September 28, 2026 12:31 pm
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आज के Gen Z आंदोलन को कैसे राह दिखा रहे हैं भगत सिंह!

भगत सिंह ने 1928 के ‘विद्यार्थी और राजनीति’ लेख में युवाओं को राजनीति से दूर रखने की सलाह पर सवाल उठाया था। पढ़िए उनके विचार और आज की प्रासंगिकता।

पढ़ो जरूर, राजनीति को समझो और जरूरत पड़े तो मैदान में उतरो

“पढ़ने वाले नौजवानों, यानी विद्यार्थियों को राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।”

आज यह बात हमें कितनी परिचित लगती है। विद्यार्थियों से कहा जाता है कि उनका काम सिर्फ पढ़ना है, राजनीति से दूर रहना है, आंदोलनों से दूर रहना है और अपने भविष्य पर ध्यान देना है।

लेकिन करीब 100 साल पहले, 1928 में, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने इसी सवाल पर एक बेहद महत्वपूर्ण लेख लिखा था—‘विद्यार्थी और राजनीति’।

यह लेख जुलाई 1928 में किरती में प्रकाशित हुआ था। उस समय भी विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी जा रही थी। भगत सिंह ने इस सलाह पर सवाल उठाया था।

आज उनकी जयंती पर, 28 सितंबर को, उस लेख को पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि लगभग एक सदी बाद भी सवाल बहुत अलग नहीं हुआ है।

विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रखने की सलाह—तब भी, आज भी

भगत सिंह लिखते हैं कि उस समय विद्यार्थियों से कॉलेज में दाखिले से पहले यह शर्त तक रखी जाती थी कि वे राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे। पंजाब सरकार की ओर से स्कूलों और कॉलेजों को ऐसा परिपत्र भेजे जाने का भी वे उल्लेख करते हैं।

यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि विद्यार्थी राजनीति में जाएं या न जाएं। सवाल यह था कि क्या शिक्षा व्यवस्था को ऐसे नागरिक तैयार करने चाहिए जो अपने देश और समाज की परिस्थितियों से अनजान रहें?

भगत सिंह का सवाल यहीं से शुरू होता है।

वह मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है। उन्हें अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर देना चाहिए। लेकिन वह इसके साथ एक दूसरा सवाल जोड़ते हैं—

क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उन्हें सुधारने के उपायों पर सोचने की योग्यता पैदा करना भी शिक्षा का हिस्सा नहीं है?

अगर नहीं, तो भगत सिंह ऐसी शिक्षा को निकम्मी मानते हैं जो सिर्फ नौकरी या क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए।

यही बात उनके विचार को आज भी विचार करने लायक बनाती है।

पढ़ाई करो, लेकिन समाज से कटकर नहीं

भगत सिंह का तर्क यह नहीं था कि विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ दें और राजनीति करने लगें।

इसके उलट, वह साफ कहते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई है।

लेकिन उनके लिए पढ़ाई का मतलब सिर्फ परीक्षा पास करना नहीं था।

उनके लिए शिक्षा का अर्थ था—अपने देश को समझना, उसकी परिस्थितियों को जानना, समस्याओं पर विचार करना और यह समझ विकसित करना कि उन्हें बदला कैसे जा सकता है।

यही वह जगह है जहां भगत सिंह उस सलाह को खारिज करते हैं जिसमें कहा जाता है—

राजनीति को पढ़ो, राजनीति के बारे में सोचो, लेकिन राजनीति में व्यावहारिक रूप से हिस्सा मत लो।

उनके अनुसार यह बात सुनने में बहुत सुंदर लगती है, लेकिन असल में यह केवल ऊपरी बात है।

‘राजनीति मत करो’—लेकिन राजनीति है क्या?

भगत सिंह इसके बाद एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं—व्यावहारिक राजनीति आखिर है क्या?

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू या सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और उनके भाषण सुनना अगर राजनीति है, तो फिर किसी कमीशन या वायसराय का स्वागत करना क्या राजनीति नहीं है?

सरकार और देश के प्रबंधन से जुड़ा कोई भी सवाल अगर राजनीति के दायरे में आता है, तो फिर विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रखने का मतलब आखिर क्या है?

भगत सिंह इस दोहरे मापदंड पर सवाल उठाते हैं।

उनका सवाल सीधा है—क्या विद्यार्थियों को जन्म से ही सिर्फ सत्ता की खुशी और नाराजगी के हिसाब से व्यवहार करना सिखाया जाना चाहिए?

