श्रमिकों के सवाल: 8 घंटे काम, रविवार की छुट्टी व समय पर वेतन
सूरत में टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी क्षेत्र के मजदूर लंबे काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश और समय पर वेतन समेत कई मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। सितंबर में मजदूरों ने जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर 8 घंटे की शिफ्ट और रविवार की छुट्टी की मांग दोहराई। उद्योग संगठनों का कहना है कि मौजूदा कारोबारी ढांचे में इन मांगों को लागू करना आसान नहीं है।
सूरत को गुजरात की औद्योगिक अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। कपड़ा, एम्ब्रॉयडरी, डाइंग-प्रिंटिंग और डायमंड उद्योगों के कारण यह शहर देश के बड़े औद्योगिक और रोजगार केंद्रों में शामिल है। लेकिन सितंबर 2026 में सूरत के इसी औद्योगिक क्षेत्र से मजदूरों के काम के घंटे, साप्ताहिक छुट्टी और वेतन को लेकर विरोध की आवाज तेज हुई है।
टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी क्षेत्र के मजदूरों का कहना है कि कई इकाइयों में उनसे 12 घंटे तक काम कराया जाता है और नियमित साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती। उनकी प्रमुख मांगें हैं—8 घंटे की कार्य-शिफ्ट, सप्ताह में एक दिन की छुट्टी, समय पर वेतन और श्रम कानूनों का पालन।
कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचा मजदूरों का आंदोलन
12 सितंबर 2026 को सूरत शहर और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में टेक्सटाइल मजदूर जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। मजदूरों ने 8 घंटे की शिफ्ट और रविवार की साप्ताहिक छुट्टी की मांग की।
मजदूर संगठनों ने आरोप लगाया कि लंबे समय से काम के घंटे और छुट्टी को लेकर उनकी शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई है। कुछ मजदूरों ने यह भी कहा कि 12 घंटे काम करने के बावजूद उन्हें नियमित आराम और परिवार के लिए समय नहीं मिल पाता।
मजदूर प्रतिनिधियों ने वेतन हर महीने की 7 तारीख तक दिए जाने और PF, ESI तथा ग्रेच्युटी जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभों को लागू करने की मांग भी उठाई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूर संगठनों ने सूरत के टेक्सटाइल क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के सामाजिक सुरक्षा कवरेज का मुद्दा भी उठाया।
अगस्त में भी हुआ था बड़ा प्रदर्शन
यह आंदोलन अचानक सितंबर में शुरू नहीं हुआ। अगस्त 2026 में सूरत के अमरोली इलाके में एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल इकाइयों के सैकड़ों मजदूर साप्ताहिक छुट्टी, त्योहारों की छुट्टी और बोनस जैसी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर चुके हैं।
17 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, मजदूरों ने आरोप लगाया था कि उनसे 12 घंटे की शिफ्ट में काम कराया जाता है और साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। प्रदर्शन के बाद शहर के दूसरे औद्योगिक इलाकों में भी तनाव बढ़ा।
अगस्त के एक अन्य विरोध के दौरान पुलिस ने लगभग 500 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। पुलिस का आरोप था कि प्रदर्शन के दौरान पथराव हुआ था; वहीं मजदूरों की मूल मांग साप्ताहिक छुट्टी को लेकर थी।
यानी सूरत में मजदूरों और उद्योग प्रबंधन के बीच विवाद सिर्फ काम के घंटे तक सीमित नहीं है। इसमें छुट्टी, वेतन, बोनस, सामाजिक सुरक्षा और काम की शर्तों से जुड़े कई सवाल शामिल हैं।
मजदूरों की मुख्य मांगें क्या हैं?
सूरत में हुए हालिया प्रदर्शनों से मजदूरों की मांगों को मोटे तौर पर इस तरह समझा जा सकता है:
- रोजाना 8 घंटे की कार्य-शिफ्ट
- सप्ताह में कम से कम एक दिन का अवकाश
- रविवार को साप्ताहिक छुट्टी की मांग
- समय पर वेतन का भुगतान
- PF और ESI जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभ
- ग्रेच्युटी और अन्य वैधानिक लाभ
- श्रम कानूनों का प्रभावी पालन
- अतिरिक्त काम के लिए नियमानुसार भुगतान
मजदूरों का कहना है कि लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्हें पर्याप्त आराम और परिवार के लिए समय नहीं मिल रहा।
क्या 8 घंटे काम और साप्ताहिक अवकाश कानून में है?
