IIT बॉम्बे का AI टूल: एक खतरनाक प्रयोग की शुरुआत
एक खबर।
एक ऐसे भयानक मज़ाक के बारे में, जो अब सच बनने जा रहा है।
आपको याद होगा, कुछ समय पहले गाज़ियाबाद में एक पुलिस अधिकारी ने झुग्गी बस्ती में पूछताछ के दौरान एक व्यक्ति की पीठ पर एक फोननुमा डिवाइस रखकर कहा था — “ये बताएगा कि तुम बांग्लादेशी हो या नहीं।” उस समय यह घटना हास्यास्पद, अमानवीय और अवैज्ञानिक लगी थी। लेकिन अब जो खबर सामने आ रही है, वह बताती है कि वही “मज़ाक” अब सरकारी परियोजना में बदल रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार IIT बॉम्बे एक ऐसा AI टूल विकसित कर रहा है जो लोगों की भाषा, बोली, उच्चारण, शब्दों के प्रयोग और बोलने के पैटर्न का विश्लेषण करके यह संकेत देने की कोशिश करेगा कि व्यक्ति की भाषाई पृष्ठभूमि पश्चिम बंगाल की है या बांग्लादेश की।
सरकार के अनुसार अभी इस तकनीक की सटीकता लगभग 60% है, लेकिन दावा किया जा रहा है कि इसे जल्द ही 100% सटीक बना लिया जाएगा।
यह परियोजना महाराष्ट्र सरकार के IT विभाग के तहत लगभग 3 करोड़ रुपये के बजट से विकसित की जा रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे मुंबई और महाराष्ट्र में “अवैध घुसपैठ” के खिलाफ अभियान से जोड़ते हुए कहा है कि AI का उपयोग पहचान और कार्रवाई को तेज करने के लिए किया जाएगा।
पहली नज़र में यह किसी को तकनीकी क्रांति लग सकती है। लेकिन गहराई से देखने पर यह एक बेहद खतरनाक, अवैज्ञानिक और अमानवीय प्रयोग प्रतीत होता है।
भाषा से पहचान? उस देश में जहाँ “चार कोस पर बानी बदले”
भारत जैसे देश में, जहाँ कहावत है — “कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी” — वहाँ भाषा के आधार पर पहचान तय करने का विचार अपने आप में संदेहास्पद है।
पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच भाषाई समानता इतनी गहरी है कि भाषाविद भी केवल बोलचाल के आधार पर किसी की राष्ट्रीयता तय करने का दावा नहीं करते। बंगाली भाषा के भीतर ही असंख्य बोलियाँ, स्थानीय प्रभाव और मिश्रित रूप मौजूद हैं। कोलकाता की बंगाली, मुर्शिदाबाद की बंगाली, कूचबिहार की बंगाली, सिलहटी, चटगाँव की बंगाली — ये सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक ही भाषाई परिवार में आते हैं।
ऐसी स्थिति में AI किस आधार पर यह “निश्चित” करेगा कि कोई व्यक्ति भारतीय है या बांग्लादेशी?
60% सटीकता का मतलब: हर 10 में 4 लोग गलत पहचान
सरकार स्वयं मान रही है कि इस टूल की सटीकता अभी 60% है। इसका सीधा अर्थ है कि हर 10 में से 4 लोग गलत पहचाने जा सकते हैं।
यह कोई साधारण तकनीकी त्रुटि नहीं है। यहाँ “गलती” का मतलब हो सकता है:
- हिरासत
- डिटेंशन सेंटर
- नागरिकता पर संदेह
- पुलिस कार्रवाई
- सामाजिक अपमान
पहले ही केवल संदेह के आधार पर हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में न जाने कितने मुसलमानों को डिटेंशन सेंटर में डाला गया है। अब यदि यह मशीन “संदेह” को तकनीकी वैधता दे देगी, तो कितने लोग इसके दायरे में आएँगे — इसकी कल्पना ही भयावह है।
तकनीक का राजनीतिक उपयोग
मुख्यमंत्री द्वारा इस परियोजना को “अवैध घुसपैठ” के खिलाफ अभियान से जोड़ना यह संकेत देता है कि यह तकनीक प्रशासनिक सुविधा से अधिक राजनीतिक उपयोग के लिए तैयार की जा रही है।
जब देश में गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी जैसी समस्याएँ आँखों के सामने खड़ी हैं, तब सत्ताधारी सरकारों का ध्यान “बांग्लादेशी” और “रोहिंग्या” खोजने में लगा होना एक गंभीर राजनीतिक संकेत है। मानो सारी समस्याओं की जड़ यही लोग हों।
क्या कल हमें भी लाइनों में खड़ा किया जाएगा?
Special Intensive Revision (SIR) की तरह, क्या कल ऐसा हो सकता है कि लोगों को लाइनों में खड़ा कर इस मशीन के सामने बोलने को कहा जाए — ताकि यह तय हो सके कि वे भारतीय हैं या नहीं?
यह प्रश्न केवल काल्पनिक नहीं है। जिस दिशा में चीजें बढ़ रही हैं, वह इस आशंका को वास्तविक बनाती है।
भाषा, जो पहचान, संस्कृति और विविधता का प्रतीक है — वही अगर संदेह और दमन का औज़ार बन जाए, तो यह केवल तकनीकी प्रयोग नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला बन जाता है।
यह केवल तकनीक नहीं, नागरिक अधिकारों का सवाल है
यह मुद्दा तकनीकी नवाचार का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों का है।
किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता का निर्धारण उसकी बोली से करने की कोशिश विज्ञान कम और राजनीतिक पूर्वाग्रह अधिक लगती है।
सोचिए — यह मामला कितना गंभीर है।
