October 30, 2026 11:06 pm
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मुस्लिम वोटर्स के नाम कटवाने का BJP का वही डर्टी गेम

दिल्ली के मुस्तफाबाद में BJP के बूथ एजेंट पर 527 फॉर्म-7 भरकर मुस्लिम मतदाताओं के नाम कटवाने का आरोप। जानिए चुनाव आयोग से जुड़े गंभीर सवाल।

दिल्ली के मुस्तफाबाद में BJP के बूथ एजेंट पर 527 फॉर्म-7 भरने का आरोप

दिल्ली के मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद इलाके में मतदाता सूची से नाम हटवाने के लिए फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आया है। आरोप है कि भाजपा के एक बूथ लेवल एजेंट ने 527 फॉर्म जमा किए, जिनमें करीब 68 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटवाने से संबंधित थे। सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग इस गंभीर मामले की निष्पक्ष जांच करेगा?

देश की राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दिल्ली के मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद इलाके से सामने आई एक खबर ने चुनाव आयोग की निगरानी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने मतदाता सूची से नाम हटवाने के लिए चुनाव आयोग के फॉर्म-7 का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया।

दावा है कि इस एजेंट ने कुल 527 फॉर्म-7 जमा किए। इनमें से करीब 68 फीसदी फॉर्म मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए भरे गए थे। इनमें ऐसे मतदाताओं के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो जीवित हैं और वर्षों से अपने निर्धारित पते पर रह रहे हैं।

अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह महज कुछ मतदाताओं के नाम हटाने का मामला नहीं होगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में नागरिकों के समान राजनीतिक अधिकारों पर सीधा हमला होगा।

मुस्तफाबाद में क्या है पूरा मामला?

मुस्तफाबाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली का मुस्लिम बहुल इलाका है। यह क्षेत्र लंबे समय से सांप्रदायिक तनाव और सामाजिक-राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण चर्चा में रहा है।

ऐसे इलाके में यदि किसी राजनीतिक दल के बूथ लेवल एजेंट पर एक समुदाय विशेष के मतदाताओं को निशाना बनाकर उनके नाम मतदाता सूची से हटवाने की कोशिश का आरोप लगता है, तो मामला और भी गंभीर हो जाता है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संबंधित बूथ लेवल एजेंट ने 527 फॉर्म-7 जमा किए। आरोप है कि इनमें लगभग 68 फीसदी आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े थे।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन लोगों के नाम हटाने की मांग की गई, उनमें ऐसे मतदाता भी बताए जा रहे हैं जो न तो अपने पते से स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं और न ही लापता हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी राजनीतिक दल का बूथ एजेंट अपनी राजनीतिक या सांप्रदायिक प्राथमिकताओं के आधार पर नागरिकों के मतदान के अधिकार को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है?

आखिर क्या है फॉर्म-7 और इसका दुरुपयोग कैसे हो सकता है?

चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम जोड़ने, संशोधन करने और नाम हटाने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी मौजूदा मतदाता का नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। इसके लिए निर्धारित कानूनी आधार और प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।

किसी मतदाता की मृत्यु, संबंधित क्षेत्र में सामान्य निवास न होना या कानून में निर्धारित अन्य आधारों पर नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

लेकिन इस प्रक्रिया का इस्तेमाल यदि किसी समुदाय विशेष के मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जाए, तो यह चुनावी व्यवस्था के दुरुपयोग का गंभीर मामला बन जाता है।

सिर्फ फॉर्म जमा हो जाना किसी मतदाता का नाम हटाने का पर्याप्त आधार नहीं है। चुनाव अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावे और आपत्तियों की जांच करनी होती है। संबंधित मतदाता को अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिलना चाहिए।

इसलिए मुस्तफाबाद के मामले में यह जानना जरूरी है कि 527 फॉर्म किस आधार पर भरे गए, उनकी जांच किस तरह हुई और कितने आवेदनों को स्वीकार या खारिज किया गया।

क्या यह सिर्फ मुस्तफाबाद तक सीमित है?

मुस्तफाबाद का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के दूसरे हिस्सों से भी मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग की खबरें सामने आती रही हैं।

उत्तराखंड से आई खबरों में भी मतदाताओं को स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित दिखाकर उनके नाम हटाने की कोशिशों को लेकर सवाल उठे थे।

कर्नाटक में भी फॉर्म-7 और मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आया था। वहां राज्य सरकार ने इस तरह की शिकायतों और अनियमितताओं की जांच का मुद्दा उठाया था।

इन घटनाओं को एक साथ देखने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है: क्या मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इस्तेमाल वास्तविक मतदाता सत्यापन के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है?

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर बहस और कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं।

चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि देश में प्रत्येक योग्य नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रहे।

मुस्तफाबाद के आरोप चुनाव आयोग के सामने कई जरूरी सवाल खड़े करते हैं:

  • 527 फॉर्म-7 जमा करने वाले बूथ लेवल एजेंट की भूमिका की जांच हुई है या नहीं?
  • क्या इन आवेदनों में किसी एक समुदाय के मतदाताओं को असमान रूप से निशाना बनाया गया?
  • क्या संबंधित मतदाताओं को नोटिस भेजे गए और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया?
  • कितने आवेदनों को स्वीकार किया गया और कितने खारिज हुए?
  • क्या फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई?

इन सवालों का जवाब केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। यह देश की चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा मामला है।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही बहस के बीच गंभीर मामला

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और इससे जुड़े नागरिकों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई और कानूनी बहस हुई है।

ऐसे समय में दिल्ली जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग की खबर सामने आना बेहद चिंताजनक है।

यदि किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता या बूथ लेवल एजेंट को बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए आवेदन करने की छूट है, तो यह सुनिश्चित करना भी चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी समुदाय या राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए न हो।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने नाम हटाए गए। सवाल यह भी है कि कितने योग्य मतदाताओं को नाम हटाए जाने की आशंका के कारण अपने ही लोकतांत्रिक अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

दिल्ली में BJP की सरकार, तो शिकायत किससे और कार्रवाई कौन करेगा?

मुस्तफाबाद के मामले का एक राजनीतिक पहलू भी है। कर्नाटक में मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर राज्य सरकार की ओर से सवाल उठाए गए और जांच की मांग की गई। लेकिन दिल्ली में भाजपा की सरकार होने के बीच यह सवाल उठता है कि यदि किसी भाजपा बूथ लेवल एजेंट पर ही ऐसे आरोप हैं, तो शिकायत की निष्पक्ष जांच कौन सुनिश्चित करेगा?

यह जरूरी है कि जांच किसी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो और चुनाव आयोग स्वयं इस मामले में पारदर्शिता बरते।

लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को अपने समर्थकों के माध्यम से मतदाता सूची को प्रभावित करने का अधिकार नहीं है। मतदाता सूची किसी पार्टी की संपत्ति नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का आधार है।

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को देना होगा जवाब

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के सामने मुस्तफाबाद का मामला एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है।

क्या देश की राजधानी में योग्य मतदाताओं के नाम सुरक्षित नहीं हैं? क्या फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है? और यदि ऐसा होता है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?

यदि 527 फॉर्म जमा करने और उनमें करीब 68 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाए जाने का दावा सही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाने की कोशिश हुई है, उनके मताधिकार की रक्षा की जानी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार किसी सरकार, राजनीतिक दल या बूथ एजेंट की मेहरबानी नहीं है। यह हर योग्य नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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