August 11, 2026 4:21 pm
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यमुना के नाम पर ग़रीबों पर क़हर, कॉरपोरेट को ज़मीन देने का खेल!

दिल्ली के O-Zone में रहने वाले लाखों लोगों में घर टूटने का डर है। जानिए O-Zone क्या है, 91 कॉलोनियों का विवाद क्या है और हाई कोर्ट व सरकार ने क्या कहा है।

दिल्ली के O-Zone में ‘घर नहीं टूटेंगे’ के सरकारी भरोसे के बीच क्यों बढ़ रही बेचैनी?

दिल्ली की यमुना के किनारे बसी दर्जनों कॉलोनियों में इन दिनों एक शब्द लोगों की चिंता का कारण बना हुआ है—O-Zone। खजूरी खास, करावल नगर, सोनिया विहार, जगतपुर, मजनू का टीला, मीठापुर और यमुना बाजार समेत कई इलाकों में लगे O-Zone के बोर्ड और अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई ने लोगों के बीच यह डर पैदा कर दिया है कि कहीं उनके घर और दुकानें बुलडोजर की जद में न आ जाएं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे वर्षों से इन बस्तियों में रह रहे हैं। कई परिवारों की कई पीढ़ियां यहीं गुजर चुकी हैं। ऐसे में अचानक O-Zone और अवैध निर्माण के नाम पर कार्रवाई की आशंका ने उनके सामने घर बचाने का सवाल खड़ा कर दिया है।

हालांकि, इस पूरे विवाद में एक अहम कानूनी अंतर है। दिल्ली हाई कोर्ट ने O-Zone में नए और अनधिकृत निर्माण तथा अतिक्रमण रोकने और हटाने पर जोर दिया है। वहीं, दिल्ली सरकार ने जून 2026 में स्पष्ट किया था कि मौजूदा मकानों को गिराने का आदेश नहीं दिया गया है। 91 अनधिकृत कॉलोनियों के निवासियों को मौजूदा विशेष कानूनी सुरक्षा 31 दिसंबर 2026 तक उपलब्ध है।

आखिर O-Zone क्या है?

दिल्ली के मास्टर प्लान में Zone-O मुख्य रूप से यमुना के बाढ़ क्षेत्र यानी Yamuna Floodplain से जुड़ा इलाका है। यह क्षेत्र पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील माना जाता है और यहां नए निर्माण तथा अतिक्रमण को लेकर लंबे समय से न्यायिक और प्रशासनिक कार्रवाई चलती रही है।

दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक Zone-O करीब 9,700 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। अदालत के सामने यह भी बताया गया है कि इस इलाके में लगभग 91 अनधिकृत कॉलोनियां, करीब एक लाख मकान और लगभग 5-6 लाख लोग रहते हैं।

यानी मामला केवल जमीन या निर्माण नियमों का नहीं है। इसके केंद्र में लाखों लोगों के आवास, पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण और दिल्ली की शहरी योजना का सवाल भी है।

खजूरी खास से सोनिया विहार तक क्यों फैला डर?

वीडियो कार्यक्रम के दौरान खजूरी खास और आसपास के इलाकों के निवासियों ने कहा कि उनके क्षेत्र में O-Zone के बोर्ड लगाए गए हैं। उनका सवाल है कि यदि सरकार मौजूदा घरों को नहीं तोड़ने की बात कह रही है तो इन बोर्डों और नोटिसों का उद्देश्य क्या है?

एक स्थानीय निवासी का कहना है कि खजूरी खास में कई परिवार करीब 35 वर्षों से रह रहे हैं। लोगों का तर्क है कि यदि ये इलाके पूरी तरह अवैध हैं तो यहां वर्षों से बिजली, सड़क, सीवर और दूसरी नागरिक सुविधाएं किस आधार पर उपलब्ध कराई गईं?

