जस्टिस दीपक गुप्ता ने पूछे तीखे सवाल, उमर खालिद से लेकर ‘बहुसंख्यकवाद’ तक
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जमानत, असहमति के अधिकार और न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चेताया है कि अगर लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा खत्म हुआ तो लोकतंत्र के लिए इसके गंभीर परिणाम होंगे।
भारत की आजादी का अर्थ क्या है? क्या विदेशी शासन से मुक्ति ही आजादी है, या आजादी का मतलब यह भी है कि नागरिक बिना डर के सोच सकें, बोल सकें और सत्ता से असहमति जता सकें?
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपने लेख “The True Meaning of Freedom” में इन सवालों को न्यायपालिका के कामकाज से जोड़ते हुए कई गंभीर मुद्दे उठाए हैं। यह लेख 7 सितंबर 2026 को The Tribune में प्रकाशित हुआ था।
जस्टिस गुप्ता का मूल तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक स्वतंत्रता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उसकी न्यायपालिका स्वतंत्र, निडर और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली हो।
‘जेल, जमानत नहीं—नियम बन गया है’
जस्टिस गुप्ता ने सबसे तीखा सवाल व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक हिरासत को लेकर उठाया है।
कानून की दुनिया में लंबे समय से कहा जाता है कि “Bail, not jail, is the rule” यानी जमानत सामान्य नियम और जेल अपवाद होना चाहिए। लेकिन जस्टिस गुप्ता के मुताबिक व्यवहार में स्थिति इसके उलट होती जा रही है।
उन्होंने जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 75 प्रतिशत कैदी अंडरट्रायल हैं। उनका सवाल है कि जब किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं किया गया है, तो वर्षों तक जेल में रखना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार के साथ कैसे न्यायसंगत हो सकता है?
इसी संदर्भ में उन्होंने उमर खालिद का मामला उठाया। जस्टिस गुप्ता के अनुसार, उमर खालिद छह साल से अधिक समय से जेल में हैं और उनके मामले में अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। उन्होंने सवाल किया—उनकी स्वतंत्रता के अधिकार और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का क्या होगा?
जस्टिस गुप्ता का कहना है कि जब मुकदमे की प्रक्रिया ही वर्षों तक चलती रहे तो “process has become the punishment”—यानी प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।
उन्होंने एल्गार परिषद मामले का भी उल्लेख किया और सवाल उठाया कि अगर आरोप इतने गंभीर हैं तो मुकदमा शुरू करने में उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई गई।
सोनम वांगचुक की हिरासत पर भी सवाल
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवाल पर जस्टिस गुप्ता ने सोनम वांगचुक की हिरासत का उदाहरण भी दिया।
उनका कहना है कि हैबियस कॉर्पस जैसी याचिकाओं, जिनमें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल हो, का फैसला जल्द होना चाहिए। उनके अनुसार वांगचुक की हिरासत से जुड़ी याचिका पर बार-बार सुनवाई टलती रही और बाद में हिरासत आदेश वापस लिए जाने पर मामला निष्प्रभावी मान लिया गया।
जस्टिस गुप्ता का तर्क है कि अदालत को यह तय करना चाहिए था कि हिरासत कानूनी थी या नहीं। उनके मुताबिक किसी नागरिक को एक दिन के लिए भी उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया जाए तो उसे यह जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों किया गया।
लोकतंत्र बनाम ‘बहुसंख्यकवाद’
जस्टिस गुप्ता की चिंता केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। उन्होंने न्यायपालिका में majoritarianism यानी बहुसंख्यकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया है।
उनका कहना है कि लोकतंत्र बहुमत के शासन पर आधारित है, लेकिन लोकतंत्र और बहुसंख्यकवाद एक ही चीज नहीं हैं। जब बहुमत की आवाज के सामने दूसरे पक्ष की आवाज सुनी ही न जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि अदालतों के विभिन्न स्तरों पर भी ऐसी प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।
राम जन्मभूमि और ज्ञानवापी मामलों का उदाहरण
इस संदर्भ में जस्टिस गुप्ता ने राम जन्मभूमि और ज्ञानवापी मामलों का उल्लेख किया।
उनके मुताबिक राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थलों से जुड़े दूसरे विवादों को फिर से खोलने के खिलाफ टिप्पणी की थी। लेकिन बाद में ज्ञानवापी मामले में एएसआई सर्वे से जुड़े आदेश को लेकर उन्होंने सवाल उठाया।
जस्टिस गुप्ता का मानना है कि इस तरह के आदेशों ने आगे मुकदमों के लिए रास्ता खोला और इससे अलग-अलग समुदायों के बीच सामाजिक संबंधों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने इसे बहुसंख्यक समुदाय को खुश करने की दिशा में लिया गया फैसला बताया।
