September 17, 2026 11:58 pm
Home » देशकाल » ABVP-NSUI की टक्कर में AISA-SFI की एंट्री

ABVP-NSUI की टक्कर में AISA-SFI की एंट्री

DUSU Election 2026 में ABVP, NSUI और AISA-SFI के बीच मुकाबला है। हॉस्टल, छात्र सुरक्षा, पेपर लीक, हिंसा और सोशल मीडिया बने चुनाव के बड़े मुद्दे।

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में हॉस्टल से हिंसा और सोशल मीडिया तक कई मुद्दे

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU चुनाव इस बार सिर्फ ABVP और NSUI के बीच पारंपरिक मुकाबला नहीं रह गया है। AISA और SFI के गठबंधन की मजबूत मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। वहीं, जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए छात्र आंदोलन और सितंबर में सत्य निकेतन के छात्र-आवास हादसे के बाद इस बार कैंपस के मुद्दे भी बदले हुए दिखाई दे रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव के लिए 18 सितंबर 2026 को मतदान होगा और 19 सितंबर को मतगणना की जाएगी। इस बार अध्यक्ष पद के लिए सात, उपाध्यक्ष के लिए पांच और सचिव तथा संयुक्त सचिव पद के लिए चार-चार उम्मीदवार मैदान में हैं।

ABVP के दबदबे के बीच बदला चुनावी माहौल

DUSU चुनाव लंबे समय से राष्ट्रीय छात्र राजनीति का महत्वपूर्ण मंच रहा है। पिछले चुनाव में ABVP ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की थी, जबकि NSUI को एक पद मिला था। ABVP के आर्यन मान अध्यक्ष चुने गए थे।

लेकिन 2026 के चुनाव में कैंपस का राजनीतिक माहौल कई घटनाओं से प्रभावित है। पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के आंदोलनों और सत्य निकेतन में छात्र-आवास की इमारत गिरने की घटना ने छात्र सुरक्षा और जवाबदेही को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है।

सत्य निकेतन में सितंबर की शुरुआत में पांच मंजिला छात्र-आवासीय इमारत गिरने से कई लोगों की मौत हुई, जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र भी शामिल थे। इस हादसे ने दिल्ली में छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की समस्या को फिर सामने ला दिया।

हॉस्टल बना बड़ा चुनावी मुद्दा

DUSU चुनाव में इस बार छात्रावास और सुरक्षित छात्र आवास प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में सीमित हॉस्टल क्षमता के कारण बड़ी संख्या में छात्र निजी PG और किराये के कमरों में रहने को मजबूर हैं। सत्य निकेतन हादसे के बाद इन निजी आवासों की सुरक्षा और नियमन पर सवाल और तेज हुए हैं।

AISA-SFI गठबंधन ने हॉस्टल की कमी को अपने अभियान के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है और हर कॉलेज में हॉस्टल की मांग उठाई है। गठबंधन ने किराये के आवास को लेकर भी सरकारी हस्तक्षेप की मांग की है। दूसरी ओर ABVP ने अपने ‘आवास’ एजेंडे में छात्राओं के लिए अलग हॉस्टल, Student Housing Cell और सुरक्षा ऑडिट जैसे प्रस्ताव रखे हैं।

यानी इस बार छात्र राजनीति की बहस सिर्फ विचारधारा या संगठनात्मक ताकत तक सीमित नहीं है। छात्रों के लिए सुरक्षित घर, हॉस्टल, फीस, कैंपस सुविधाएं और सुरक्षा जैसे रोजमर्रा के सवाल भी चुनाव के केंद्र में हैं।

ABVP, NSUI और AISA-SFI: तीन धाराओं का मुकाबला

इस चुनाव में ABVP ने यश डबास को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया है। उसके पैनल में उपाध्यक्ष के लिए इशू मौर्य, सचिव के लिए रिया छाबड़ी और संयुक्त सचिव के लिए लक्ष्यराज सिंह हैं।

NSUI ने अध्यक्ष पद के लिए विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष के लिए वीर छत्रथ, सचिव के लिए नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव के लिए गोपाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया है।

वहीं AISA-SFI ने संयुक्त पैनल उतारा है। अनन्या रतूरी अध्यक्ष, अक्षत शिखर उपाध्यक्ष, स्टैंजिन डेस्क्योंग सचिव और बी. परिजात संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार हैं।

अनन्या रतूरी छात्र आंदोलनों और कैंपस में महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों से जुड़ी रही हैं। अक्षत शिखर ने NEET-UG पेपर लीक और अन्य छात्र आंदोलनों में हिस्सा लिया है। स्टैंजिन डेस्क्योंग लद्दाख से आती हैं और इस चुनाव में उनकी उम्मीदवारी को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

