September 17, 2026 12:26 pm
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क्या बंगाल में मुसलमानों के खिलाफ़ BJP सरकार ने अभियान छेड़ दिया है

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम नागरिकों की हिरासत, 252 मदरसों पर कार्रवाई, ज्योतिनगर के पानी संकट और IPS बुशरा बानो के तबादले ने भेदभाव और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।

बढ़ते सवाल: हिरासत, मदरसे, पानी और IPS अधिकारी बुशरा बानो का विवाद

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मुसलमानों से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन पर राज्य में नागरिक अधिकार, प्रशासनिक निष्पक्षता और सांप्रदायिक भेदभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हाल के दिनों में घरों से मुस्लिम नागरिकों को उठाकर कथित तौर पर होल्डिंग सेंटर भेजे जाने, 252 मदरसों को बंद करने के आदेश, उत्तर कोलकाता की मुस्लिम बहुल बस्ती में लंबे समय से पानी की आपूर्ति बाधित रहने और मुस्लिम IPS अधिकारी डॉ. बुशरा बानो के तबादले को लेकर विवाद ने इन सवालों को और तीखा कर दिया है।

इन घटनाओं को एक ही राजनीतिक निष्कर्ष में समेटना आसान है, लेकिन उपलब्ध सूचनाओं में आरोप और सरकारी दावे अलग-अलग हैं। इसलिए इन मामलों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

घरों से उठाए गए मुस्लिम नागरिकों का मामला

14 सितंबर 2026 को प्रकाशित Scroll की एक विस्तृत रिपोर्ट में मुर्शिदाबाद और उत्तर बंगाल के कुछ मुस्लिम परिवारों की आपबीती सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, जून से अब तक कम-से-कम नौ मुस्लिम पुरुषों और दो बच्चों को पुलिस ने उनके घरों से उठाकर होल्डिंग या डिटेंशन सेंटर भेजा। परिवारों का आरोप है कि उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

रिपोर्ट में जिन लोगों का उल्लेख है, उनमें इब्राहिम शेख, जलील अख्तर, अब्दुल जब्बार, साहिन शेख और जिबोन शेख शामिल हैं। Scroll के अनुसार, हिरासत में लिए गए कम-से-कम चार लोगों ने चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया से जुड़ी जांच का सामना किया था।

इब्राहिम शेख: दस्तावेज होने के बावजूद हिरासत का आरोप

मुर्शिदाबाद के रामकांतपुर गांव के 61 वर्षीय इब्राहिम शेख के परिवार के मुताबिक, 29 जुलाई की आधी रात के बाद कुछ लोग उनके घर पहुंचे। परिवार ने बताया कि वे पुलिसकर्मी प्रतीत हो रहे थे और उन्होंने इब्राहिम से दस्तावेज मांगे।

परिवार के मुताबिक, इब्राहिम ने आधार और वोटर कार्ड समेत दस्तावेज दिखाए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। बाद में परिवार को पता चला कि उन्हें एक होल्डिंग सेंटर भेजा गया है। Scroll के अनुसार, इब्राहिम के मामले में परिवार ने जमीन, मतदाता सूची और रोजगार से जुड़े दस्तावेज भी होने की बात कही है।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नागरिकता को लेकर किसी व्यक्ति पर संदेह और उसके खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई के बीच प्रक्रिया और सुनवाई का सवाल पैदा होता है।

जलील अख्तर और भाषा को लेकर सवाल

67 वर्षीय जलील अख्तर का मामला भी इस विवाद का हिस्सा है। Scroll के अनुसार, पुलिस ने उनके बांग्लादेशी होने का संदेह जताया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अख्तर सूरजापुरी भाषा बोलते हैं।

सूरजापुरी उत्तर बंगाल और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में बोली जाने वाली भाषा है, जिसमें मैथिली, हिंदी और बंगाली के तत्व पाए जाते हैं। इसलिए केवल भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता निर्धारित करना अपने आप में पर्याप्त नागरिकता प्रमाण नहीं हो सकता।

अख्तर के मामले में विवाद और गंभीर इसलिए हुआ क्योंकि Scroll के अनुसार उन्हें हिरासत में लेने के बाद भारत से बाहर भेजने का प्रयास भी किया गया। रिपोर्ट में उत्तर दिनाजपुर की अदालत में दाखिल पुलिस रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि बायोमेट्रिक और निर्वासन संबंधी औपचारिकताएं पूरी की गई थीं तथा उन्हें BSF को सौंपा गया था, लेकिन उन्होंने भारतीय नागरिक होने का दावा किया और बाद में उन्हें पुलिस हिरासत में वापस कर दिया गया।

अब्दुल जब्बार के मामले में परिवार के टूटने का आरोप

मुर्शिदाबाद में अब्दुल जब्बार का मामला इस पूरी कहानी का सबसे गंभीर मानवीय पहलू सामने लाता है।

Scroll के अनुसार, पुलिस ने जब्बार को बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया। उनके साथ उनके आठ और छह साल के दो बेटे भी ले जाए गए। उनका 11 महीने का तीसरा बच्चा मां के साथ रह गया।