यही सवाल O-Zone विवाद की सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक पेचीदगियों में से एक है—जिन बस्तियों में दशकों से लोग रह रहे हैं, उन्हें अचानक किस कानूनी स्थिति में रखा जाए और उनके भविष्य का फैसला कैसे हो?

हाई कोर्ट ने क्या कहा है?

23 मई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने Zone-O में आवासीय कॉलोनियों को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि यमुना के बाढ़ क्षेत्र में ऐसी आवासीय कॉलोनियों का अस्तित्व पर्यावरण और नदी क्षेत्र के लिहाज से स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने साथ ही केंद्र और दिल्ली सरकार के अधिकारियों से इन कॉलोनियों के भविष्य और पुनर्वास को लेकर रणनीति तैयार करने को कहा। अदालत के समक्ष यह भी सामने आया कि इन 91 कॉलोनियों के निवासियों को विशेष कानून के तहत 31 दिसंबर 2026 तक दंडात्मक कार्रवाई से अस्थायी सुरक्षा प्राप्त है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट दिशा दी कि Zone-O में नया निर्माण नहीं होना चाहिए, यहां तक कि मरम्मत या नवीनीकरण की आड़ में भी नया निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।

फिर सरकार कह रही है ‘मकान नहीं टूटेंगे’?

यही वह बिंदु है जिसने जमीन पर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा किया है।

जून 2026 में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद कहा था कि हाई कोर्ट का आदेश मौजूदा संरचनाओं को गिराने के लिए नहीं है। दिल्ली सरकार के मुताबिक कार्रवाई नए या जारी निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ है, पुराने मौजूदा मकानों के खिलाफ नहीं। सरकार ने यह भी माना था कि O-Zone में लगाए गए बोर्डों की भाषा लोगों के बीच भ्रम पैदा कर रही है और इन्हें स्पष्ट किया जाना चाहिए।

लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन पर नोटिस, मार्किंग और कार्रवाई की खबरों ने उनका डर खत्म नहीं किया है।

यही वजह है कि O-Zone के आसपास रहने वाले लोगों का सवाल अब भी वही है—अगर पुराने मकान सुरक्षित हैं तो किस तरह की कार्रवाई होगी और किसे पुराने और किसे नए निर्माण की श्रेणी में रखा जाएगा?

‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ से ‘जहां झुग्गी, वहां श्मशान’ तक?

वीडियो कार्यक्रम में स्थानीय लोगों और वक्ताओं ने सरकार की आवास नीति पर तीखी राजनीतिक टिप्पणी भी की। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने नारे ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ का जिक्र करते हुए सवाल उठाया गया कि यदि गरीबों के घर उजड़ते हैं तो उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी कौन लेगा?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाई कोर्ट के सामने भी पुनर्वास का मुद्दा उठा है। 23 मई की सुनवाई में केंद्र की ओर से बताया गया था कि इन 91 कॉलोनियों में रहने वाले लगभग 5-6 लाख लोगों के लिए विस्तृत रणनीति तैयार करनी होगी।

अर्थात अदालत और सरकार के सामने चुनौती केवल अतिक्रमण हटाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि यदि किसी इलाके में पर्यावरणीय कारणों से रहना संभव नहीं माना जाता, तो वहां दशकों से रहने वाले परिवारों को सम्मानजनक और व्यवहारिक आवास कैसे उपलब्ध कराया जाएगा।

सवाल सिर्फ गरीब बस्तियों का क्यों?

कार्यक्रम में स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि यमुना का बाढ़ क्षेत्र पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील है तो वहां मौजूद हर तरह के निर्माण और परियोजनाओं को एक समान नजर से क्यों नहीं देखा जाता?

