October 21, 2026 11:07 pm
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RSS प्रमुख मोहन भागवत के दशहरा भाषण में बदला सुर!

RSS प्रमुख मोहन भागवत के दशहरा भाषण का विश्लेषण। Gen-Z आंदोलन, मोदी सरकार के समर्थन, शिक्षा और RSS से जुड़े संगठनों की फंडिंग पर उठे सवाल जानिए।

Gen-Z आंदोलन और मोदी सरकार के बचाव पर उठे सवाल

नागपुर में विजयादशमी के मौके पर मोहन भागवत ने युवाओं, सामाजिक आंदोलनों, शिक्षा और देश की स्थिरता पर जोर दिया। लेकिन उनके भाषण को लेकर सवाल यह है कि क्या RSS बदलते राजनीतिक माहौल के बीच Gen-Z के गुस्से और सरकार की घटती साख को लेकर चिंतित है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का नागपुर में विजयादशमी के अवसर पर दिया गया वार्षिक भाषण केवल संगठन का सालाना संबोधन नहीं होता। इसके जरिए संघ अपने कार्यकर्ताओं, भारतीय जनता पार्टी (BJP), सरकार और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को भी संदेश देता है। इस बार के भाषण में युवाओं की सोच, सही-गलत का विवेक, सामाजिक आंदोलनों, शिक्षा और देश की स्थिरता जैसे मुद्दों पर जोर दिखाई दिया।

लेकिन भाषण को राजनीतिक नजरिए से पढ़ने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है: क्या बदलती युवा राजनीति और Gen-Z के आंदोलनों ने RSS को अपनी रणनीति और संवाद के तरीकों पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर किया है?

भागवत के संबोधन को केवल सांस्कृतिक या सामाजिक संदेश के रूप में नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए।

Gen-Z के गुस्से से RSS की चिंता?

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने राजनीति, शासन और स्थापित सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी है। ऐसे आंदोलनों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अवसरों की कमी, असमानता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दे अहम रहे हैं।

भागवत के भाषण में युवाओं की सीखने की प्रवृत्ति और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर इसी संदर्भ में चर्चा का विषय बनता है।

युवाओं को लेकर उनका संदेश यह था कि नई पीढ़ी नई चीजों से जल्दी प्रभावित होती है। अनुभव के साथ उसे सही और गलत का अंतर समझ में आता है, लेकिन इसके लिए विवेकपूर्ण तरीके से सीखना जरूरी है।

यह बात अपने आप में असामान्य नहीं है। किसी भी समाज में युवाओं को आलोचनात्मक सोच और जिम्मेदार निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। लेकिन राजनीतिक सवाल तब उठता है, जब युवाओं के असंतोष और उनके आंदोलन के तरीकों को एक साथ रखकर देखा जाता है।

क्या युवाओं को विवेकपूर्ण सोच की सलाह देना पर्याप्त है, या उनकी नाराजगी के पीछे मौजूद सामाजिक और राजनीतिक कारणों को भी समझना जरूरी है?

Gen-Z की राजनीति को केवल अनुभवहीनता, बाहरी प्रभाव या गलत सूचना का परिणाम मानना उसके वास्तविक सवालों को नजरअंदाज करने का जोखिम पैदा करता है।

मोदी सरकार के समर्थन में RSS का स्पष्ट संदेश

भागवत के संबोधन का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के प्रति संघ के समर्थन से जुड़ा है।

भाषण में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों और देश को मजबूत बनाने के प्रयासों के संदर्भ में समर्थन का संदेश दिखाई देता है। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि संघ और उसके कार्यकर्ता सरकार के समर्थन में खड़े हैं।

यहीं से एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न पैदा होता है: क्या RSS का यह संदेश केवल सरकार की नीतियों के समर्थन तक सीमित है, या इसके पीछे मौजूदा सत्ता व्यवस्था को राजनीतिक चुनौतियों से बचाने की व्यापक रणनीति भी है?

