September 25, 2026 7:50 pm
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CJP की सियासत और सियासत वालों की बतकही

जब सीजेपी पहल ले रही है तो ये राजनीतिक दल और उनके समर्थक उसकी यह कह कर आलोचना करते हैं कि यह तो उनका मुद्दा, उनकी ज़मीन खा रही है, उनकी जगह लेना चाहती है या उनके आंदोलन को कमज़ोर करना चाहती है।

सिर्फ बातों से काम नहीं चलने वाला, खूंटा गाड़कर बैठना होगा


हम सब जानते हैं कि अंधेरा है, आप भी कह रहे हैं अंधेरा है, लेकिन यह अंधेरा सिर्फ़ कहने-सुनने से दूर नहीं होगा, किसी को तो दिया जलाना होगा। 

वैसे मेरे मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) या अभिजीत दीपके को हर काम का जिम्मा नहीं लेना चाहिए। जैसे उन्होंने चुनाव आयोग के मामले में किया है, यह ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों को लेनी चाहिए और दीपके को ऐलान करना चाहिए था कि हम उनके साथ आंदोलन करेंगे।  लेकिन राजनीतिक दल भी क्या कर रहे हैं, यह देखना होगा। वे हर मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस या एक-दो दिन का धरना-प्रदर्शन करके रस्म निभा रहे हैं। और जब सीजेपी पहल ले रही है तो ये राजनीतिक दल और उनके समर्थक उसकी यह कह कर आलोचना करते हैं कि यह तो उनका मुद्दा, उनकी ज़मीन खा रही है, उनकी जगह लेना चाहती है या उनके आंदोलन को कमज़ोर करना चाहती है। 

ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि वोट चोरी के मामले में अभी तक क्या हुआ। राहुल गांधी तीन साल से यह बात कह रहे हैं, एक साल से लगातार प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रहे हैं। तमाम राजनीतिक दलों के साथ अन्य लोग भी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए। लेकिन अब तक क्या हुआ। एक के बाद एक राज्य हाथ से जा रहे हैं। और एसआईआर समेत अन्य साम-दाम-दंड-भेद का खेल जारी है। 

खुलेआम वोटचोरी

अब तो हमारी-आपकी आंखों से सामने दिन दहाड़े वोट ही नहीं पार्टियां ही चोरी हो रही हैं लेकिन हम कुछ नहीं कर पा रहे। 

मुद्दा ये है कि आप एक चीज़ पर लगातार बात कर रहे हैं लेकिन उसका परिणाम क्या निकला। हां, यह ज़रूर है कि लोगों में जागरुकता आई है, लेकिन होगा क्या। जब उनके वोट ही चोरी हो रहे हैं, वोटर लिस्ट में सलेक्टिव डिलीशन और एडीशन हो रहा है तो वो क्या करेंगे। 

हम सब जानते हैं कि अंधेरा है, आप भी कह रहे हैं अंधेरा है, लेकिन यह अंधेरा सिर्फ़ कहने-सुनने से दूर नहीं होगा, किसी को तो दिया जलाना होगा। 

और आप तय जानिए कि यही सब चलता रहा तो यूपी-उत्तराखंड के नतीजे भी पहले जैसे रहने वाले हैं। बीजेपी की वापसी लगभग तय है। फिर क्या करेंगे आप। अखिलेश यादव को योगी के बुलडोज़र के ख़िलाफ़ सड़क पर आना था, लेकिन वे भी उनकी नकल करते हुए रायबरेली से अपने चुनाव अभियान का आगाज़ करते हुए नितिन नबीन की तरह बुलडोज़र से माल्यार्पण करा रहे हैं। तो ऐसे तो कुछ नहीं बदलने वाला। 

सवाल निर्णायक लड़ाई का

ख़ैर, हम सीजेपी या दीपके की आलोचना कर सकते हैं, हर मुद्दे पर किसी से पूरी सहमति हो, ज़रूरी भी नहीं। और यही लोकतंत्र है। लेकिन असल सवाल तो हमें उन दलों से पूछना चाहिए जिन्हें हम सालों से वोट देते आ रहे हैं, गद्दी पर बैठाते रहे हैं कि एक नहीं कितने मुद्दे थे, कितने मुद्दे हैं जब वे जनता को गोलबंद करके कोई निर्णायक लड़ाई लड़ सकते थे। महंगाई का मुद्दा तो हर किसी को प्रभावित करता है। पेट्रोल-डीजल से लेकर गैस तक के दामों में बेतहाशा वृद्धि, और अब यूपीआई चार्ज। लेकिन इस मुद्दे पर भी कोई निर्णायक लड़ाई नहीं छेड़ी गई। इस मामले में यूपीए सरकार में बीजेपी की सक्रियता देख लीजिए और अब मोदी सरकार में कांग्रेस या किसी अन्य दल की सक्रियता। आपको पता चल जाएगा कि यह मुद्दा किसके लिए कितने मायने रखता है। फिर बेरोज़गारी का मुद्दा। ये इतना बड़ा मुद्दा है कि इस पर लाखों युवा सड़क पर उतरने-उमड़ने को तैयार हैं, आप बस ठोस शुरुआत कीजिए।

