्ट पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की मांग को लेकर भी यही सवाल उठाया जा रहा है।पहले RSS से जुड़े लोगों या संगठनों की ओर से पहले सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने की मांग की जाती है और उसके बाद पुलिस तथा अन्य सरकारी संस्थाएं सक्रिय होती हैं।

यह आरोप केवल किसी एक पोस्ट या अकाउंट तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि क्या राजनीतिक आलोचना को रोकने के लिए कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है?

IFF और SFLC के पोस्ट पर विवाद क्यों?

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर भारत में डिजिटल अधिकारों, इंटरनेट की स्वतंत्रता, निजता और ऑनलाइन अभिव्यक्ति से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले संगठन हैं।

ऐसे संगठनों के पोस्ट पर कार्रवाई की मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे इंटरनेट पर नागरिक स्वतंत्रताओं और सरकारी हस्तक्षेप से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं।

यदि किसी पोस्ट को हटाने या किसी अकाउंट को ब्लॉक करने का निर्देश दिया जाता है, तो यह जानना जरूरी है कि उसका आधार क्या है? क्या संबंधित पोस्ट किसी कानून का उल्लंघन करती है, या केवल राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होने के कारण उसे हटाने की मांग की जा रही है?

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी सामग्री को हटाने की मांग अपने आप में सेंसरशिप का प्रमाण नहीं है। लेकिन ऐसी कार्रवाई का आधार, प्रक्रिया और पारदर्शिता सार्वजनिक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।

Instagram अकाउंट्स से लेकर X तक: बढ़ती सेंसरशिप की चिंता

हाल के हफ्तों में Instagram पर कई अकाउंट्स के हटाए जाने की घटनाओं के बीच X पर पोस्ट और अकाउंट्स को लेकर सामने आया यह विवाद डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक चिंता पैदा करता है।

सोशल मीडिया आज राजनीतिक विमर्श, नागरिक आंदोलनों और स्वतंत्र पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे में अकाउंट्स का निलंबन या पोस्ट हटाया जाना केवल प्लेटफॉर्म की कार्रवाई नहीं रह जाता, बल्कि इसका असर सार्वजनिक बहस पर भी पड़ता है।

अगर सरकारी एजेंसियों की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सामग्री हटाने के निर्देश दिए जाते हैं, तो यह जरूरी है कि उन निर्देशों की कानूनी वैधता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो।

खास तौर पर तब, जब मामला सरकार या किसी राजनीतिक संगठन की आलोचना से जुड़ा हो।

क्या मोदी सरकार के दौर में आलोचना की जगह सिकुड़ रही है?

यह पूरा घटनाक्रम मोदी-शाह सरकार के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव का संकेत है। सरकार और RSS की आलोचना करने वाली आवाजों को चुप कराने के लिए पुलिस और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह लोकतंत्र के एक बुनियादी सवाल की ओर ध्यान खींचता है: क्या सरकार की आलोचना करने का अधिकार केवल तब तक सुरक्षित है, जब तक आलोचना सत्ता के लिए असुविधाजनक न हो?

लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक संगठन, सरकार या सार्वजनिक संस्था की आलोचना नागरिकों का अधिकार है। इस अधिकार पर किसी भी तरह का प्रतिबंध लगाया जाता है, तो उसके पीछे स्पष्ट कानूनी आधार और जवाबदेह प्रक्रिया होनी चाहिए।

‘अमृतकाल की इमरजेंसी’ या डिजिटल अधिकारों पर गंभीर संकट?

यह दरअसल ‘अमृतकाल की इमरजेंसी’ है। देश में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों के लिए जगह कम होती जा रही है।जरूरी है कि सरकार और पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई सार्वजनिक जांच और सवालों से परे न हो।

IFF और SFLC से जुड़े पोस्ट पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की मांग ने एक बार फिर यह बहस सामने ला दी है कि भारत में इंटरनेट की स्वतंत्रता कितनी सुरक्षित है।

सवाल सिर्फ कुछ X पोस्ट या Instagram अकाउंट्स का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में सत्ता से सवाल पूछने की आजादी सुरक्षित है? और अगर सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों को दबाने की कोशिश होती है, तो क्या इसे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी नहीं माना जाना चाहिए?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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