October 20, 2026 8:12 pm
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मोदी-शाह जी मणिपुर भी देश का हिस्सा है, मणिपुर को बचाइए

मणिपुर के कामजोंग जिले में ताजा हिंसा, 28 घरों में आग और एक कुकी नागरिक की मौत की खबर। नागा-कुकी तनाव और सरकार की भूमिका पर उठते सवाल।

फिर भड़की हिंसा: 36 घंटे में 28 घर जलाए गए, कुकी नागरिक की मौत

मणिपुर में ताजा हिंसा ने एक बार फिर राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और केंद्र सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कामजोंग जिले में नागा और कुकी समुदायों के गांवों में हमलों के बाद 28 घरों में आग लगाए जाने की खबर है। हिंसा के डर से कई परिवार घर छोड़कर जंगलों में चले गए हैं, जबकि कुछ लोगों ने सेना के कैंपों में शरण ली है।

मणिपुर में हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य में एक बार फिर हालात तनावपूर्ण होने की खबरें सामने आई हैं। कार्यक्रम में दी गई जानकारी के मुताबिक, पिछले 36 घंटों के दौरान 28 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। इनमें नागा समुदाय के 13 और कुकी समुदाय के 15 घर शामिल बताए गए हैं।

हिंसा के डर से कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं। कुछ लोग जंगलों में शरण लेने को मजबूर हुए हैं, जबकि कुछ ने सुरक्षा के लिए सेना के कैंपों का रुख किया है। इन घटनाओं ने प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

कामजोंग जिले में हमले, एक कुकी नागरिक की मौत

ताजा हिंसा की घटनाएं मणिपुर के कामजोंग जिले में नागा और कुकी समुदायों के गांवों में हुई हैं। ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार, चासाद गांव में हुए एक हमले में एक कुकी नागरिक की मौत हो गई, जबकि चार अन्य लोग घायल हुए हैं। इन घटनाओं के बाद इलाके में तनाव का माहौल है। घरों को जलाए जाने और परिवारों के विस्थापन की खबरों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं या नहीं।

मणिपुर में नागा-कुकी तनाव और म्यांमार का पहलू

मणिपुर में पहले मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा सुर्खियों में रही है। अब कामजोंग जिले में नागा और कुकी समुदायों के बीच तनाव तथा हमलों की खबरें सामने आने से राज्य की स्थिति और जटिल होती दिखाई दे रही है। फरवरी 2026 से शुरू हुए ताजा हिंसक घटनाक्रम में अब तक 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं।

3 मई 2023 से जारी संकट, हजारों लोग प्रभावित

मणिपुर में जातीय हिंसा का मौजूदा संकट 3 मई 2023 को व्यापक रूप से भड़का था। इसके बाद राज्य में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए और बड़ी संख्या में घरों तथा अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचा।

2023 में शुरू हुई हिंसा में अब तक 300 से अधिक लोगों की मौत और 1,500 से ज्यादा लोगों के घायल होने का दावा किया गया है। तीन साल के करीब समय बीतने के बावजूद राज्य में स्थायी शांति और सामान्य जनजीवन बहाल करने की चुनौती बनी हुई है। ताजा घटनाएं इस चिंता को और गहरा करती हैं कि हिंसा प्रभावित परिवार आखिर कब सुरक्षित महसूस कर पाएंगे और कब अपने घरों में लौट सकेंगे।

सरकारें बदलीं, लेकिन मणिपुर में शांति का सवाल कायम

मणिपुर की स्थिति को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कार्यकाल, राष्ट्रपति शासन और उसके बाद दोबारा युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में सरकार गठन के संदर्भ में सवाल उठता है कि राजनीतिक बदलावों के बावजूद आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल पाई।

सरकार किसी भी दल की हो, उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों की जान-माल की रक्षा करना, हिंसा को रोकना और प्रभावित समुदायों के बीच भरोसा बहाल करना है। मणिपुर में लगातार सामने आ रही हिंसा की खबरें इस जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

दिल्ली में सुरक्षा इंतजाम और मणिपुर के हालात पर सवाल

केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल हैं। दिल्ली में तिरंगा यात्रा को रोकने के लिए 10 अक्टूबर से सुरक्षा बलों की तैनाती और किए गए इंतजामों को देखें, तो यदि इसी स्तर की तत्परता मणिपुर में भी दिखाई जाती, तो शायद हिंसा को रोकने में मदद मिल सकती थी। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की प्राथमिकता नागरिकों की सुरक्षा होनी चाहिए। मणिपुर के लोगों को भी वही सुरक्षा, राहत और न्याय मिलना चाहिए जिसकी अपेक्षा देश के किसी अन्य हिस्से के नागरिक करते हैं।

आखिर मणिपुर के लोगों की सुध कौन लेगा?

मणिपुर में बार-बार होने वाली हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह विस्थापित परिवारों, बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और उन लोगों की जिंदगी का सवाल है जो लंबे समय से असुरक्षा के बीच रहने को मजबूर हैं।

घरों में आग लगाए जाने, नागरिकों की मौत, लोगों के घायल होने और परिवारों के पलायन की घटनाएं बताती हैं कि शांति बहाल करने के लिए केवल राजनीतिक बदलाव पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था, निष्पक्ष जांच, पीड़ितों को राहत, जवाबदेही और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली की जरूरत है।

मणिपुर के लोग आखिर कब तक हिंसा और विस्थापन का सामना करेंगे? कब उन्हें अपने घरों में सुरक्षित लौटने का भरोसा मिलेगा? और सबसे बड़ा सवाल—आखिर मणिपुर के लोगों की सुध कौन लेगा?

इन सवालों के जवाब केवल बयानों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली शांति, सुरक्षा और न्याय से मिलने चाहिए।

मुकुल सरल

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