लोगों ने दिल्ली सचिवालय, अक्षरधाम, खेलगांव और दूसरी बड़ी संरचनाओं का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि O-Zone के नियमों का पालन सभी पर समान रूप से कैसे सुनिश्चित होगा।

हालांकि, इन सभी संरचनाओं को एक ही कानूनी श्रेणी में रखना सही नहीं होगा। किसी निर्माण की वैधता तय करने के लिए उसके भूमि स्वामित्व, निर्माण की तारीख, स्वीकृति, संबंधित मास्टर प्लान और अदालत/प्राधिकरण के आदेश अलग-अलग देखना जरूरी है।

इसलिए स्थानीय लोगों का यह सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन प्रत्येक परियोजना की कानूनी स्थिति अलग-अलग जांचे जाने की जरूरत है।

क्या पहले से बुलडोजर चल चुका है?

O-Zone और यमुना फ्लडप्लेन में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पहले भी हुई है। दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में Zone-O के अलग-अलग हिस्सों में अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण हटाने की कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। अप्रैल 2026 के एक आदेश में अदालत ने Zone-O में अतिक्रमण हटाने और नए निर्माण पर निगरानी जारी रखने की बात दर्ज की थी।

इसी वजह से सोनिया विहार, यमुना बाजार और दूसरे इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच यह आशंका बनी हुई है कि आगे की कार्रवाई किस पैमाने पर होगी।

हालांकि यह कहना कि Zone-O की सभी 91 कॉलोनियों के मौजूदा मकान तत्काल तोड़े जाने वाले हैं, उपलब्ध सरकारी और न्यायिक रिकॉर्ड से पुष्ट नहीं होता। मौजूदा स्थिति में अदालत का जोर नए निर्माण और अतिक्रमण रोकने पर है, जबकि सरकार ने मौजूदा घरों को नहीं गिराने की बात कही है।

O-Zone विवाद में सबसे बड़ा सवाल: पुनर्वास

यह विवाद आने वाले महीनों में और महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि 31 दिसंबर 2026 की तारीख बेहद अहम है।

91 कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के लिए मौजूदा अस्थायी सुरक्षा की अवधि खत्म होने से पहले केंद्र और दिल्ली सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि इन बस्तियों का भविष्य क्या होगा।

क्या इन इलाकों के लिए कोई अलग नीति बनेगी?

क्या लोगों को वैकल्पिक आवास दिया जाएगा?

क्या किसी हिस्से में पुनर्वास संभव होगा?

क्या पर्यावरणीय सुरक्षा और लोगों के आवास के अधिकार के बीच कोई संतुलित समाधान निकलेगा?

इन सवालों का जवाब केवल बुलडोजर या नोटिस से नहीं दिया जा सकता।

पर्यावरण बनाम आवास का अधिकार

यमुना के फ्लडप्लेन को अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण से बचाना पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन दूसरी ओर, वहां दशकों से रह रहे लाखों लोगों को केवल ‘अनधिकृत’ कहकर उनके आवास के सवाल को खत्म नहीं किया जा सकता।

दिल्ली का O-Zone विवाद इसी टकराव को सामने लाता है—नदी और पर्यावरण की सुरक्षा कैसे हो, और साथ ही उन परिवारों के अधिकारों की रक्षा कैसे हो जिन्होंने वर्षों से इन बस्तियों को अपना घर बनाया है?

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कार्रवाई पारदर्शी हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और किसी भी विस्थापन से पहले पर्याप्त पुनर्वास व्यवस्था मौजूद हो।

फिलहाल O-Zone में लगे बोर्ड और नोटिस लोगों के लिए सिर्फ प्रशासनिक संकेत नहीं हैं। वे उनके लिए अपने घर, संपत्ति और भविष्य को लेकर अनिश्चितता का प्रतीक बन चुके हैं।

अब नजर इस बात पर है कि सरकार आने वाले महीनों में कानूनी स्थिति, पर्यावरण संरक्षण और पुनर्वास को लेकर क्या स्पष्ट रोडमैप पेश करती है—और क्या लाखों लोगों का यह डर किसी ठोस समाधान में बदल पाता है।

मुकुल सरल

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