September 28, 2026 2:37 am
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क्या Gen Z का वोट छीनना चाहते हैं ज्ञानेश कुमार और मोदी!

Form 6 विवाद में नए मतदाताओं से माता-पिता या दादा-दादी की पुरानी SIR जानकारी मांगने पर सवाल उठे हैं। जानिए ECI और चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां।

Form 6 विवाद: नए मतदाताओं से SIR की जानकारी मांगने पर चुनाव आयोग में मतभेद

पहली बार वोटर बनने जा रहे युवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 को लेकर सितंबर 2026 में चुनाव आयोग के भीतर ही गंभीर मतभेद सामने आए हैं। विवाद उस अतिरिक्त घोषणा से जुड़ा है, जिसमें नए मतदाताओं से पूछा गया कि उनका नाम या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली Special Intensive Revision (SIR) की मतदाता सूची में था या नहीं।

यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Form 6 नया मतदाता बनने के लिए इस्तेमाल होने वाला वैधानिक फॉर्म है। चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल के मुताबिक, 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके भारतीय नागरिक Form 6 के जरिए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं।

Form 6 में आखिर क्या बदला?

2026 में ECINet के ऑनलाइन Form 6 के साथ SIR से जुड़ी एक अतिरिक्त घोषणा दिखाई देने लगी। इसमें आवेदक को यह बताना था कि उसका नाम, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR में तैयार मतदाता सूची में था या नहीं।

अगर परिवार का कोई नाम पिछली SIR सूची में था, तो उससे संबंधित विधानसभा क्षेत्र, पार्ट/बूथ और क्रम संख्या जैसी जानकारी मांगी जा सकती थी। अगर ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था, तो आवेदक को परिवार से संबंधित अतिरिक्त जानकारी देनी थी। इस व्यवस्था को लेकर जुलाई 2026 में सवाल उठने शुरू हुए।

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन प्रक्रिया में यह सेक्शन औपचारिक रूप से ‘mandatory’ नहीं दिखाया गया था, लेकिन आवेदक उसके जवाब के बिना Form 6 जमा नहीं कर पा रहे थे।

विवाद का कानूनी आधार क्या है?

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि Form 6 को Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित किया गया है। 2022 में केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय ने इन नियमों में संशोधन करते हुए Rule 13 को भी बदला था और Form 6 को नए मतदाता के नाम के समावेशन के लिए निर्धारित फॉर्म के रूप में रखा था।

Representation of the People Act, 1950 की धारा 28 के तहत नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है। कानून में यह भी कहा गया है कि ऐसे नियम चुनाव आयोग से परामर्श के बाद बनाए जा सकते हैं।

यही वह कानूनी आधार है जिस पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति दर्ज की। The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में दोनों ने कहा था कि वैधानिक Form 6 में बदलाव Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता और इस मामले में सरकार के पास नियम संशोधन के लिए प्रस्ताव भेजा जाना चाहिए।

दो चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्ति जताई?

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि Form 6 और Form 8 जैसे वैधानिक फॉर्म को केवल किसी SIR आदेश या दिशानिर्देश के जरिए नहीं बदला जा सकता।

इसके बाद चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इसी आपत्ति से सहमति जताई। अगस्त में उन्होंने इस बदलाव को हटाने की मांग से संबंधित पत्र लिखा। रिपोर्ट के अनुसार, उनकी चिंता यह थी कि इससे नए और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के लिए अनावश्यक कठिनाई पैदा हो सकती है।

यानी विवाद केवल यह नहीं है कि फॉर्म में नया सवाल क्यों जोड़ा गया। बड़ा सवाल यह है कि ऐसा बदलाव किस कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया और क्या वैधानिक Form 6 के साथ अलग घोषणा जोड़ना उसी फॉर्म में बदलाव माना जाएगा?

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

चुनाव आयोग ने इस पूरे विवाद की एक अलग व्याख्या दी है। आयोग के मुताबिक, Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। उसके अनुसार SIR से संबंधित जानकारी लेने के लिए Form 6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा—Annexure D—जोड़ी गई है।

ECI ने बताया कि SIR से संबंधित निर्देशों में नए मतदाता के Form 6/Form 8 के साथ अतिरिक्त declaration भरने का प्रावधान किया गया था। आयोग का कहना है कि इसलिए इसे Form 6 में संशोधन के रूप में देखना सही नहीं है।

ECI के दस्तावेजों में Annexure D में नागरिकता, जन्म स्थान और तारीख तथा कुछ परिस्थितियों में माता-पिता से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी का प्रावधान भी दिखाई देता है।

इसलिए मौजूदा विवाद को समझने के लिए दो अलग स्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी है:

पहली स्थिति: क्या वैधानिक Form 6 में संशोधन किया गया?

दूसरी स्थिति: क्या Form 6 के साथ ऐसी अतिरिक्त घोषणा को अनिवार्य किया जा सकता है, जिसके लिए अलग से नियम संशोधन की जरूरत है?