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। मजदूरों की 8 घंटे की मांग और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी को केवल राजनीतिक या ट्रेड यूनियन मांग मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार के चार श्रम संहिताएं 21 नवंबर 2025 से लागू की गई थीं। इनमें Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 भी शामिल है।
OSH Code में साप्ताहिक अवकाश का प्रावधान है। पारित कानून के अनुसार सामान्यतः किसी worker को एक सप्ताह में छह दिन से अधिक काम नहीं कराया जाना चाहिए, हालांकि कानून में कुछ अपवाद और संबंधित नियम भी हैं।
केंद्र सरकार के OSH Rules में 8 घंटे प्रतिदिन या 48 घंटे प्रति सप्ताह से अधिक काम के लिए ओवरटाइम भुगतान का प्रावधान भी दिया गया है।
इसलिए सूरत के विवाद में असली सवाल केवल यह नहीं है कि मजदूर 8 घंटे की मांग कर रहे हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि किस तरह की इकाई पर कौन-सा श्रम प्रावधान लागू होता है, सामान्य कार्य-घंटे क्या हैं, ओवरटाइम का भुगतान हो रहा है या नहीं और साप्ताहिक अवकाश किस दिन तय किया गया है।
रविवार की छुट्टी पर उद्योग और मजदूर आमने-सामने
मजदूर रविवार को साप्ताहिक छुट्टी की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ उद्योग प्रतिनिधियों का तर्क है कि टेक्सटाइल कारोबार की उत्पादन व्यवस्था में रविवार को छुट्टी देने से काम और कारोबार प्रभावित हो सकता है।
21 सितंबर को एम्ब्रॉयडरी इकाइयों के प्रतिनिधियों की बैठक में करीब 2,000 इकाइयों के प्रतिनिधि शामिल हुए। एसोसिएशन ने कहा कि काम के मौजूदा ढांचे में बदलाव इस तरह किया जाना चाहिए कि उद्योग का संचालन जारी रह सके।
23 सितंबर को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दक्षिण गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (SGCCI) के अध्यक्ष अशोक जीरावाला के हवाले से कहा गया कि एम्ब्रॉयडरी मजदूरों की रविवार की छुट्टी और आठ घंटे की शिफ्ट की मांग मौजूदा व्यवस्था में लागू नहीं की जा सकती। रिपोर्ट में उद्योग पक्ष की ओर से उत्पादन और लागत से जुड़े तर्क भी सामने आए हैं।
यहीं से विवाद का दूसरा पक्ष सामने आता है—मजदूरों के लिए आराम और श्रम अधिकार बनाम उद्योग के लिए उत्पादन, लागत और प्रतिस्पर्धा।
सूरत के ‘विकास मॉडल’ के बीच मजदूरों का सवाल
सूरत गुजरात की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। शहर की पहचान टेक्सटाइल और डायमंड उद्योगों से बनी है। लेकिन मजदूरों के हालिया आंदोलन ने औद्योगिक विकास के साथ काम करने की परिस्थितियों पर भी सवाल खड़े किए हैं।
मजदूर संगठनों का कहना है कि विकास का लाभ तभी व्यापक माना जा सकता है जब उत्पादन की प्रक्रिया में शामिल श्रमिकों को भी सुरक्षित और सम्मानजनक काम की परिस्थितियां मिलें।
दूसरी तरफ उद्योग प्रतिनिधियों का तर्क है कि टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी क्षेत्र की उत्पादन व्यवस्था, बिजली की लागत, बाजार की मांग और प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखे बिना काम के घंटे और छुट्टी में बदलाव करने से कारोबार प्रभावित हो सकता है।
इसलिए सूरत का विवाद केवल रविवार की छुट्टी का विवाद नहीं है। यह सवाल है कि औद्योगिक विकास और श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
30 सितंबर के बाद क्या होगा?
सितंबर के प्रदर्शन के दौरान मजदूर प्रतिनिधियों ने कहा है कि अगर उनकी मांगों पर 30 सितंबर तक समाधान नहीं निकला तो वे आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। रिपोर्टों के मुताबिक इसके बाद शांतिपूर्ण धरना और अन्य विरोध कार्यक्रमों की चेतावनी दी गई है।
इस बीच प्रशासन, मजदूर संगठनों और उद्योग प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की कोशिश जारी है।
सूरत में चल रहा यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के तेजी से बढ़ते औद्योगिक शहरों में काम की बदलती परिस्थितियों का सवाल सामने रखता है।
आखिर सवाल इतना भर है—क्या विकास की रफ्तार के साथ उस विकास को चलाने वाले मजदूरों के लिए भी तय काम के घंटे, साप्ताहिक आराम, समय पर वेतन और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है?
सूरत के मजदूर फिलहाल इसी सवाल का जवाब मांग रहे हैं।
