September 17, 2026 11:57 pm
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चुनाव आयोग ने उड़ाए बूथ के सारे वोटर, लोगों ने लड़ी लड़ाई तो झुकना पड़ा!

दिल्ली के बेला एस्टेट में SIR के बाद 729 में से 728 मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर हो गए। जानिए स्थानीय लोगों की शिकायत, चुनाव अधिकारियों का पक्ष और Form 6 की प्रक्रिया।

729 में सिर्फ 1 वोटर: दिल्ली के बेला जेजे एस्टेट में SIR के बाद 728 नाम क्यों गायब हुए?

दिल्ली के चांदनी चौक विधानसभा क्षेत्र में यमुना के किनारे बसी बेला एस्टेट की झुग्गी बस्ती में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) ने एक ऐसा सवाल खड़ा किया है, जिसका जवाब सिर्फ आंकड़ों से नहीं मिलता।

SIR से पहले इस इलाके के एक पोलिंग पार्ट में 729 मतदाता दर्ज थे। 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में इनमें से सिर्फ एक नाम बचा। यानी 728 नाम ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं थे। उपलब्ध रिकॉर्ड और चुनाव अधिकारियों के बयान के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोगों को ‘shifted’ यानी स्थानांतरित माना गया, जबकि कुछ नाम मृत या डुप्लीकेट श्रेणी में दर्ज किए गए।

यह आंकड़ा करीब 99.8 फीसदी मतदाताओं के ड्राफ्ट रोल से बाहर होने का है।

लेकिन बेला एस्टेट के लोगों की कहानी कुछ और है।

वे कहते हैं कि वे इलाके से कहीं गए नहीं। उनके मुताबिक उनके घर और झुग्गियां भले ही कई बार उजाड़ी गई हों, लेकिन वे उसी इलाके के आसपास रह रहे हैं। कई परिवारों का दावा है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी के नाम दशकों पुराने मतदाता रिकॉर्ड में दर्ज रहे हैं और वे लगातार मतदान करते रहे हैं।

‘घर उजड़ा, तो क्या वोटर भी उजड़ गया?’

हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में स्थानीय निवासी कमललाल बताते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से इसी इलाके में रह रहा है। उनके मुताबिक उनके दादा-पड़दादा भी यहां रहते थे और पुराने मतदाता रिकॉर्ड में उनके नाम दर्ज हैं।

कमललाल के मुताबिक, उनके परिवार के पास पुराने राशन कार्ड और दूसरे पहचान दस्तावेज हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार के लोग वर्षों से इसी इलाके से मतदान करते रहे हैं।

उनका सवाल सीधा है—अगर रहने की जगह बदली है, तो क्या इससे किसी व्यक्ति का मतदाता होने का अधिकार भी खत्म हो जाता है?

बेला एस्टेट के कई निवासियों की समस्या यह है कि उनका पुराना आवास यमुना क्षेत्र में था, जिसे समय-समय पर तोड़ा गया। इसके बाद वे आसपास ही अस्थायी झुग्गियों में रहने लगे।

चुनाव अधिकारियों का कहना है कि पुराने मतदाता रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में पते केवल “Agriculture” के रूप में दर्ज थे और कुछ ही मतदाताओं के साथ मकान नंबर दर्ज था। अधिकारियों के मुताबिक इलाके में कृषि गतिविधियां 2021 में बंद हुईं और 2022-23 में वहां बने आवासीय ढांचों को हटा दिया गया। इसके बाद पुराने पते पर रहने वाले लोगों की ‘ordinary residence’ की स्थिति बदल गई।

यही वह बिंदु है जहां प्रशासन और स्थानीय लोगों के दावे अलग-अलग दिखाई देते हैं।

729 में एक नाम कैसे बचा?