यह जस्टिस गुप्ता की आलोचनात्मक राय है, न कि अदालत के फैसलों का कोई नया न्यायिक निष्कर्ष।
गंगा में चिकन और शराब का उदाहरण
जस्टिस गुप्ता ने न्याय व्यवस्था में समानता और जमानत के सवाल को समझाने के लिए गंगा में हुई दो अलग-अलग घटनाओं का भी उल्लेख किया।
उन्होंने लिखा कि एक मामले में एक विशेष समुदाय के लोगों द्वारा नाव पर गंगा में चिकन खाने के बाद उन्हें महीनों तक जमानत नहीं मिली, जबकि बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों द्वारा उसी नदी में शराब पीने के मामले में कुछ घंटों के भीतर जमानत मिल गई।
जस्टिस गुप्ता ने इन घटनाओं के आधार पर सवाल उठाया कि क्या कानून और न्याय का इस्तेमाल सभी नागरिकों के साथ समान तरीके से हो रहा है।
न्यायिक नियुक्तियों और कॉलेजियम की पारदर्शिता
जस्टिस गुप्ता ने न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।
उन्होंने हाल की सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट नियुक्तियों में ऊंची जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों की अधिक मौजूदगी की ओर ध्यान खींचा। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वह नियुक्त किए गए व्यक्तियों की व्यक्तिगत योग्यता या ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं।
उनका तर्क है कि अगर सुप्रीम कोर्ट पूरे देश की सर्वोच्च अदालत है तो उसमें समाज के सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
इसके पीछे उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था को एक बड़ी समस्या बताया। उनके अनुसार कॉलेजियम महत्वपूर्ण फैसले करता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली पर्याप्त पारदर्शी नहीं है और फैसलों के पीछे के कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए जाते।
न्यायपालिका के साथ बार की स्वतंत्रता भी जरूरी
जस्टिस गुप्ता ने केवल जजों की आलोचना नहीं की है। उन्होंने वकीलों और बार काउंसिलों की भूमिका पर भी सवाल उठाया।
उनका कहना है कि स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए स्वतंत्र बार जरूरी है। वकीलों को अपनी राजनीतिक या जातीय पहचान से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए।
उन्होंने बढ़ती कानूनी फीस और घटते प्रो-बोनो काम पर भी चिंता जताई। बार काउंसिलों की जिम्मेदारियों में वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और कानूनी शिक्षा के स्तर को बनाए रखना शामिल है, लेकिन जस्टिस गुप्ता के अनुसार इन क्षेत्रों में भी गंभीर कमियां हैं।
असहमति लोकतंत्र की ताकत है
जस्टिस गुप्ता के लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा असहमति के अधिकार पर है।
उनके अनुसार लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की आलोचना करने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। विरोध प्रदर्शन से आम लोगों को असुविधा हो सकती है, लेकिन उनका तर्क है कि प्रभावी विरोध पूरी तरह असुविधा-मुक्त नहीं हो सकता।
उन्होंने अदालतों द्वारा प्रदर्शनों को सीमित करने संबंधी टिप्पणियों पर भी सवाल उठाया और पूछा कि अगर अदालतें नागरिकों के विरोध के अधिकार को सीमित करने की बात करेंगी, तो क्या वे उसी नागरिक के असहमति के अधिकार की रक्षा भी करेंगी?
जस्टिस गुप्ता के लिए असहमति केवल राजनीतिक अधिकार नहीं बल्कि लोकतंत्र का मूल तत्व है। उन्होंने अपने लेख का समापन J. William Fulbright के इस विचार से किया कि “In a democracy, dissent is an act of faith.”
‘ब्लैक शीप’ बढ़ने पर आत्ममंथन की जरूरत
जस्टिस गुप्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना पूरी न्यायपालिका के खिलाफ नहीं है।
उनका कहना है कि न्यायपालिका में अधिकांश जज ईमानदार और सक्षम हैं। लेकिन उनके मुताबिक गलत आचरण करने वाले जजों की संख्या बढ़ने की चिंता गंभीर है।
उन्होंने शीर्ष स्तर पर बैठे जजों से आत्ममंथन करने और न्यायपालिका की विश्वसनीयता वापस हासिल करने के लिए कदम उठाने की अपील की है।
उनकी सबसे बड़ी चेतावनी यही है कि न्यायपालिका की ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकारों में नहीं बल्कि जनता के विश्वास में है।
अगर नागरिकों का न्यायपालिका से भरोसा उठ गया तो अदालतें अप्रासंगिक होती चली जाएंगी। और ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा होगी।
जस्टिस दीपक गुप्ता का सवाल इसलिए केवल अदालतों से नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे से है—क्या भारत में स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता बदलना है, या हर नागरिक को बिना डर के बोलने, असहमति जताने और न्याय पाने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
