जब स्कूल की सड़क, पानी और किराया मांगने बच्चे उतर आए सड़क पर, क्या यही है विकास की असली तस्वीर!
“मोदी जी, इन Gen Alpha के लिए भी रील आप कब बनाएंगे?”
यह सवाल सिर्फ तंज नहीं है। यह उन स्कूली बच्चों की तस्वीर के बीच खड़ा किया गया सवाल है, जो सोशल मीडिया के दौर में पैदा हुए हैं, लेकिन आज भी स्कूल पहुंचने के लिए टूटी सड़क, कीचड़, नाला और पानी जैसी बुनियादी मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
देश में हाल के दिनों में Gen Z के आंदोलनों की चर्चा के बीच अब स्कूल जाने वाले बच्चों की आवाज भी कई जगह सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान तक, अलग-अलग जगहों से सामने आए वीडियो और रिपोर्टों में स्कूली बच्चों को सड़क, स्कूल की सुविधाओं, परिवहन और दूसरे बुनियादी सवालों को लेकर प्रशासन के सामने अपनी बात रखते देखा गया है।
इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में बच्चों का तिरंगा लेकर जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचना खास तौर पर चर्चा में आया। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 300 छात्र-छात्राएं और उनके अभिभावक लगभग छह किलोमीटर पैदल चलकर डीएम कार्यालय पहुंचे और स्कूल तक पक्की सड़क तथा जलभराव की समस्या दूर करने की मांग उठाई।
तिरंगा हाथ में, सवाल स्कूल की सड़क का
हमीरपुर के चंदूपुर क्षेत्र के स्कूली बच्चों का सवाल बेहद सीधा है—अगर स्कूल जाना है तो रास्ता कहां है?
रिपोर्टों के मुताबिक बच्चों ने तिरंगा यात्रा निकालकर प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाई। बच्चों का कहना था कि स्कूल तक जाने वाला रास्ता बारिश के दौरान कीचड़ और दलदल में बदल जाता है, जिससे उन्हें स्कूल पहुंचने में परेशानी होती है। कुछ रिपोर्टों में बच्चों के जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर कई घंटे तक इंतजार करने का भी उल्लेख है।
यानी स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले तिरंगा हाथ में लिए ये बच्चे किसी बड़े राजनीतिक पद की मांग नहीं कर रहे थे। उनका सवाल था—स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क कब मिलेगी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती। वह बच्चे की शिक्षा तक पहुंच का रास्ता होती है।
Gen Z के बाद Gen Alpha की आवाज
जुलाई में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में भी स्कूली छात्रों का प्रदर्शन सामने आया था। सर्वोदय इंटर कॉलेज, किशनपुर के छात्रों ने स्कूल में पंखे, बिजली, साफ पानी, शौचालय, फर्नीचर और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में छात्र इसमें शामिल हुए और प्रशासन ने उनकी कई मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि बच्चों के बीच अपने अधिकारों और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल पूछने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
Gen Z के आंदोलनों को मोबाइल स्क्रीन पर देखने वाली यह पीढ़ी शायद यह सीख रही है कि शिकायत करने और सवाल पूछने के बीच एक और रास्ता है—सामूहिक रूप से अपनी बात सामने रखना।
सवाल सिर्फ सड़क का नहीं है
वीडियो में उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के अलावा राजस्थान के ब्यावर-अजमेर, मध्य प्रदेश के सिरोंज और विदिशा तथा दूसरे इलाकों के बच्चों के वीडियो का भी जिक्र है।
इन उदाहरणों में मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन मूल सवाल एक जैसा है—क्या बच्चों को शिक्षा हासिल करने के लिए इतनी बुनियादी समस्याओं से लड़ना पड़ेगा?
कहीं स्कूल तक जाने वाली सड़क खराब है, कहीं बारिश में रास्ता कीचड़ में बदल जाता है, कहीं बच्चों को नदी या नाले को पार करके स्कूल जाना पड़ता है और कहीं परिवहन का किराया उनकी पहुंच से बाहर होने का सवाल उठता है।
इन घटनाओं को केवल “बच्चों का प्रदर्शन” कहकर खारिज करना आसान है। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर वे सड़क पर पहुंचे क्यों?
