September 12, 2026 11:45 pm
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क्या सरकारी प्लेट पर बदल रहा है भारत?

UP की One District One Cuisine सूची में 208 व्यंजन हैं, लेकिन एक भी नॉन-वेज नहीं। BRICS में भी Veg Menu। क्या भारत की खाद्य विविधता को सरकारी मंचों पर चुनिंदा रूप में दिखाया जा रहा है?

यूपी की थाली से BRICS तक शाकाहार की राजनीति

उत्तर प्रदेश की ‘One District, One Cuisine’ सूची में 75 जिलों के 208 व्यंजन हैं, लेकिन एक भी मांसाहारी व्यंजन नहीं। BRICS के अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भी भारत की पाक-संस्कृति को शाकाहारी मेन्यू के जरिए पेश किया गया। सवाल यह नहीं कि शाकाहारी भोजन क्यों परोसा गया—सवाल यह है कि क्या भारत की विविध खाद्य-संस्कृति को सरकारी मंचों पर चुनिंदा रूप में पेश किया जा रहा है?

भारत को दुनिया के सामने किस तरह पेश किया जाए—यह केवल कूटनीति, पर्यटन या संस्कृति का सवाल नहीं है। यह राजनीति का भी सवाल है। और इन दिनों यह सवाल खाने की मेज पर दिखाई दे रहा है।

एक तरफ भारत की विशाल खाद्य-संस्कृति है, जिसमें क्षेत्र, जाति, समुदाय, धर्म, जलवायु और इतिहास के आधार पर खान-पान की असाधारण विविधता है। दूसरी तरफ सरकारी आयोजनों और सरकारी ब्रांडिंग में शाकाहारी भारत की एक विशेष छवि लगातार अधिक दिखाई दे रही है।

उत्तर प्रदेश की नई ‘One District, One Cuisine’ (ODOC) पहल इसका सबसे ताजा उदाहरण है।

75 जिले, 208 व्यंजन—लेकिन एक भी नॉन-वेज नहीं

उत्तर प्रदेश सरकार ने 75 जिलों के लिए 208 पारंपरिक खाद्य पदार्थों की पहचान की है। योजना का उद्देश्य स्थानीय व्यंजनों को ब्रांडिंग, बेहतर पैकेजिंग, बाजार और निर्यात के जरिए राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। इसके लिए ₹75 करोड़ के बजट का प्रावधान भी किया गया है।

लेकिन इस सूची में एक बात खास तौर पर ध्यान खींचती है—एक भी गैर-शाकाहारी व्यंजन शामिल नहीं है।

और यही वह बिंदु है जहां भोजन, संस्कृति और राजनीति एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं।

लखनऊ की पहचान केवल रेवड़ी, चाट और मलाई-मक्खन से नहीं बनती। अवध की पाक परंपरा में गलौटी कबाब, काकोरी कबाब और बिरयानी जैसी चीजें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। लेकिन ODOC की सूची में ये गायब हैं। इसी तरह रामपुर की पाक परंपरा में मांसाहारी व्यंजनों की ऐतिहासिक भूमिका रही है, लेकिन सरकारी सूची में उसका प्रतिनिधित्व भी गैर-मांसाहारी व्यंजनों से होता है।

यह महज किसी एक व्यंजन को सूची में शामिल या बाहर रखने का सवाल नहीं है। यह सवाल है कि जब सरकार किसी राज्य की ‘कुलिनरी पहचान’ यानी खाद्य पहचान तैयार करती है, तो वह किस इतिहास को सामने रखती है और किसे पीछे छोड़ देती है।

क्या यह महज संयोग है?

सरकार का तर्क आर्थिक है। ODOC का उद्देश्य स्थानीय व्यंजनों की पहचान, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, पैकेजिंग, पर्यटन और बाजार तक पहुंच बढ़ाना है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे स्थानीय से वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने की पहल के रूप में पेश किया है।

इस उद्देश्य पर सवाल उठाना जरूरी नहीं है। स्थानीय खान-पान को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना निश्चित रूप से रोजगार और छोटे कारोबार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

सवाल इसके प्रतिनिधित्व का है।

अगर किसी राज्य की खाद्य विरासत को दुनिया के सामने पेश करने के लिए 208 व्यंजनों का चयन किया जाए और उसमें एक भी मांसाहारी व्यंजन न हो, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या चयन केवल बाजार और स्वास्थ्य के आधार पर हुआ, या इसमें एक खास सांस्कृतिक दृष्टि भी काम कर रही है?

क्योंकि उत्तर प्रदेश की खाद्य संस्कृति को केवल शाकाहारी व्यंजनों तक सीमित करना ऐतिहासिक रूप से अधूरा चित्र प्रस्तुत करता है।

भारत वास्तव में कितना शाकाहारी है?

