असम में अडानी पावर प्लांट की नींव रखी खुद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने
असम के धुबरी जिले में 3,200 मेगावाट के अडानी पावर प्लांट की नींव रख दी गई है। 20 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने छापर इलाके में प्रस्तावित अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट का शिलान्यास किया। करीब ₹48,000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट को राज्य में बड़े औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसरों के तौर पर पेश किया जा रहा है। कंपनी के मुताबिक निर्माण के दौरान करीब 20,000 रोजगार और प्लांट शुरू होने के बाद लगभग 5,000 रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
लेकिन इस परियोजना की कहानी सिर्फ निवेश, बिजली और रोजगार की कहानी नहीं है। जिस इलाके में यह पावर प्लांट प्रस्तावित है, वहां जुलाई 2025 में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चलाया गया था। इस कार्रवाई में बंगाली मूल के मुस्लिम परिवारों के घर तोड़े गए थे।
1,400 परिवारों के घर टूटे, करीब 10,000 लोग विस्थापित
जुलाई 2025 में धुबरी जिले के चारुआबखरा, चिराकुटा और संतोषपुर इलाके में प्रशासन ने बड़े पैमाने पर जमीन खाली कराई। Scroll की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 1,400 मुस्लिम परिवारों, यानी लगभग 10,000 लोगों, को इस कार्रवाई के कारण विस्थापित होना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार करीब 1,157 एकड़ सरकारी जमीन खाली कराई गई थी। जिला प्रशासन ने तब कहा था कि यह जमीन सरकारी थी और परियोजना के लिए असम पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (APDCL) को आवंटित की गई थी।
दूसरी रिपोर्टों में विस्थापित परिवारों की संख्या इससे अधिक, करीब 1,600 बताई गई है और खाली कराई गई जमीन को लगभग 3,500 बीघा बताया गया है। इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में परिवारों और जमीन के आंकड़ों में अंतर मिलता है।
प्रभावित लोगों का कहना था कि बड़ी संख्या में परिवार वहां तीन-चार दशक से रह रहे थे। इनमें ऐसे लोग भी थे जिन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव में अपनी पुरानी जमीन और घर गंवाने के बाद इस इलाके में शरण ली थी।
सरकार का कहना था—सरकारी जमीन पर था कब्जा
प्रशासन ने बेदखली की कार्रवाई को सरकारी जमीन खाली कराने की प्रक्रिया बताया था। अधिकारियों के मुताबिक प्रभावित भूमिहीन परिवारों को एकमुश्त ₹50,000 की सहायता देने और वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था करने की बात कही गई थी। कुछ रिपोर्टों में प्रशासन की ओर से बॉयजर अल्गा इलाके में जमीन देने की बात भी दर्ज है।
लेकिन प्रभावित परिवारों और अधिकार समूहों ने पुनर्वास को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना था कि प्रस्तावित पुनर्वास स्थल बाढ़ और कटाव के लिहाज से असुरक्षित है और वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है।
साथ ही, कुछ प्रभावित लोगों ने दावा किया कि उनके पास जमीन के दस्तावेज मौजूद थे। जमीन के मालिकाना हक और उसके सरकारी ‘खास’ जमीन के तौर पर वर्गीकरण को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आया।
पर्यावरण मंजूरी पर भी उठे सवाल
इस परियोजना से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण सवाल पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया को लेकर है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत Expert Appraisal Committee के दस्तावेज के मुताबिक यह 3,200 MW (4×800 MW) कोयला आधारित अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट है। परियोजना के लिए करीब 585 हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता बताई गई है, जिसमें 466.3 हेक्टेयर सरकारी और 118.7 हेक्टेयर निजी जमीन शामिल है। उसी दस्तावेज में परियोजना प्रस्ताव में कहा गया कि कोई पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) शामिल नहीं है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना को Terms of Reference (ToR) दिया गया था और सार्वजनिक परामर्श/जनसुनवाई की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी। इसे अंतिम पर्यावरणीय मंजूरी के बराबर नहीं माना जा सकता।
अप्रैल 2026 में परियोजना को लेकर चारुआबखरा में सार्वजनिक सुनवाई भी हुई थी, जिसमें आसपास के गांवों के लोगों ने हिस्सा लिया।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है: जिस परियोजना के पर्यावरणीय दस्तावेज में साइट पर पुनर्वास की आवश्यकता नहीं होने की बात दर्ज है, उसी परियोजना के लिए प्रस्तावित जमीन पर उससे कुछ महीने पहले हजारों लोगों के घर क्यों मौजूद थे और उन्हें क्यों हटाया गया?
यह सवाल परियोजना की जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया, विस्थापन और पर्यावरणीय मूल्यांकन के बीच तालमेल की स्वतंत्र जांच की मांग करता है।
जमीन पहले सरकार के पास, फिर अडानी परियोजना के लिए
परियोजना के आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेज में कहा गया है कि परियोजना की जमीन असम पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड ने विशेष रूप से इस परियोजना के लिए उपलब्ध कराई थी। दस्तावेज में कुल 585 हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता दर्ज है।
नवंबर 2025 में अडानी समूह ने घोषणा की थी कि उसकी कंपनी अडानी पावर असम में करीब ₹48,000 करोड़ का 3,200 MW का ग्रीनफील्ड अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट लगाएगी।
अब सितंबर 2026 में इसी परियोजना की नींव रखी जा चुकी है।
कंपनी और सरकार इसे निवेश, रोजगार और बिजली उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं। दूसरी ओर, विस्थापन की कहानी इस परियोजना के सामाजिक और मानवीय पक्ष को सामने रखती है।
विकास का सवाल सिर्फ बिजली उत्पादन का नहीं
किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के साथ रोजगार, निवेश और बिजली उत्पादन महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह सवाल भी है कि उस विकास की कीमत कौन चुकाता है।
धुबरी में जिन परिवारों के घर जुलाई 2025 में तोड़े गए, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो वर्षों से वहां रह रहे थे। प्रशासन के मुताबिक जमीन सरकारी थी; प्रभावित परिवारों में कुछ लोगों ने अपने भूमि अधिकार और दस्तावेज होने का दावा किया। पुनर्वास और मुआवजे को लेकर भी मतभेद रहे हैं।
इसलिए इस परियोजना की कहानी को केवल ‘₹48,000 करोड़ का निवेश’ या ‘20,000 नौकरियों’ के आंकड़े से समझना अधूरा होगा।
असल सवाल यह है कि क्या बड़े विकास परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में विस्थापित लोगों के अधिकार, पारदर्शिता, उचित मुआवजा और टिकाऊ पुनर्वास को पर्याप्त महत्व दिया गया?
असम में अडानी पावर प्लांट का निर्माण शुरू हो गया है। अब इस परियोजना के साथ यह सवाल भी दर्ज रहेगा कि जिस जमीन पर ‘विकास’ का यह नया अध्याय लिखा जा रहा है, वहां से उजाड़े गए परिवारों के लिए उस विकास में जगह कहां है?