‘ABVP Go Back’ के नारे और बढ़ता टकराव

चुनाव प्रचार के दौरान कुछ कॉलेजों में ABVP के खिलाफ विरोध और ‘ABVP Go Back’ जैसे नारे भी देखने को मिले हैं। इसी दौरान विभिन्न छात्र संगठनों के बीच झड़पों और हमलों के आरोप भी सामने आए हैं।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ABVP और NSUI दोनों ने एक-दूसरे के कार्यकर्ताओं पर हमले और डराने-धमकाने के आरोप लगाए हैं। यानी हिंसा और चुनावी माहौल भी इस बार एक अहम सवाल बन गया है।

वीडियो में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनमें SFI के संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार बी. परिजात से जुड़ी कथित मारपीट भी शामिल है। ऐसे आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए; चुनावी हिंसा के प्रत्येक मामले में स्वतंत्र जांच और आधिकारिक कार्रवाई अलग-अलग विषय हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी चुनाव प्रचार के दौरान हिंसा और चुनावी नियमों के कथित उल्लंघनों पर गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि नियमों का पालन नहीं होने पर चुनाव के परिणाम या मतगणना पर भी असर पड़ सकता है।

पोस्टर, पर्चे, गाड़ियां और चुनावी आचार संहिता

DUSU चुनाव का एक पुराना चेहरा इस बार भी दिखाई दे रहा है—सड़कों पर बिखरे पर्चे, वाहनों के काफिले और जोरदार प्रचार।

दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव नियमों में printed posters, banners, campaign gifts और अनधिकृत वाहनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। विश्वविद्यालय ने उम्मीदवारों को चेतावनी दी है कि नियमों के उल्लंघन पर उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है।

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने चुनाव से पहले 346 चालान जारी किए और 10 वाहन जब्त किए थे। अधिकारियों के मुताबिक गलत पार्किंग और खतरनाक ड्राइविंग प्रमुख उल्लंघनों में शामिल रहे। चुनावी नियमों के तहत प्रचार में लक्जरी वाहनों के इस्तेमाल पर रोक और काफिले में वाहनों की संख्या की सीमा भी है।

अभियान के आखिरी दौर में भी कैंपस में पर्चों और प्रचार सामग्री को लेकर सवाल उठते रहे।

सोशल मीडिया बना नया चुनावी मैदान

इस बार DUSU चुनाव का एक नया पहलू सोशल मीडिया है। कॉलेजों की दीवारों और सड़कों के साथ-साथ छात्रों के मोबाइल फोन भी प्रचार का मैदान बन गए हैं।

रील्स, मीम्स, वीडियो, वायरल क्लिप और संगठन के सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए उम्मीदवार सीधे छात्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक इस बार DUSU अभियान में वायरल रील्स और सोशल मीडिया नैरेटिव Gen Z वोटरों तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम बने हैं।

यानी चुनाव प्रचार का पुराना मॉडल—कैंपस में पोस्टर, पर्चे और नारे—अब डिजिटल प्रचार के साथ जुड़ गया है।

क्या बदल रहा है DUSU चुनाव में?

इस बार DUSU चुनाव को केवल ABVP बनाम NSUI के रूप में देखना तस्वीर को अधूरा छोड़ देगा। AISA-SFI गठबंधन ने संयुक्त पैनल के साथ तीसरी राजनीतिक धारा को मजबूती से सामने रखा है।

साथ ही, छात्र आवास, कैंपस सुरक्षा, पेपर लीक, महिला सुरक्षा और चुनावी हिंसा जैसे मुद्दे संगठनात्मक पहचान से आगे जाकर छात्रों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े सवाल बन गए हैं।

इस चुनाव में कुल 20 उम्मीदवार चार केंद्रीय पदों के लिए मैदान में हैं। इनमें अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमियों के उम्मीदवार शामिल हैं।

अब सवाल यह है कि 18 सितंबर को छात्र किन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं और 19 सितंबर को आने वाले नतीजे DUSU की छात्र राजनीति की दिशा में क्या बदलाव दिखाते हैं।

फिलहाल इतना साफ है कि 2026 का DUSU चुनाव सिर्फ चार पदों की लड़ाई नहीं है। यह कैंपस में छात्र राजनीति के बदलते मुद्दों, नए गठबंधनों और छात्र जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों की भी परीक्षा है।

मुकुल सरल

View all posts

ताजा खबर