यहीं सरकारी और सार्वजनिक विमर्श के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।

अक्सर भारत को एक शाकाहारी देश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन उपलब्ध सर्वेक्षण इस तस्वीर को कहीं अधिक जटिल बताते हैं।

NFHS-5 के 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार, 15–49 वर्ष के 83.4% पुरुष और 70.6% महिलाएं मछली, चिकन या मांस रोजाना, साप्ताहिक या कभी-कभार खाने की बात कहते हैं। पुरुषों में 57.3% और महिलाओं में 45.1% ने कम से कम सप्ताह में एक बार मछली, चिकन या मांस खाने की सूचना दी।

इससे यह कहना अधिक सटीक होगा कि भारत में गैर-शाकाहारी भोजन खाने वाली आबादी बहुत बड़ी है और 15–49 आयु वर्ग में यह बहुसंख्यक है।

लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। ‘नॉन-वेज’ की परिभाषा हर सर्वे में समान नहीं है। इसलिए “70% से ज्यादा भारतीय नॉन-वेज हैं” जैसे वाक्य को पूरे भारत की हर आयु और हर आबादी पर लागू करने के बजाय सर्वेक्षण की परिभाषा और आयु-सीमा के साथ इस्तेमाल करना ज्यादा तथ्यात्मक होगा।

Pew Research Center के सर्वे में 61% भारतीय वयस्कों ने खुद को vegetarian नहीं बताया, जबकि 39% ने vegetarian होने की बात कही। साथ ही, बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो कुछ खास दिनों या कुछ खास मांस से परहेज करते हैं।

यानी भारत की वास्तविक तस्वीर न तो पूरी तरह ‘शाकाहारी भारत’ है और न ही पूरी तरह ‘मांसाहारी भारत’।

भारत की वास्तविकता है—खाने की विविधता।

फिर सरकारी आयोजनों में केवल शाकाहारी भारत क्यों?

यही सवाल BRICS के आयोजन को लेकर भी उठता है।

भारत में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के लिए विशेष शाकाहारी मेन्यू तैयार किया गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मेन्यू में भारतीय शाकाहारी व्यंजनों के साथ अंतरराष्ट्रीय vegetarian dishes भी शामिल थीं। उद्देश्य भारत की विविध शाकाहारी पाक परंपरा को प्रदर्शित करना और उसे सांस्कृतिक तथा कूटनीतिक ‘soft power’ के रूप में इस्तेमाल करना बताया गया।

इस दृष्टि से देखें तो शाकाहारी मेन्यू अपने आप में कोई असामान्य या गलत कदम नहीं है।

भारत के पास दुनिया को दिखाने के लिए विशाल शाकाहारी culinary tradition है—दालें, पनीर, चाट, मिलेट्स, मिठाइयां, क्षेत्रीय अनाज, सब्जियां और असंख्य स्थानीय व्यंजन।

लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब एक विविध देश को बार-बार केवल उसके शाकाहारी चेहरे से प्रस्तुत किया जाए।

भारत की खाद्य-संस्कृति में कबाब भी हैं और कचौड़ी भी। बिरयानी भी है और खिचड़ी भी। मछली भी है, दाल भी। चिकन भी है, पनीर भी। दक्षिण का मांसाहारी भोजन भी है और राजस्थान की शाकाहारी परंपराएं भी।

इन सबको मिलाकर भारत बनता है।

भोजन को ‘भारतीय संस्कृति’ का एक ही चेहरा बनाने का खतरा

खाने की राजनीति भारत में नई नहीं है।

भोजन हमेशा से पहचान का हिस्सा रहा है। किस समुदाय का भोजन क्या है, कौन क्या खाता है, कौन किसके घर खाना खाता है—इन सवालों के साथ धर्म, जाति और सामाजिक संबंध जुड़े रहे हैं।

Pew Research Center के अनुसार, भारत में खान-पान पर धार्मिक और सामाजिक प्रतिबंध काफी व्यापक हैं। लगभग आठ में से दस भारतीय किसी न किसी रूप में मांस के सेवन को सीमित करते हैं—लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सभी vegetarian हैं।

यही फर्क महत्वपूर्ण है।

मांस कम खाना और vegetarian होना एक ही बात नहीं है।

इसी तरह किसी सरकारी कार्यक्रम में vegetarian खाना परोसना और पूरे देश को vegetarian देश की तरह प्रस्तुत करना भी दो अलग बातें हैं।

उत्तर प्रदेश के मामले में सवाल और बड़ा है

उत्तर प्रदेश की खाद्य संस्कृति विशेष रूप से मिश्रित और बहुस्तरीय रही है।

अवध की शाही रसोई, मुगल और नवाबी प्रभाव, स्थानीय ग्रामीण भोजन, पूर्वांचल की परंपराएं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दुग्ध और अनाज आधारित व्यंजन, बनारस की चाट-पकवान संस्कृति—इन सबने मिलकर आज का UP food culture बनाया है।

सरकार खुद ODOC को राज्य की culinary heritage को वैश्विक स्तर पर ले जाने की योजना बता रही है।

तो फिर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है:

अगर लक्ष्य पूरी culinary heritage को दुनिया के सामने रखना है, तो क्या चयन में हर प्रमुख खाद्य परंपरा का प्रतिनिधित्व होना चाहिए?