जब बच्चे खुद बन गए रिपोर्टर
इन विरोध प्रदर्शनों की एक और खासियत सोशल मीडिया है।
बच्चे खुद मोबाइल कैमरा लेकर सड़क के गड्ढे दिखा रहे हैं। कोई पानी की बोतल को माइक्रोफोन बनाकर वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है, तो कोई कैमरे के सामने खड़े होकर बता रहा है कि बारिश के बाद स्कूल तक पहुंचना कितना मुश्किल हो जाता है।
यह दृश्य पारंपरिक पत्रकारिता के लिए भी एक सवाल है।
जब कोई बच्चा खुद अपने गांव, सड़क और स्कूल की समस्या को कैमरे पर रिकॉर्ड करके दुनिया के सामने रखता है, तो वह सिर्फ शिकायत नहीं कर रहा होता—वह अपने अनुभव का दस्तावेज बना रहा होता है।
और कई बार वही वीडियो प्रशासन पर दबाव बनाने का माध्यम भी बन जाता है।
“बच्चों को बचाओ, हमारा किराया कम करो”
मध्य प्रदेश के सिरोंज की छात्राओं के संदर्भ में वीडियो में स्कूल आने-जाने के किराये का सवाल उठाया गया है। सोशल मीडिया पर उपलब्ध हालिया पोस्टों में सिरोंज की कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं द्वारा बस किराया कम करने की मांग को लेकर प्रदर्शन का भी उल्लेख मिलता है।
यह सवाल छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन गरीब परिवार के लिए रोज का परिवहन खर्च शिक्षा जारी रखने और स्कूल छोड़ने के बीच का अंतर बन सकता है।
इसलिए जब कोई बच्चा कहता है—“हमारा किराया कम करो”, तो उसके पीछे सिर्फ किराये का आंकड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुंच का सवाल भी छिपा होता है।
एक बच्ची का सवाल—खेल में गोल्ड, फिर भी मौका नहीं?
वीडियो में उत्तराखंड की एक छात्रा का भी जिक्र है, जो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने अपने खेल करियर से जुड़ी शिकायत रखती दिखाई देती है।
वीडियो के मुताबिक छात्रा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका नहीं मिल पाने और कथित रिश्वत मांगने का आरोप लगाया। यह एक ऐसा आरोप है जिसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और इसे अंतिम तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि छात्रा के आरोप/दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लेकिन इस घटना में भी एक बड़ा सवाल है—अगर कोई बच्चा खेल में उपलब्धि हासिल करता है, तो क्या उसके सामने आगे बढ़ने के रास्ते पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त नहीं होने चाहिए?
सरकारी स्कूल बनाम विकास के दावे
Gen Alpha के इन सवालों को सिर्फ विपक्ष बनाम सरकार की बहस में सीमित कर देना शायद इस पूरी कहानी को छोटा कर देगा।
क्योंकि बच्चे किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र लेकर सड़क पर नहीं हैं।
वे पूछ रहे हैं:
- स्कूल तक सड़क क्यों नहीं है?
- पीने का पानी क्यों नहीं है?
- पंखे और शौचालय जैसी सुविधाएं क्यों नहीं हैं?
- बारिश में रास्ता कीचड़ में क्यों बदल जाता है?
- स्कूल पहुंचने का किराया इतना महंगा क्यों है?
- और सबसे बड़ा सवाल—इन समस्याओं का समाधान मांगने के लिए बच्चों को प्रदर्शन क्यों करना पड़ रहा है?
“अगर बिस्किट पर सारी जानकारी लिखी होती है तो सड़क पर क्यों नहीं?”
वीडियो में दो बच्चों का एक बेहद दिलचस्प सवाल भी सामने आता है।
वे पूछते हैं कि जब पांच रुपये के बिस्किट के पैकेट पर उसके निर्माण से लेकर दूसरी जरूरी जानकारियां लिखी होती हैं, तो करोड़ों रुपये से बनने वाली सड़क के बारे में जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होती?