परिवार का कहना है कि जब्बार को वर्षों पहले उनके नाना-नानी से गोद लिया गया था और उनके पास भारतीय दस्तावेज मौजूद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार को एक बांग्लादेशी जन्म प्रमाणपत्र दिखाया गया, जिसे परिवार ने फर्जी बताया।

इस कार्रवाई के बाद जब्बार की पत्नी की तबीयत बिगड़ने और अस्पताल में भर्ती होने की भी रिपोर्ट सामने आई। परिवार का कहना है कि उन्हें अपने पति और दोनों बच्चों की स्थिति को लेकर लंबे समय तक स्पष्ट जानकारी नहीं मिली।

इन मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है, तो क्या उसे हिरासत या निर्वासन की प्रक्रिया में भेजने से पहले प्रभावी सुनवाई और अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया गया?

252 मदरसों को बंद करने का आदेश

दूसरा बड़ा विवाद पश्चिम बंगाल में मदरसों को लेकर है।

राज्य सरकार ने एक राज्यव्यापी सर्वे के बाद 252 मदरसों को बंद करने का आदेश दिया है, जबकि लगभग 100 अन्य मदरसों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। सरकार का कहना है कि इन संस्थानों में आवश्यक अनुमति, आधारभूत ढांचे और नियामकीय मानकों का पालन नहीं किया जा रहा था।

सरकार के अनुसार राज्य में 2,132 मदरसे अनुमोदित आधार पर चल रहे हैं, जबकि सर्वे में 2,396 ऐसे मदरसों की पहचान हुई जिन्हें आवश्यक अनुमति या पंजीकरण प्राप्त नहीं था। सरकार ने कहा है कि जिन संस्थानों के पास आवश्यक अनुमति नहीं है, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

सबसे अधिक बंदी नोटिस मालदा में दिए गए, इसके बाद उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद और नदिया का स्थान बताया गया है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: सरकारी कार्रवाई को अपने आप में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कार्रवाई साबित नहीं माना जा सकता, जब तक यह स्थापित न हो कि समान परिस्थितियों वाले गैर-मुस्लिम संस्थानों के साथ अलग व्यवहार किया गया। दूसरी ओर, यदि किसी धार्मिक समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों पर disproportionately कार्रवाई का आरोप है, तो पारदर्शिता, समान मानदंड और अपील की प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।

ज्योतिनगर कॉलोनी में 5,000 लोगों के लिए पानी का संकट

उत्तर कोलकाता के कॉसिपोर इलाके की ज्योतिनगर कॉलोनी से पानी को लेकर एक अलग विवाद सामने आया है।

Alt News की 12 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, कॉलोनी के पांच सार्वजनिक नलों से लंबे समय से पानी नहीं आ रहा था। वहां लगभग 5,000 लोग रहते हैं और आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय से संबंधित है। रिपोर्ट के अनुसार, पाइपलाइन से जुड़े काम के बाद पानी की आपूर्ति बाधित हुई और समस्या कई सप्ताह तक जारी रही।

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि पानी की आपूर्ति जानबूझकर बंद की गई है और इसका संबंध इलाके से जुड़े बेदखली विवाद तथा राजनीतिक भेदभाव से है। यह स्थानीय निवासियों का आरोप है, जिसका स्वतंत्र रूप से प्रमाणित होना अलग प्रश्न है।

इस मामले पर दूसरी रिपोर्टों में अवधि को लेकर अंतर भी दिखाई देता है। The Wire ने जून से लगभग 90 दिनों तक पानी कटे रहने की बात लिखी, जबकि Alt News ने जुलाई के अंत से लगभग डेढ़ महीने की अवधि बताई।

इसलिए इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—पानी की आपूर्ति तकनीकी कारण से बाधित हुई या राजनीतिक कारण से? इसका निर्णायक उत्तर प्रशासनिक रिकॉर्ड, पाइपलाइन कार्य के दस्तावेज और स्थानीय निकाय की कार्रवाई से ही मिल सकता है।

मुस्लिम IPS अधिकारी बुशरा बानो का तबादला और ‘अस्सलाम वालेकुम’ विवाद

तीसरा मामला एक मुस्लिम IPS अधिकारी डॉ. बुशरा बानो से जुड़ा है।

बुशरा बानो खड़गपुर में Additional Superintendent of Police के पद पर तैनात थीं। उन्होंने UPSC की तैयारी के अपने अनुभव पर एक वीडियो साझा किया था, जिसमें उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की Residential Coaching Academy की मदद का उल्लेख किया। वीडियो की शुरुआत उन्होंने ‘अस्सलाम वालेकुम’ से की और बातचीत में ‘इंशाअल्लाह’ तथा ‘जज़ाकल्लाह’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।

इसके बाद ‘Hindu Legal Fund’ नाम के एक संगठन ने उनकी शिकायत की। संगठन ने सवाल उठाया कि एक सरकारी अधिकारी को सार्वजनिक संवाद में धार्मिक अभिव्यक्तियों के बजाय ‘वंदे मातरम’ या ‘जय हिंद’ जैसे राष्ट्रीय अभिवादन का इस्तेमाल करना चाहिए।

