SIR पर चुनाव आयोग में दरार: दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों से उठे बड़े सवाल
भारत में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चल रहा विवाद अब चुनाव आयोग के भीतर तक पहुंच गया है। The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग के कुछ महत्वपूर्ण फैसले दोनों आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।
मामला केवल SIR में मतदाता नामों के हटने तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार विवाद नए मतदाताओं के पंजीकरण, Form 6 में बदलाव, मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, अपील दायर करने तथा चुनावी डेटाबेस और उसके IT सिस्टम के केंद्रीकरण तक फैला हुआ है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग अपने कामकाज की प्रक्रिया और कार्य-विभाजन को सर्वसम्मति से तय कर सकता है; वहीं आयोग का काम, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना है और मतभेद की स्थिति में बहुमत का निर्णय लागू होता है।
13 करोड़ नामों का मामला क्या है?
Indian Express की जांच के मुताबिक, बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट मतदाता रिकॉर्ड में 13 करोड़ से अधिक नामों पर कार्रवाई/हटाए जाने का असर पड़ा। यह आंकड़ा ड्राफ्ट रोल से संबंधित है; इसे यह कहने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए कि 13 करोड़ लोगों को स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया।
इसी प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामले पहुंचे। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में लाखों नामों और अपीलों को लेकर न्यायिक प्रक्रिया चल रही है। आयोग ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में अपीलें ट्रिब्यूनल के सामने लंबित हैं।
सबसे बड़ा सवाल: चुनाव आयोग के भीतर क्या हुआ?
रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने बार-बार इस बात पर आपत्ति जताई कि महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी उन्हें पहले से नहीं दी गई।
इन आपत्तियों का दायरा चार बड़े क्षेत्रों तक पहुंचता है:
- नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया
- मतदाता सूची से नाम हटाना और बहाल करना
- SIR से संबंधित अपीलें
- मतदाता सूची के IT सिस्टम और डेटाबेस पर नियंत्रण
Indian Express के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ग्यानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। रिपोर्ट में इसे चुनाव आयोग के भीतर असाधारण स्तर के मतभेद के रूप में पेश किया गया है।
Form 6 में बदलाव पर भी आपत्ति
नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में SIR से जुड़े सवाल जोड़े जाने को लेकर भी विवाद सामने आया।
Indian Express की अलग रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 के नए संस्करण में आवेदक से यह पूछा गया कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने इस बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए आपत्ति दर्ज की और कहा कि इसे हटाया जाना चाहिए।
यानी विवाद सिर्फ उन लोगों का नहीं है जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए। सवाल यह भी है कि नए मतदाता बनने की प्रक्रिया में ऐसे अतिरिक्त सत्यापन क्यों और किस अधिकार के तहत जोड़े गए।
वोटर डेटाबेस को केंद्रीकृत करने पर सवाल
इस पूरे विवाद का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम से जुड़ा है।
Indian Express की जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई कि मतदाता डेटाबेस और उससे जुड़े IT सिस्टम का नियंत्रण धीरे-धीरे दिल्ली स्थित केंद्रीय तंत्र की ओर जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस व्यवस्था के कारण स्थानीय स्तर पर काम करने वाले Electoral Registration Officers यानी EROs के फैसलों को सॉफ्टवेयर स्तर पर प्रभावित या रोका जा सकता है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में स्थानीय चुनाव अधिकारियों की भूमिका होती है। यदि अंतिम नियंत्रण किसी केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम के पास चला जाए तो जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े होते हैं।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
इस विवाद को समझने के लिए Indian Express ने गोवा का उदाहरण दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं ने आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए थे और स्थानीय Electoral Registration Officer ने उन्हें पात्र माना था। इसके बावजूद अंतिम मतदाता सूची में उनके नाम शामिल नहीं हो सके क्योंकि केंद्रीय सॉफ्टवेयर सिस्टम में स्थानीय अधिकारी के फैसले को दर्ज करने में समस्या आई।
यहीं से वह मूल सवाल पैदा होता है जिस पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई—क्या किसी स्थानीय वैधानिक अधिकारी का फैसला एक केंद्रीकृत IT सिस्टम के स्तर पर रोका जा सकता है?