बेला एस्टेट के इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है।

चुनाव अधिकारियों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड और SIR प्रक्रिया के दौरान सत्यापन के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को ‘shifted’ माना गया। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 632 मतदाताओं को shifted श्रेणी में रखा गया था, जबकि 42 को मृत और 10 को duplicate के रूप में दर्ज किया गया। एक स्थानीय रिपोर्ट में 43 अन्य मामलों का भी उल्लेख है।

दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का दावा है कि उन्होंने SIR के दौरान दिए गए enumeration forms भरे थे और कई लोगों ने इन्हें BLO को वापस भी किया था।

यानी इस मामले का मूल विवाद यह है कि मतदाताओं को वास्तव में सत्यापन के दौरान क्या दर्ज किया गया और उनके दिए गए फॉर्मों का क्या हुआ।

‘हमारे पास दस्तावेज हैं, फिर नाम क्यों नहीं?’

बस्ती में रहने वाले लोग बताते हैं कि उनके पास राशन कार्ड, पहचान पत्र, पैन कार्ड और दूसरे पुराने दस्तावेज मौजूद हैं।

कुछ लोगों ने हमारे कैमरे पर पुराने दस्तावेज और प्रमाण दिखाते हुए कहा कि उनके परिवार पीढ़ियों से इसी इलाके से जुड़े रहे हैं।

एक महिला, जो खुद को भाजपा की पुरानी कार्यकर्ता बताती हैं, ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि वह कई दशकों से भाजपा से जुड़ी रही हैं, लेकिन उनके और उनके परिवार के नाम भी मतदाता सूची से बाहर हो गए।

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह मामला केवल किसी एक राजनीतिक दल के समर्थकों की शिकायत के रूप में नहीं देखा जा सकता। यहां स्थानीय लोगों की मुख्य शिकायत यह है कि वे खुद को लंबे समय से क्षेत्र का निवासी और मतदाता बताते हैं, फिर भी SIR के बाद उनके नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं हैं।

प्रशासन का तर्क क्या है?

मामला सामने आने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारियों ने स्पष्टीकरण दिया।

अधिकारियों के अनुसार, Bela Estate का यह क्षेत्र यमुना के पश्चिमी किनारे पर स्थित है और पुराने चुनाव रिकॉर्ड में अधिकांश पते स्पष्ट आवासीय पते के रूप में दर्ज नहीं थे। रिकॉर्ड में कई लोगों का पता केवल ‘Agriculture’ लिखा था।

अधिकारियों ने यह भी कहा कि वहां की कृषि गतिविधियां बंद हो चुकी थीं और 2022-23 में आवासीय ढांचे हटाए गए थे। इसलिए पुराने पते पर मतदाताओं की ‘ordinary residence’ की स्थिति को लेकर सवाल पैदा हुआ।

इसका अर्थ यह है कि चुनाव अधिकारियों का कहना है कि नाम हटाने का आधार लोगों की नागरिकता या राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि पुराने रिकॉर्ड में दर्ज पते और उस पते पर वर्तमान निवास की स्थिति थी।

लेकिन SIR के नियम क्या कहते हैं?

चुनाव आयोग के मुताबिक किसी सामान्य मतदाता के लिए भारतीय नागरिक होना, 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का होना और संबंधित क्षेत्र का ‘ordinary resident’ होना जरूरी है।

SIR की प्रक्रिया में BLO घर-घर जाकर enumeration forms उपलब्ध कराते हैं। ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद जिन पात्र लोगों के नाम छूट गए हैं, उनके लिए claims and objections की प्रक्रिया रखी गई है।

दिल्ली के CEO कार्यालय के FAQ के अनुसार, ड्राफ्ट रोल के बाद पात्र व्यक्ति Form 6 और Declaration Form के जरिए अपना नाम शामिल कराने का दावा कर सकता है।

ECI के नागरिक सेवा पोर्टल पर भी Form 6, Declaration Form, नाम खोजने और अपील जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

दिल्ली में ड्राफ्ट रोल से बाहर किए गए लोगों के लिए claims की अवधि 31 अगस्त से 30 सितंबर 2026 तक है।

सवाल सिर्फ 728 लोगों का नहीं है

बेला एस्टेट का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह SIR की व्यापक प्रक्रिया के बीच सामने आया है।

दिल्ली के ड्राफ्ट रोल में लगभग 47.7 लाख नाम शामिल नहीं किए गए, जबकि SIR से पहले दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे।