2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की जगह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP सत्ता में आई। उस समय सत्ता परिवर्तन को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना गया। यदि चुनाव और जनसमर्थन के आधार पर सत्ता बदलना लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है, तो भविष्य में किसी दूसरी सरकार के सत्ता में आने की संभावना को भी उसी लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

यहां मूल सवाल किसी एक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक बदलाव के सिद्धांत का है।

क्या सत्ता परिवर्तन की स्वीकार्यता सभी राजनीतिक दलों और विचारधाराओं के लिए समान होनी चाहिए? निश्चित रूप से, लोकतंत्र में सरकार का समर्थन करना और सरकार को स्थायी सत्ता का स्वाभाविक अधिकारी मान लेना दो अलग बातें हैं।

आंदोलन बनाम लोकतांत्रिक असहमति

युवाओं के आंदोलनों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी आंदोलन की आलोचना किस आधार पर की जाती है।

यदि किसी आंदोलन में हिंसा, गलत सूचना या गैरकानूनी गतिविधियां होती हैं, तो उनकी जांच और आलोचना की जा सकती है। लेकिन केवल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने या सत्ता परिवर्तन की मांग उठाने से किसी आंदोलन को देशविरोधी ठहराना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर कर सकता है।

भागवत के भाषण में सामाजिक स्थिरता और देशहित पर जोर को इसी बहस के भीतर देखा जाना चाहिए।

भारत का लोकतांत्रिक ढांचा नागरिकों को असहमति, शांतिपूर्ण विरोध और राजनीतिक विकल्पों पर बहस का अधिकार देता है। किसी सरकार की नीतियों का विरोध करना अपने आप में देश का विरोध करना नहीं है।

इसीलिए यह सवाल प्रासंगिक है कि युवा आंदोलनों के प्रति राजनीतिक संगठनों का रवैया कितना संवादपरक है और कितना अनुशासन या वैचारिक नियंत्रण पर आधारित है।

RSS जैसे व्यापक संगठन के सामने यह चुनौती भी है कि वह नई पीढ़ी के सवालों का जवाब केवल अपने वैचारिक दृष्टिकोण से दे या उन सवालों के सामाजिक और आर्थिक आधार को भी समझे।

स्कूलों और शिक्षा के जरिए बदलाव का दावा

भागवत के भाषण में शिक्षा और युवाओं के वैचारिक विकास का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा। संघ से जुड़े संगठनों की ओर से शिक्षा, ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों और सामाजिक सेवा से जुड़े कार्यों का उल्लेख किया जाता रहा है। यदि किसी संगठन के पास बड़ा कार्यकर्ता नेटवर्क और व्यापक संसाधन हैं, तो शिक्षा व्यवस्था में उसके योगदान का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाना चाहिए।

किसी विद्यालय को सुधारने का अर्थ केवल उसके संचालन या बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन विद्यार्थियों के सीखने के स्तर, शिक्षकों की उपलब्धता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक सोच, समान अवसर और शैक्षणिक स्वतंत्रता जैसे मानकों पर भी होना चाहिए।

इसी तरह, किसी संगठन के वैचारिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाना और उसके शिक्षा संबंधी कामों की तथ्यात्मक समीक्षा करना अलग-अलग बातें हैं। किसी संस्था पर वैचारिक प्रभाव बढ़ाने का आरोप लगाने से पहले ठोस प्रमाण जरूरी हैं।

इसलिए RSS से जुड़े शिक्षा संस्थानों के योगदान पर बहस केवल उनकी संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि वे बच्चों को किस तरह की शिक्षा देते हैं और उनके शैक्षणिक परिणाम क्या हैं।

विदेशी फंडिंग पर सवाल: पारदर्शिता दोनों पक्षों के लिए जरूरी

RSS से जुड़े संगठनों की विदेशी फंडिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऑनलाइन खोजी मंच बिलिंगकैट (Billingleaks) की एक रिपोर्ट महत्वपूर्ण है जो अमेरिका में पंजीकृत दो गैर-लाभकारी संस्थाओं—एकल विद्यालय फाउंडेशन ऑफ USA और सेवा इंटरनेशनल इन्कॉरपोरेशन का मसला उठाती है। इन संस्थाओं को 2020 से 2024 के बीच डोनर-एडवाइज्ड फंड के माध्यम से कथित तौर पर बड़ी रकम प्राप्त हुई और भारत में शिक्षा तथा मानवीय सहायता से जुड़े कामों के लिए धन भेजा गया।