पहले सवाल पर ECI का जवाब है कि Form 6 बदला ही नहीं गया। वहीं दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति का आधार यह है कि यदि अतिरिक्त घोषणा व्यवहार में Form 6 के साथ अनिवार्य की जा रही है, तो उसकी वैधानिक स्थिति और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।

क्या इससे युवा मतदाताओं का वोटर बनना मुश्किल हो सकता है?

यह इस विवाद का सबसे अहम व्यावहारिक सवाल है।

ECI के अपने नियमों के अनुसार, भारतीय नागरिक जिसकी उम्र संबंधित qualifying date पर 18 वर्ष हो चुकी है और जो संबंधित क्षेत्र का ordinarily resident है, वह मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकता है। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण का निर्धारित माध्यम है।

लेकिन अगर कोई पहली बार वोटर बन रहा है और उसे अपने माता-पिता या दादा-दादी का पुराना SIR रिकॉर्ड ढूंढना पड़े, तो यह अतिरिक्त प्रशासनिक चुनौती बन सकती है—खासकर उन परिवारों के लिए जिनके पास दशकों पुराने चुनावी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।

इसी चिंता को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में नए और युवा मतदाताओं के लिए संभावित परेशानी का उल्लेख किया गया था।

हालांकि, उपलब्ध रिकॉर्ड से यह निष्कर्ष निकालना अलग बात होगी कि इस व्यवस्था का उद्देश्य युवाओं को वोट देने से रोकना था। ऐसा राजनीतिक आरोप लगाया गया है, लेकिन उसके उद्देश्य को साबित करने वाला स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध स्रोतों में स्थापित नहीं होता।

क्या Form 6 भरने के लिए पुरानी SIR सूची जरूरी है?

यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है।

ECI के मौजूदा मतदाता सेवा पोर्टल पर Form 6 अभी भी नए मतदाता के पंजीकरण के लिए उपलब्ध है। पोर्टल पर 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के नागरिकों के लिए Form 6 भरने की सुविधा दी गई है।

साथ ही, ECI ने पुराने SIR रिकॉर्ड को ऑनलाइन खोजने की सुविधा भी उपलब्ध कराई है। पोर्टल पर 2002/2003 की पिछली SIR मतदाता सूची में नाम खोजने के लिए राज्य, विधानसभा क्षेत्र, पार्ट नंबर और अन्य विवरणों के आधार पर खोज की जा सकती है।

इससे यह साफ है कि आयोग ने पुरानी SIR सूची को नए मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया से जोड़ने के लिए डिजिटल व्यवस्था बनाई है। विवाद इस व्यवस्था की कानूनी स्थिति और अनिवार्यता को लेकर है।

मामला अब क्यों ज्यादा गंभीर हो गया है?

सितंबर 2026 में सामने आए दस्तावेजों और रिपोर्टों के बाद यह मामला केवल Form 6 के तकनीकी बदलाव तक सीमित नहीं रहा। चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं।

The Indian Express ने रिपोर्ट किया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने पिछले 10 महीनों में आयोग से जुड़े कई फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं, जिनमें Form 6 का मुद्दा भी शामिल था।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों का जवाब देते हुए कहा कि आयोग के सभी अंतिम निर्णय तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए और अलग-अलग अधिकारियों की टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।

26 सितंबर 2026 को तीनों चुनाव आयुक्तों—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की बैठक भी हुई। बैठक के बाद आयोग ने SIR और अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़े कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण जारी किया।

असली सवाल क्या है?

Form 6 विवाद को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रूप में देखने के बजाय तीन सवालों से समझा जा सकता है:

  1. क्या वैधानिक Form 6 में वास्तविक संशोधन किया गया या केवल अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई?
  2. यदि अतिरिक्त घोषणा को अनिवार्य बनाया गया, तो उसके लिए किस वैधानिक प्रावधान का इस्तेमाल किया गया?
  3. क्या नई व्यवस्था से पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों पर ऐसा अतिरिक्त बोझ पड़ता है जो उनके पंजीकरण को व्यवहार में कठिन बना सकता है?

इन सवालों के जवाब इस विवाद की कानूनी और लोकतांत्रिक अहमियत तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

एक बात फिलहाल स्पष्ट है—भारत में नया मतदाता बनने की प्रक्रिया को लेकर Form 6 की भूमिका केंद्रीय है, और 2026 में इसके साथ जोड़ी गई SIR संबंधी घोषणा ने चुनाव आयोग के भीतर भी गंभीर कानूनी मतभेद पैदा किए हैं। वहीं आयोग स्वयं इस बात पर कायम है कि उसने Form 6 में संशोधन नहीं किया, बल्कि एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी है।

इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि “किसे फायदा या नुकसान होगा”, बल्कि यह है कि नए मतदाताओं से मांगी जा रही अतिरिक्त जानकारी की वैधानिक स्थिति क्या है और क्या उसकी प्रक्रिया कानून के अनुरूप है।

मुकुल सरल

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