इसके कुछ ही समय बाद राज्य सरकार ने बुशरा बानो को Additional SP, Kharagpur के पद से हटाकर State Armed Police की चौथी बटालियन में Deputy Commandant नियुक्त कर दिया। सरकार की ओर से इसे ‘public interest’ में किया गया तबादला बताया गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे नियमित तबादला भी बताया।

दूसरी ओर, विपक्षी नेताओं ने इस घटनाक्रम को धार्मिक पहचान और सरकारी सेवा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठाए हैं। तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने तबादले की आलोचना की।

इस मामले में उपलब्ध रिपोर्टिंग के आधार पर यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि तबादला केवल धार्मिक अभिव्यक्तियों के कारण हुआ। लेकिन शिकायत और तबादले के बीच कम समय का अंतर सार्वजनिक बहस का कारण जरूर बना है।

क्या ये घटनाएं एक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं?

इन चार घटनाओं—मुस्लिम नागरिकों की हिरासत, मदरसों पर कार्रवाई, ज्योतिनगर में पानी का संकट और बुशरा बानो का तबादला—को एक साथ देखने पर एक व्यापक राजनीतिक सवाल जरूर उठता है: क्या पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक फैसलों का मुस्लिम समुदाय पर असमान प्रभाव पड़ रहा है?

लेकिन इस सवाल का जवाब देने के लिए अलग-अलग मामलों में समानता के ठोस प्रमाण जरूरी हैं।

हिरासत के मामलों में यह देखना होगा कि नागरिकता जांच की प्रक्रिया क्या थी, किन दस्तावेजों को स्वीकार किया गया, संबंधित लोगों को सुनवाई का कितना अवसर मिला और निर्वासन की कार्रवाई किस कानूनी आधार पर शुरू की गई।

मदरसों के मामले में यह देखना होगा कि क्या बंद किए गए 252 संस्थानों के लिए समान नियामकीय मानदंड लागू किए गए और क्या गैर-मदरसा या गैर-मुस्लिम संस्थानों पर भी वही नियम समान रूप से लागू किए जा रहे हैं।

पानी के मामले में पाइपलाइन और नगर निगम के रिकॉर्ड यह स्पष्ट कर सकते हैं कि आपूर्ति क्यों बंद हुई और इतने लंबे समय तक उसे बहाल क्यों नहीं किया गया।

और बुशरा बानो के मामले में सरकार के तबादला आदेश तथा उसके प्रशासनिक कारण यह तय करने में अधिक उपयोगी होंगे कि यह सामान्य प्रशासनिक फेरबदल था या विवाद के बाद लिया गया निर्णय।

नागरिकता और धर्म के बीच रेखा

पश्चिम बंगाल का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की भौगोलिक स्थिति बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़ी है। बांग्लादेश से अवैध आव्रजन और भारतीय नागरिकता का सवाल लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।

लेकिन अवैध प्रवासन की जांच और किसी भारतीय नागरिक को विदेशी घोषित करने के बीच एक बुनियादी कानूनी अंतर है।

यदि किसी भारतीय नागरिक को केवल उसके नाम, धर्म, भाषा, क्षेत्रीय पहचान या दस्तावेजों पर संदेह के आधार पर विदेशी मान लिया जाए, तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करेगा। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति के विदेशी होने के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं, तो राज्य को कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का अधिकार है।

इसलिए असली कसौटी यही है कि क्या कानून सभी पर समान रूप से लागू हो रहा है और क्या प्रत्येक व्यक्ति को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिल रहा है।

सवाल सिर्फ मुसलमानों का नहीं, संवैधानिक अधिकारों का है

पश्चिम बंगाल में चल रही मौजूदा बहस को केवल भाजपा बनाम विपक्ष या हिंदू बनाम मुस्लिम के फ्रेम में देखना इस पूरे विवाद के संवैधानिक पक्ष को छोटा कर देगा।

नागरिकता की जांच हो या किसी संस्था का नियमन, सरकारी सुविधा हो या किसी अधिकारी का तबादला—राज्य की कार्रवाई के लिए पारदर्शी नियम और समान प्रशासनिक मानदंड जरूरी हैं।

यदि किसी समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसके धर्म के कारण उसे अतिरिक्त संदेह, अतिरिक्त निगरानी या बुनियादी सुविधाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता है।

और यदि सरकार के पास इन आरोपों के पीछे वैध प्रशासनिक कारण हैं, तो उन कारणों को सार्वजनिक करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की हालिया घटनाओं पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि राजनीतिक आरोप किसका सही है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई दस्तावेजी, पारदर्शी, समान और न्यायिक समीक्षा के योग्य प्रक्रिया के तहत हो रही है?

आने वाले दिनों में अदालतों, प्रशासनिक रिकॉर्ड और संबंधित सरकारी स्पष्टीकरण इन सवालों के जवाब देने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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