October 15, 2026 7:29 am
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मज़दूर साज़िश रच रहे थे तो योगीजी की पुलिस क्या मक्खी मार रही थी!

नोएडा में मजदूर आंदोलन के बाद पत्रकारों और एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या मजदूरों की आवाज़ को साजिश बताकर दबाया जा रहा है? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

नोएडा मजदूर आंदोलन: हक की आवाज़ को ‘साजिश’ बताने की राजनीति

“गिर-गिर के संभल जाते हैं मजदूर के बच्चे,
सड़कों पे ही पल जाते हैं मजदूर के बच्चे…
जब मांगते हैं अपनी वो मेहनत का ख़राज़ाम,
दुश्मन में बदल जाते हैं मजदूर के बच्चे…”

ये पंक्तियाँ आज के हालात का सटीक बयान हैं। नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूर आंदोलन के बाद जिस तरह से प्रशासन ने कार्रवाई की है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस देश में मजदूरों का हक मांगना अब अपराध हो गया है?

मजदूर आंदोलन या ‘साजिश’?

नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन को शुरुआत में पाकिस्तान से जोड़ने की कोशिश की गई। जब यह नैरेटिव टिक नहीं पाया, तो इसके तार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से जोड़कर एक नई राजनीतिक साजिश की कहानी गढ़ी जाने लगी।

इस पूरे मामले में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद को गिरफ्तार किया गया। इससे पहले जनवादी पत्रकार सत्यम वर्मा को भी हिरासत में लिया गया था। कई मजदूरों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और कुछ के बारे में तो अब तक कोई जानकारी नहीं है।

मीडिया का एक हिस्सा इसे “कबूलनामे” की कहानी बना रहा है, लेकिन असली सवाल यह है—आख़िर उनका अपराध क्या है?
क्या मजदूरों के हक में आवाज़ उठाना अपराध है?
क्या उनके साथ खड़ा होना साजिश है?

हर आंदोलन में ‘दुश्मन’ तलाशने की प्रवृत्ति

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकारों के दौर में एक पैटर्न साफ़ दिखता है—

  • किसान आंदोलन = खालिस्तानी
  • मजदूर आंदोलन = पाकिस्तानी या “अर्बन नक्सल”
  • भीमा कोरेगांव = साजिश
  • शाहीन बाग = राष्ट्र विरोध

हर विरोध, हर असहमति को किसी न किसी “बड़ी साजिश” से जोड़ देना अब एक स्थापित राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।

असल मुद्दे: मजदूरों की अनदेखी

सच्चाई यह है कि मजदूर महीनों नहीं, बल्कि सालों से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं—

  • समय पर वेतन नहीं मिलता
  • कोई नियमित इंक्रीमेंट नहीं
  • काम के घंटे तय नहीं
  • सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा का अभाव

ऊपर से चार नए लेबर कोड लागू कर दिए गए, जिनका मजदूर संगठनों ने लगातार विरोध किया है। देशभर में हड़तालें हुईं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

ऐसे में अगर मजदूरों का गुस्सा फूटता है, तो उसे “साजिश” कहना क्या उनकी वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश नहीं है?

मीडिया और सत्ता का नैरेटिव

मुख्यधारा मीडिया का एक हिस्सा इस पूरे मुद्दे को “कानून-व्यवस्था” और “षड्यंत्र” के चश्मे से देख रहा है। लेकिन ज़मीन पर हकीकत यह है कि मजदूर सिर्फ अपने श्रम का उचित मूल्य मांग रहे हैं।

“राज-दिन खट कर भी हम नाकाम हैं, नाशाद हैं,
जो हमारा सरप्लस खाते, वो कहलाते सफल…”

यह पंक्ति उस आर्थिक असमानता को उजागर करती है जिसमें मेहनत करने वाला हाशिये पर है और उसका श्रम हड़पने वाला “सफल” कहलाता है।

सवाल जो उठते हैं

  • क्या मजदूरों की आवाज़ को दबाने के लिए साजिश का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है?
  • क्या पत्रकारों और एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी असहमति को कुचलने की कोशिश है?
  • क्या लोकतंत्र में विरोध की जगह अब खत्म होती जा रही है?

निष्कर्ष

नोएडा का यह मामला सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें हर जनआंदोलन को “दुश्मन” करार दिया जाता है।
मजदूर जब तक चुप रहते हैं, वे “गरीब” हैं।
लेकिन जैसे ही वे अपने अधिकार मांगते हैं, वे “साजिशकर्ता” बना दिए जाते हैं।

मुकुल सरल

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