सवाल यह है कि धन कहां से आया, किस उद्देश्य के लिए दिया गया, उसका इस्तेमाल कैसे हुआ और क्या संबंधित कानूनों का पालन किया गया।यदि किसी आंदोलन को विदेशी आर्थिक सहायता मिलने का आरोप लगाया जाता है, तो उसके समर्थन में प्रमाण मांगे जाने चाहिए। इसी तरह, RSS से जुड़े संगठनों की फंडिंग पर सवाल उठते हैं, तो उनकी भी दस्तावेजों के आधार पर जांच होनी चाहिए।

पारदर्शिता का सिद्धांत सभी संगठनों के लिए समान होना चाहिए।

मीडिया की भूमिका और वैचारिक पक्षधरता

संघ के कार्यक्रम में दैनिक जागरण के मुख्य संपादक व मालिक संजय गुप्ता के बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने से मीडिया और राजनीतिक विमर्श में पक्षधरता को लेकर भी सवाल उठते हैं। किसी भी लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सत्ता के संदेश को प्रसारित करना नहीं, बल्कि सरकार, विपक्ष और प्रभावशाली सामाजिक संगठनों से जवाब मांगना भी है।

यदि किसी मीडिया संस्थान की रिपोर्टिंग में एक खास राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में लगातार झुकाव दिखाई देता है, तो उसकी संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठ सकते हैं। लेकिन किसी मीडिया संस्थान या पत्रकार के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए उसके काम, रिपोर्टिंग और संपादकीय फैसलों का ठोस विश्लेषण जरूरी है। अपने भाषण में संजय गुप्ता अपने अखबार की संघ के अनुकूल नीति का गुणगान करते नजर आए।

RSS और BJP से जुड़े विमर्श में मीडिया की भूमिका का मूल्यांकन करते समय भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। सवाल यह नहीं कि कोई पत्रकार किस विचारधारा से सहमत है, बल्कि यह है कि वह तथ्यों की जांच करता है या नहीं, सत्ता से कठिन सवाल पूछता है या नहीं और अपने दर्शकों को अलग-अलग पक्षों की बात सुनने का अवसर देता है या नहीं।

मीडिया की विश्वसनीयता किसी संगठन के प्रति निष्ठा से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, निष्पक्षता और तथ्यपरकता से तय होती है।

क्या RSS के लिए बदल रहा है राजनीतिक माहौल?

भागवत के दशहरा भाषण की राजनीतिक व्याख्या का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि युवा असंतोष और सत्ता की जवाबदेही का मुद्दा अब केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं है। नई पीढ़ी के बीच राजनीतिक नेतृत्व, संस्थाओं और स्थापित विचारधाराओं को लेकर उठने वाले सवाल किसी भी बड़े संगठन के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं।

युवाओं के विवेक, सामाजिक स्थिरता, शिक्षा और वैचारिक प्रभाव पर जोर देने वाले भाषण को वर्तमान राजनीतिक माहौल से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।

यदि युवाओं में असंतोष है, तो उसे केवल बाहरी प्रभाव या अनुभवहीनता का परिणाम मानने के बजाय यह भी समझना होगा कि उनकी मांगें क्या हैं। रोजगार, शिक्षा, अवसर, भ्रष्टाचार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर गंभीर संवाद किसी भी लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष: युवाओं के सवालों का जवाब संवाद से मिलेगा

मोहन भागवत का नागपुर में दिया गया दशहरा भाषण RSS की वैचारिक दिशा और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। इसमें युवाओं, शिक्षा, सामाजिक स्थिरता और सरकार के समर्थन जैसे मुद्दों को एक साथ देखने की जरूरत है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है: क्या नई पीढ़ी के असंतोष का जवाब उसे सही-गलत समझाने भर से दिया जा सकता है, या उसके सवालों को सुनना और उनके कारणों का समाधान करना भी जरूरी है?

लोकतंत्र में किसी संगठन को अपनी विचारधारा रखने और उसका प्रचार करने का अधिकार है। सरकार का समर्थन करना भी उसका अधिकार है। लेकिन किसी भी विचारधारा की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब वह अपने विरोधियों और असहमत नागरिकों के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो।

युवाओं को विवेक की सलाह देना महत्वपूर्ण है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उनकी असहमति को लोकतंत्र का हिस्सा माना जाए।

आखिरकार, किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की मजबूती का आकलन केवल उसके समर्थकों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी होता है कि वह असहमति, आलोचना और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन की संभावना को कितना सहजता से स्वीकार करती है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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