महंगाई और बेरोज़गारी ये दोनों ऐसे मुद्दे हैं जिनपर व्यापक गोलबंदी की जा सकती थी, लेकिन नहीं। सिर्फ़ कुछ बयानबाज़ी के अलावा कुछ नहीं किया गया। अभी बिहार से लेकर दिल्ली तक महिलाओं के ख़िलाफ़ लगातार अपराध हो रहे हैं। भयंकर अपराध। हमलों से लेकर गैंगरेप तक। उतरिए, अपने महिला संगठनों को लेकर पूरी मज़बूती से, जैसे निर्भया कांड में दिल्ली समेत देश सड़कों पर आ गया था और राष्ट्रपति भवन की दीवारें भी कांप उठी थीं।

पेपर लीक और शिक्षा में सुधार का ही मुद्दा किसी ने इतनी गंभीरता और सतत ढंग से नहीं उठाया जैसा सीजेपी ने उठाया और अंतत मोदी सरकार के एक कद्दावर मंत्री का इस्तीफ़ा हुआ। उस समय भी बीजेपी नहीं बल्कि विपक्ष ख़ासकर कांग्रेसियों द्वारा उसकी बिल्कुल ऐसी ही आलोचना की जा रही थी। यही सवाल थे जो आज उठाए जा रहे हैं कि वो दूसरों की ज़मीन खा रहा है। प्रायोजित आंदोलन है। अरे भाई किसी के पास ज़मीन बची कहां है जो खाई जाए, सारी ज़मींदारी तो बीजेपी को मिल गई है। आप लगातार हार रहे हैं और वो भी तब जब सीजेपी सीन में ही नहीं थी। लोकसभा-विधानसभा तो छोड़िए आप नंबर होते हुए…ध्यान रखिए नंबर होते हुए, राज्यसभा और विधानपरिषद से लेकर नगर निगम के मेयर तक के चुनाव हार रहे हैं। आपके ही लोग क्रॉस वोटिंग कर रहे हैं। 

जंतर-मंतर आंदोलन ने भय तोड़ा

जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान बहुत लोग कहते थे कि एक इस्तीफ़े से क्या होगा–अरे भई आपने देखा लिया ना, 12 साल से काई की तरह जमा हुआ डर एक झटके में टूट गया। यही क्या कम है। इसी तरह अब कह रहे हैं कि सिर्फ़ ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग से क्या होगा। वैसे तो मैं साफ़ कर दूं कि सीजेपी ने सिर्फ़ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा ही नहीं मांगा है, बल्कि तीन मांग रखी हैं– यह मांगें हैं–

1. Gyanesh Kumar’s resignation and initiation of criminal proceedings against him.

2. Freeze SIR & restore the January 2025 voter list.

3. Repeal the 2023 law & reform the Election Commission.

अब इसमें बड़ी और मुख्य मांग ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा है इसलिए वही हेडलाइन बन रहा है। अगर यही संभव हो जाए तो बड़ी बात होगी, यह ‘नाभि में तीर मारने’ जैसा होगा। मेरा मानना है कि ऐसे प्रेशर ग्रुप को एक या दो मांगों पर फोकस करना ही समझदारी है। बहुत बड़ी या ज़्यादा मांग करने पर वो कभी पूरी नहीं होती और आंदोलन एक समय के बाद बिखर जाता है। इसलिए एक-एक सीढ़ी चढ़ना ही बेहतर है।   लोग कह रहे हैं कि सीजेपी को मोदी का इस्तीफ़ा मांगना चाहिए, बिहार-बंगाल के चुनाव रद्द करने की मांग करनी चाहिए तो यह काम राजनीतिक दलों का है। और अभी भी वे इस मांग को लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ सकते हैं। अभी सारे रास्ते खुले हैं। उतरिए मैदान में। अब एक-दो दिन के धरना-प्रदर्शन से कुछ नहीं होगा, खूंटा गाड़ कर बैठना होगा।

मुकुल सरल

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