SIR से चुनाव आयोग के भीतर की कलह तक, CEC के इस्तीफे की मांग तेज हुई
चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से लेकर सड़कों पर उठ रहे ‘ग्यानेश कुमार इस्तीफा दो’ के नारों तक—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद अब सिर्फ विपक्ष बनाम चुनाव आयोग का मामला नहीं रह गया है। NDA के सहयोगी चिराग पासवान ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा है कि CEC को जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। नवीन पटनायक ने उनके इस्तीफे की मांग कर दी है। आखिर पूरा विवाद क्या है और SIR ने इसे इतना बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल क्यों बना दिया है?
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठ रही आवाज अब सिर्फ विपक्षी दलों के मंचों तक सीमित नहीं है।
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के दूसरे हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। ‘वोट चोरी नहीं चलेगी’ और ‘ग्यानेश कुमार इस्तीफा दो’ जैसे नारे सड़कों पर सुनाई दे रहे हैं।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे अहम मोड़ तब आया जब चुनाव आयोग के भीतर से ही दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की आपत्तियों का मामला सामने आया।
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम-से-कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों या आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, अपीलों तथा मतदाता डेटा तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
यही वह बिंदु है जिसने ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।
‘ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो’—क्यों तेज हुआ नारा?
विपक्ष लंबे समय से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठाता रहा है। लेकिन अब उसके आरोपों को एक नया राजनीतिक संदर्भ मिल गया है।
चुनाव आयोग के दो सदस्यों की अपनी लिखित आपत्तियां सामने आने के बाद विपक्ष का सवाल है कि अगर आयोग के भीतर ही महत्वपूर्ण फैसलों पर असहमति थी, तो इन फैसलों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?
इसी बीच NDA के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का बयान सामने आया।
पासवान ने कहा कि अगर चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा हो रहा है, तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है और खास तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
उनका जोर इस बात पर था कि स्पष्टीकरण सिर्फ विपक्ष के लिए नहीं, बल्कि जनता के लिए जरूरी है।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्यानेश कुमार पर कोई आरोप नहीं लगाता, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को लेकर पैदा हुए सार्वजनिक संदेह को गंभीर मानता है। यानी सवाल अब यह भी बन गया है कि क्या चुनाव आयोग जनता का भरोसा बनाए रखने में सफल हो रहा है?
नवीन पटनायक ने भी मांगा इस्तीफा
इस विवाद में एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तक्षेप BJD प्रमुख और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का आया। पटनायक ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और SIR की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की बात कही। इससे यह स्पष्ट है कि CEC को लेकर उठ रहे सवालों का राजनीतिक दायरा बढ़ रहा है।
आखिर SIR क्या है और विवाद क्यों है?
पूरे विवाद के केंद्र में है—Special Intensive Revision यानी SIR।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण करना है, ताकि मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य अयोग्य प्रविष्टियों को हटाया जा सके और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल रखा जा सके।
चुनाव आयोग इसी उद्देश्य को अपनी कार्रवाई का आधार बताता है।
लेकिन विपक्ष और नागरिक संगठनों का सवाल है कि इस प्रक्रिया में अगर बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं तो यह कैसे सुनिश्चित होगा कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं का नाम गलत तरीके से न कटे?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर हुए हैं।
इतने बड़े पैमाने पर नामों का ड्राफ्ट सूची से बाहर होना अपने आप में एक गंभीर प्रशासनिक और लोकतांत्रिक सवाल जरूर खड़ा करता है—क्या सभी प्रभावित लोगों को पर्याप्त सूचना, सुनवाई और अपील का अवसर मिल रहा है?
चुनाव आयोग के भीतर 14 आपत्तियों ने क्या सवाल खड़ा किया?
विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा चुनाव आयोग के भीतर की कथित असहमति है।
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम-से-कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की।
इनमें प्रमुख मुद्दे थे—
- नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया
- मतदाता सूची से नाम हटाना और बहाल करना
- मतदाता सूची से संबंधित अपील
- Form 6 में बदलाव
- मतदाता डेटा तक अधिकारियों की पहुंच
- चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण से जुड़े सवाल
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने ऐसे कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताते हुए आपत्ति जताई।
यहां एक और महत्वपूर्ण तथ्य है।
चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों के अस्तित्व या उनके दर्ज होने की तारीखों को खारिज नहीं किया है। लेकिन आयोग का कहना है कि इन आपत्तियों को पूरे निर्णय-प्रक्रिया से अलग करके देखना सही नहीं होगा।
Form 6 का विवाद क्या है?
नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 को लेकर भी सवाल उठा है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार Form 6 में SIR से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था, जिसमें नए आवेदक से उसके या उसके माता-पिता/दादा-दादी के पिछले SIR के मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद होने के बारे में जानकारी मांगी गई।
रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने पहले ही इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की थी और कहा था कि नियमों में बदलाव के बिना Form 6 में इस तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी बाद में इसे ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताते हुए हटाने की मांग की।
यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार वोट देने वाले युवा के लिए मतदाता सूची में शामिल होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे बुनियादी हिस्सा है।
असली लड़ाई सिर्फ वोटर लिस्ट की नहीं, डेटा की भी है
इस विवाद का एक ऐसा पहलू है जिस पर सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत कम हुई है—चुनावी डेटा का केंद्रीकरण।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर सवाल उठाए कि मतदाता सूची के डेटा और उसे संचालित करने वाले डिजिटल सिस्टम तक किस स्तर के अधिकारियों की पहुंच होनी चाहिए।
परंपरागत रूप से मतदाता सूची के काम में Electoral Registration Officers यानी EROs की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यदि स्थानीय स्तर पर अधिकारी किसी मतदाता के दस्तावेज देखकर फैसला लेते हैं, लेकिन केंद्रीय सॉफ्टवेयर उस फैसले को दर्ज या लागू करने की अनुमति नहीं देता, तो सवाल उठता है कि अंतिम नियंत्रण किसके पास है?
गोवा से जुड़ा एक मामला इसी वजह से चर्चा में आया, जहां सॉफ्टवेयर से संबंधित समस्याओं को लेकर पात्र मतदाताओं के मामलों पर सवाल उठे। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे चुनावी डेटा के बढ़ते केंद्रीकरण की व्यापक चिंता से जोड़ा है।
यानी बहस अब सिर्फ यह नहीं है कि किसका नाम मतदाता सूची में है और किसका नहीं।
बहस यह भी है कि वह फैसला लेने और उसे डिजिटल सिस्टम में दर्ज करने की वास्तविक शक्ति किसके पास है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन: पुलिस, बैरिकेड और नारे
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन ने विवाद को सड़क तक पहुंचा दिया। प्रदर्शन स्थल के आसपास भारी पुलिस और RAF की तैनाती थी। प्रदर्शनकारियों को निर्धारित क्षेत्र तक पहुंचने में रोक का सामना करना पड़ा और बाद में कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठाए।
नारे थे—
‘वोट चोरी नहीं चलेगी।’
‘ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो।’
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़ा मुद्दा केवल चुनाव का मुद्दा नहीं है। यह नागरिकता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर भरोसे का सवाल इस विवाद के केंद्र में आ गया है।
ज्ञानेश कुमार के दो कार्यक्रम क्यों टले?
विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार के उत्तर प्रदेश के मेरठ और वाराणसी में होने वाले कार्यक्रम भी स्थगित किए गए। ये कार्यक्रम युवा मतदाताओं और मतदाता जागरूकता से जुड़े थे। चुनाव आयोग ने दोनों कार्यक्रमों को स्थगित करने की पुष्टि की है।
राहुल गांधी का ‘अप्रूवर’ वाला बयान
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी ग्यानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है।
उन्होंने CEC से ‘अप्रूवर’ बनने और उन लोगों के बारे में जानकारी देने को कहा, जिनके दबाव में, उनके आरोप के अनुसार, चुनाव आयोग ने कथित तौर पर विवादित फैसले लिए। विपक्षी दलों के दूसरे नेताओं ने भी ग्यानेश कुमार को हटाने, जांच कराने और SIR की प्रक्रिया पर रोक लगाने जैसी मांगें की हैं।
सवाल अब सिर्फ ज्ञानेश कुमार का नहीं है
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठता आंदोलन अब एक व्यक्ति के खिलाफ अभियान से आगे जाता दिखाई दे रहा है।
सवाल हैं—
- क्या मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी है?
- क्या किसी पात्र मतदाता का नाम हटने से पहले उसे प्रभावी सुनवाई मिलती है?
- क्या स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के फैसले पर डिजिटल सिस्टम हावी हो रहा है?
- क्या चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों और उनके जवाबों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या भारत के मतदाताओं को चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है?
यही वह सवाल है जिस पर चिराग पासवान का बयान भी ध्यान खींचता है।
क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता सिर्फ कानून और संविधान से नहीं बनती। वह जनता के भरोसे से भी बनती है।
आज ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में इस्तीफे के नारे लग रहे हैं। विपक्ष उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहा है। नागरिक संगठन सवाल पूछ रहे हैं। और अब सत्तारूढ़ गठबंधन के एक महत्वपूर्ण सहयोगी भी कह रहे हैं कि जनता के संदेह दूर किए जाने चाहिए।
आखिरकार इस विवाद का फैसला नारों से नहीं, रिकॉर्ड, पारदर्शिता, जवाबदेही और जरूरत पड़ने पर न्यायिक जांच से होगा।
फिलहाल इतना साफ है कि SIR ने भारत की मतदाता सूची को लेकर एक ऐसी बहस खोल दी है, जिसका असर सिर्फ आगामी चुनाव पर नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं पर जनता के भरोसे पर भी पड़ सकता है।