यह सवाल 1928 में पूछा गया था। लेकिन इसकी गूंज आज भी सुनी जा सकती है।

एक प्रोफेसर, एक किताब और ‘बोल्शेविक’ होने का आरोप

भगत सिंह अपने लेख में एक दिलचस्प प्रसंग भी बताते हैं।

एक विद्यार्थी प्रिंस क्रोपोटकिन की ‘Appeal to the Young’ पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर ने पूछा कि यह कौन-सी किताब है। विद्यार्थी ने बताया कि यह प्रिंस क्रोपोटकिन की पुस्तक है और वे प्रसिद्ध रूसी विद्वान थे।

जैसे ही प्रोफेसर ने सुना कि क्रोपोटकिन रूसी थे, विद्यार्थी पर शक होने लगा। आखिरकार उस पर यह आरोप तक लगा दिया गया कि वह बोल्शेविक है क्योंकि वह राजनीतिक किताबें पढ़ता है।

भगत सिंह इस प्रसंग के जरिए उस शिक्षा व्यवस्था की मानसिकता पर सवाल उठाते हैं जिसमें राजनीतिक विचार पढ़ना ही संदेह का कारण बन जाता है।

उनका सवाल था—ऐसी स्थिति में विद्यार्थी अपने शिक्षकों से क्या सीखेंगे? और ऐसी स्थिति में देश के नौजवान क्या सीख पाएंगे?

भगत सिंह के लिए ‘युवा’ सिर्फ उम्र नहीं था

भगत सिंह के लेख में युवाओं को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

वह मानते हैं कि देश को ऐसे लोगों की जरूरत है जो अपना तन-मन-धन देश के लिए समर्पित कर सकें। लेकिन क्या ऐसे लोग केवल उम्रदराज, परिवार और दुनियादारी में उलझे लोगों में मिलेंगे?

उनका जवाब है—नौजवानों में यह संभावना अधिक है, क्योंकि वे अभी उन सामाजिक और पारिवारिक जंजालों में पूरी तरह नहीं फंसे हैं जो निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।

लेकिन इसके लिए भी जरूरी है कि विद्यार्थी सिर्फ गणित, भूगोल और परीक्षा के सवाल रटकर न रह जाएं।

उन्हें अपने आसपास की दुनिया का व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल करना होगा।

दुनिया के इतिहास में बदलाव लाने वाले युवा

भगत सिंह इतिहास की ओर देखते हैं और कहते हैं कि दुनिया के इतिहास के पन्ने खोलकर देखिए। क्रांतियों और बड़े सामाजिक-राजनीतिक बदलावों में युवाओं की भूमिका बार-बार दिखाई देती है।

वह यह सवाल भी उठाते हैं कि अगर दूसरे देशों के विद्यार्थी अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों में भाग ले सकते हैं, तो भारत के विद्यार्थियों को ही इससे अलग क्यों रखा जाए?

उनके लिए विद्यार्थी और युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं थे।

वे वर्तमान के नागरिक भी थे।

और शायद यही उनके विचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

“वे पढ़ें। जरूर पढ़ें। साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें”

भगत सिंह का संदेश अंत में बहुत स्पष्ट हो जाता है।

वह पढ़ाई के खिलाफ नहीं हैं। वह विद्यार्थियों को पढ़ाई छोड़कर राजनीति में आने की सलाह नहीं दे रहे।

उनका आग्रह इससे अलग है—

वे पढ़ें। जरूर पढ़ें। साथ ही राजनीति का भी ज्ञान हासिल करें।

और जब परिस्थितियां मांग करें, तो मैदान में उतरने के लिए तैयार रहें।

यानी उनके लिए शिक्षा और राजनीति एक-दूसरे की दुश्मन नहीं थीं। बल्कि राजनीतिक और सामाजिक चेतना को भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए।

लगभग एक सदी बाद वही सवाल

आज भगत सिंह की जयंती पर उनके इस लेख को पढ़ते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यह नहीं है कि हम उनके हर राजनीतिक निष्कर्ष से सहमत हैं या नहीं।

महत्वपूर्ण यह है कि वह हमें सवाल पूछने की आदत देते हैं।

क्या शिक्षा सिर्फ व्यक्तिगत करियर बनाने का साधन है?

क्या विद्यार्थी को अपने आसपास के समाज और देश की परिस्थितियों से अनजान रहना चाहिए?

क्या राजनीति को समझना और राजनीति में सक्रिय भागीदारी दो बिल्कुल अलग चीजें हैं?

और क्या किसी समाज का भविष्य उन युवाओं के हाथ में सुरक्षित हो सकता है जिन्हें अपने समय के सवालों से दूर रखा जाए?

करीब 100 साल पहले भगत सिंह ने इन सवालों पर बहस की थी।

आज उनके जन्मदिन पर शायद उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उनके शब्दों को सिर्फ श्रद्धांजलि के तौर पर न पढ़ा जाए—बल्कि उनसे सवाल किए जाएं, सवालों पर बहस की जाए और सबसे बढ़कर, युवाओं की भूमिका पर नए सिरे से विचार किया जाए।

क्योंकि भगत सिंह का संदेश सिर्फ इतना नहीं था कि युवा राजनीति में आएं।

उनका संदेश इससे पहले का था—

पढ़ो। समझो। अपने समय को पहचानो। और अपने समाज से कटकर मत जियो।

मुकुल सरल

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