इस सवाल का उत्तर राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी हो सकता है।

लखनऊ की पहचान सिर्फ मलाई-मक्खन नहीं

लखनऊ को UNESCO Creative City of Gastronomy के संदर्भ में भी पेश किया गया है। ODOC की पूरी सोच में लखनऊ की खाद्य विरासत एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन लखनऊ की पहचान को अगर सिर्फ रेवड़ी, आम, चाट और मलाई-मक्खन तक सीमित कर दिया जाए तो उसकी culinary history का एक बड़ा हिस्सा गायब हो जाता है।

टुंडे कबाब, गलौटी कबाब, काकोरी कबाब और अवध की बिरयानी केवल ‘मांसाहारी खाना’ नहीं हैं। वे एक विशिष्ट ऐतिहासिक पाक परंपरा, तकनीक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का हिस्सा हैं।

उन्हें सरकारी culinary map से बाहर रखना इसलिए सिर्फ खाने की पसंद का प्रश्न नहीं रह जाता।

यह इतिहास के चयन का प्रश्न बन जाता है।

क्या शाकाहार को बढ़ावा देना गलत है?

नहीं।

शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने के कई वैध कारण हो सकते हैं—स्वास्थ्य, पर्यावरण, धार्मिक संवेदनशीलता, टिकाऊ कृषि, स्थानीय अनाज और अंतरराष्ट्रीय dietary preferences।

BRICS जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन में vegetarian menu रखना भी मेजबान देश की culinary diplomacy का हिस्सा हो सकता है। भारत अपनी दाल, मिलेट्स, सब्जियों, मसालों और शाकाहारी पाक परंपराओं को दुनिया के सामने क्यों न रखे?

समस्या तब पैदा होती है जब पसंद को प्रतिनिधित्व का विकल्प बना दिया जाए।

एक vegetarian menu यह नहीं कहता कि भारत vegetarian है।

लेकिन यदि सरकारी प्रचार लगातार केवल vegetarian India दिखाता है, तो अंतरराष्ट्रीय दर्शक के सामने भारत की एक अधूरी तस्वीर बन सकती है।

भारत की असली ताकत ‘Veg vs Non-Veg’ नहीं, विविधता है

भारत को दुनिया के सामने किसी एक खाद्य पहचान की जरूरत नहीं है।

भारत की ताकत उसकी विविधता है।

एक ही देश में राजस्थान का दाल-बाटी-चूरमा है, पंजाब का मांसाहारी और शाकाहारी दोनों भोजन है, बंगाल की मछली है, केरल का विविध seafood cuisine है, तमिलनाडु का non-vegetarian food है, उत्तर प्रदेश की अवध रसोई है और साथ ही विशाल शाकाहारी परंपरा भी।

अगर भारत culinary superpower बनना चाहता है तो उसे एक भारत, एक थाली नहीं बल्कि अनेक भारत, अनेक थालियां दुनिया को दिखानी होंगी।

असली सवाल

इसलिए सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार ने BRICS में vegetarian food क्यों परोसा।

न ही सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने शाकाहारी व्यंजनों को क्यों चुना।

सवाल इससे बड़ा है:

क्या भारत की सरकारी culinary branding देश की वास्तविक खाद्य विविधता को प्रतिबिंबित कर रही है?

और उत्तर प्रदेश के मामले में:

क्या 75 जिलों की culinary identity को 208 शाकाहारी व्यंजनों के जरिए पूरी तरह समझा जा सकता है, जबकि उसी राज्य की कुछ सबसे प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय खाद्य पहचानें—अवधी बिरयानी, गलौटी कबाब और काकोरी कबाब जैसी—इस तस्वीर से बाहर हैं?

खाने की मेज पर यह सवाल छोटा लग सकता है।

लेकिन जब वही खाना सरकार की तरफ से देश की संस्कृति, पर्यटन और वैश्विक पहचान के रूप में पेश किया जाता है, तब यह सवाल बहुत बड़ा हो जाता है।

क्योंकि किसी देश की थाली सिर्फ भोजन नहीं होती।

वह उसकी स्मृति, इतिहास, समाज और विविधता का दस्तावेज भी होती है।

और भारत की उस थाली में सिर्फ शाकाहार नहीं है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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