ECINet भी विवाद के केंद्र में
चुनाव आयोग ने जनवरी 2026 में ECINet नाम का एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था, जिसके तहत आयोग के कई ऐप और पोर्टल एक डिजिटल ढांचे में लाए गए। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी डिजिटल ढांचे और उसके प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर संधू और जोशी ने सवाल उठाए।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को भी अलग-अलग पत्र लिखे। रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें चिंता थी कि प्रशासनिक और IT नियंत्रण में बदलाव से मतदाता डेटाबेस की निगरानी और जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
चार महीने तक पूर्ण आयोग की बैठक नहीं?
Indian Express की जांच में यह भी कहा गया है कि मई से अगस्त के बीच करीब चार महीने तक तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण बैठक नहीं हुई। इसके बाद 9 सितंबर को तीनों की पूर्ण बैठक हुई।
अगर यह तथ्य और उससे जुड़ा पूरा रिकॉर्ड आगे भी स्वतंत्र रूप से पुष्ट होता है, तो यह चुनाव आयोग के संस्थागत कामकाज को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा—खासकर तब, जब उसी अवधि में मतदाता सूची से जुड़े इतने बड़े फैसले लिए जा रहे थे।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया के लिए Indian Express ने 21 सितंबर को चुनाव आयोग को विस्तृत प्रश्न भेजे थे। रिपोर्ट के अनुसार, प्रकाशन के समय आयोग की ओर से इन सवालों का जवाब नहीं मिला था। दोनों चुनाव आयुक्तों से भी उनके उठाए गए सवालों और 9 सितंबर की बैठक को लेकर प्रतिक्रिया मांगी गई थी, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया कि जवाब नहीं मिला।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर ज्ञानेश कुमार को वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त और सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
आयोग ने पहले SIR को मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया है। अक्टूबर 2025 की एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में आयोग ने बिहार में SIR को पूरा करने और मतदाता सूची को “purifying” करने की बात कही थी।
राजनीतिक विवाद भी तेज
Indian Express की जांच सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। DMK नेता एम. के. स्टालिन ने रिपोर्ट के आधार पर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की, जबकि उद्धव ठाकरे ने उनके खिलाफ कार्रवाई, गिरफ्तारी और जांच की मांग की।
हालांकि, इन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को चुनाव आयोग के भीतर उठाई गई आपत्तियों से अलग देखना जरूरी है। किसी राजनीतिक दल या नेता का आरोप अपने आप में उस आरोप का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है।
असली सवाल क्या हैं?
इस पूरे घटनाक्रम से कम-से-कम पांच महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक सवाल सामने आते हैं:
पहला, क्या तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर महत्वपूर्ण निर्णय वास्तव में निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक लिए गए?
दूसरा, यदि दो चुनाव आयुक्त किसी निर्णय पर औपचारिक आपत्ति दर्ज करते हैं, तो उस आपत्ति पर संस्थागत रूप से क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है?
तीसरा, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस पर अंतिम नियंत्रण किस स्तर पर होना चाहिए?
चौथा, यदि स्थानीय Electoral Registration Officer किसी व्यक्ति को मतदाता के रूप में योग्य मानता है, तो क्या केंद्रीय सॉफ्टवेयर उस निर्णय को रोक सकता है?
पांचवां, नए मतदाता के Form 6 में SIR से संबंधित जानकारी जोड़ने का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या था?
इन सवालों के जवाब केवल राजनीतिक बहस से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड, संबंधित आदेशों, IT audit trail, Form 6 में किए गए बदलावों और अदालत में दाखिल दस्तावेजों से मिलेंगे।
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण चीज: मतदाता सूची
चुनाव की पूरी प्रक्रिया का आधार मतदाता सूची है। उम्मीदवार, राजनीतिक दल और मतदान की तारीख बाद की चीजें हैं; सबसे पहले यह तय होता है कि कौन मतदाता सूची में है।
इसलिए SIR विवाद को केवल एक प्रशासनिक कवायद मानकर खत्म नहीं किया जा सकता। अगर Indian Express की रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियां और दस्तावेज सही हैं, तो यह चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, डिजिटल नियंत्रण और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर गंभीर सार्वजनिक जांच की मांग करता है।
फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड में एक बात स्पष्ट है: चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो ने कई मौकों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं और इन आपत्तियों का केंद्र मतदाता सूची तथा उसके डिजिटल प्रबंधन से जुड़े बेहद बुनियादी सवाल हैं। इन सवालों का जवाब चुनाव आयोग और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं को सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर देना होगा। और यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम प्रश्न है—भारत में मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम नियंत्रण किसके पास है और उस निर्णय की जवाबदेही किसकी है?