- सड़क किस योजना के तहत बनी?
- कितने रुपये खर्च हुए?
- किस एजेंसी ने बनाई?
- कितने समय में बननी थी?
- किस अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी थी?
- कब तक इसकी मरम्मत होनी है?
यह सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, पब्लिक अकाउंटेबिलिटी का है।
अगर सार्वजनिक पैसे से सार्वजनिक संपत्ति बनती है, तो जनता को उसके बारे में जानकारी मांगने का अधिकार क्यों न हो?
Gen Alpha को “रील” नहीं, जवाब चाहिए
सोशल मीडिया के दौर में हर घटना को रील, ट्रेंड और वायरल वीडियो में बदल देना आसान है।
लेकिन इन बच्चों के वीडियो को सिर्फ वायरल कंटेंट मानना गलती होगी।
क्योंकि कैमरे के सामने खड़ा बच्चा असल में अपने भविष्य की बात कर रहा है।
- वह कह रहा है कि उसे स्कूल जाना है।
- उसे सुरक्षित रास्ता चाहिए।
- उसे पानी चाहिए।
- उसे शौचालय चाहिए।
- उसे पंखा चाहिए।
- उसे खेल का मैदान चाहिए।
- उसे सस्ता और सुरक्षित परिवहन चाहिए।
- और अगर वह खेल में प्रतिभाशाली है, तो उसे आगे बढ़ने का निष्पक्ष अवसर चाहिए।
यही वह जगह है जहां Gen Alpha की आवाज को गंभीरता से सुनने की जरूरत है।
आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश से पहले सवाल
भारत 15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करेगा। ऐसे समय में तिरंगा लेकर जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचते बच्चों की तस्वीर एक प्रतीक बन जाती है। एक तरफ देश की उपलब्धियों, विकास, डिजिटल इंडिया, एक्सप्रेसवे और वैश्विक महत्व की बातें हैं। दूसरी तरफ वही देश है जहां कुछ बच्चे स्कूल पहुंचने के लिए कीचड़ से गुजरने, नाले पार करने या टूटी सड़कों से जूझने को मजबूर हैं।
इन दोनों तस्वीरों को एक साथ देखना जरूरी है। क्योंकि विकास की असली परीक्षा केवल बड़े शहरों की चमक में नहीं होती।वह उस बच्चे के रास्ते में भी होती है जो सुबह अपना बैग उठाकर स्कूल के लिए निकलता है।
Gen Z के बाद Gen Alpha—क्या बदल रहा है?
दिल्ली के Gen Z आंदोलन के बाद फतेहपुर और हमीरपुर जैसी घटनाओं ने एक नई बहस जरूर खड़ी की है।
- क्या अगली पीढ़ी अब केवल सोशल मीडिया पर दर्शक नहीं रहना चाहती?
- क्या वह अपने आसपास की समस्याओं को रिकॉर्ड करके, पोस्ट करके और सामूहिक रूप से प्रशासन से सवाल करके बदलाव की मांग करना सीख रही है?
अगर ऐसा है, तो इसे केवल “बच्चों का गुस्सा” कहकर नजरअंदाज करना दूरदर्शिता नहीं होगी।
क्योंकि ये बच्चे अभी स्कूल में हैं। आज वे सड़क मांग रहे हैं। कल वे उसी सड़क, स्कूल, अस्पताल और व्यवस्था के नागरिक और मतदाता होंगे।
और शायद उनका सबसे बड़ा सवाल यही है—
“जब हमारे नाम पर विकास की बातें होती हैं, तो हमारे स्कूल तक विकास क्यों नहीं पहुंचता?”
Gen Z हो या Gen Alpha—एक बात साफ है:
नई पीढ़ी सवाल पूछना सीख रही है। अब सवाल यह है कि व्यवस्था उन सवालों के जवाब देना कब सीखेगी?