देश के दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में भी SIR के अलग-अलग चरणों में बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर हुए हैं। 1 सितंबर को उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट रोल में कुल मिलाकर 13 करोड़ से अधिक नाम पिछले रोल की तुलना में कम बताए गए थे। यह आंकड़ा अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की संख्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि claims और objections के बाद नाम बहाल या शामिल किए जा सकते हैं।

इसलिए बेला एस्टेट के मामले को पूरे देश में हुए प्रत्येक deletion का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि जब किसी बस्ती का भौतिक पता बदल जाता है—खासकर तब, जब घर प्रशासनिक कार्रवाई में हटाए गए हों—तो मतदाता सूची में दर्ज ‘ordinary residence’ की पहचान कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या SIR के बाद पुराने मतदाता को फिर ‘नया वोटर’ बनना पड़ेगा?

बेला एस्टेट के निवासियों की सबसे बड़ी शिकायत यही है।

उनका कहना है कि वे नए मतदाता नहीं हैं। वे वर्षों से मतदाता सूची में थे, उनके परिवार के नाम पुराने रिकॉर्ड में हैं और उन्होंने पहले भी चुनावों में मतदान किया है। फिर भी ड्राफ्ट रोल में नाम नहीं रहने के बाद उन्हें Form 6 के जरिए दोबारा inclusion के लिए आवेदन करना पड़ रहा है।

यहां एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक अंतर समझना जरूरी है।

Form 6 के जरिए नाम शामिल कराने की प्रक्रिया का अर्थ यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति को पहली बार वोटर माना जा रहा है। यह उन पात्र लोगों के लिए भी इस्तेमाल होता है जिनका नाम मौजूदा ड्राफ्ट रोल में नहीं है और जो inclusion का दावा कर रहे हैं। ECI का पोर्टल भी Form 6 को electoral roll में inclusion के लिए निर्धारित करता है।

इसलिए बेला एस्टेट के लोगों की वास्तविक चिंता यह है कि उनके पुराने मतदाता रिकॉर्ड के साथ क्या हुआ और उन्हें ड्राफ्ट रोल से बाहर करने का निर्णय किन सत्यापन रिकॉर्ड के आधार पर लिया गया।

अब अगली लड़ाई दस्तावेजों और दावों की है

चुनाव आयोग ने SIR के दौरान यह व्यवस्था रखी है कि ड्राफ्ट रोल के बाद छूटे हुए पात्र मतदाता claims और objections दाखिल कर सकते हैं। केंद्र सरकार द्वारा संसद में दिए गए विवरण के अनुसार SIR में draft publication, claims and objections तथा अपील की बहु-स्तरीय व्यवस्था रखी गई है।

यानी बेला एस्टेट के लोगों के सामने अब एक नया प्रशासनिक चरण है—अपने पुराने मतदाता रिकॉर्ड, पहचान और निवास से जुड़े दस्तावेजों के साथ यह साबित करना कि वे संबंधित क्षेत्र के पात्र मतदाता हैं।

लेकिन बेला एस्टेट की जमीन पर खड़ा होकर देखने पर सवाल इससे बड़ा दिखाई देता है।

जब किसी परिवार के घर को तोड़ा जाता है, वह परिवार उसी इलाके के आसपास किसी दूसरी जगह जाकर रहने लगता है और उसका पुराना पता मतदाता रिकॉर्ड में दर्ज रहता है, तो मतदाता सूची को अपडेट करने की जिम्मेदारी और नागरिक को अपने मताधिकार की रक्षा करने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

बेला एस्टेट के 729 मतदाताओं में से 728 नामों का ड्राफ्ट रोल से बाहर होना इसी सवाल का सबसे असाधारण उदाहरण है।

यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अब देखना यह है कि claims and objections की प्रक्रिया में इन लोगों में से कितने लोगों के नाम वापस मतदाता सूची में शामिल होते हैं और किन आधारों पर निर्णय लिया जाता है।क्योंकि किसी मतदाता का नाम सूची में होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। वह यह तय करता है कि चुनाव के दिन वह व्यक्ति अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर पाएगा या नहीं।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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