January 1, 2026 11:38 pm
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‘सबसे साफ शहर’ के दावे के बीच भागीरथपुरा में मौत का तांडव

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में गंदे पानी से 8 लोगों की मौत और 2000 से अधिक बीमार। चार महीने की शिकायतों के बावजूद सरकार की चुप्पी और जवाबदेही पर सवाल।

इंदौर में गंदे पानी से मौतों के बीच भी भाजपा बाज नहीं आ रही नफ़रत की राजनीति से

मध्यप्रदेश का इंदौर—जिसे बार-बार भारत का सबसे साफ शहर कहा जाता है—आज अपने ही दावे पर एक भयावह सवाल बनकर खड़ा है। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में सिर्फ गंदा पानी पीने की वजह से अब तक आठ लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दो हज़ार से अधिक लोग उल्टी-दस्त और गंभीर संक्रमण से जूझते हुए अस्पतालों में भर्ती हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों और बुज़ुर्गों की है।

यह कोई अचानक हुई प्राकृतिक आपदा नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पिछले चार महीनों से हर घर में गंदा और दूषित पानी सप्लाई हो रहा था। लोग लगातार शिकायत कर रहे थे, विरोध कर रहे थे, लेकिन सरकार और प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं। नतीजा आज हमारे सामने है—मौतें, भय और एक ऐसा प्रशासनिक सन्नाटा, जिसमें जवाबदेही का कोई नामोनिशान नहीं।

चार महीने से ज़हर पीती बस्ती, और सत्ता को कोई फर्क नहीं

भागीरथपुरा के लोगों का कहना है कि नलों से आने वाला पानी बदबूदार और गंदा था, लेकिन नगर निगम से लेकर राज्य सरकार तक किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हालात इतने भयावह हैं कि चार दिन के भीतर उतनी उल्टी-दस्त की दवाइयाँ बिक चुकी हैं, जितनी आमतौर पर पूरे साल में बिकती हैं

यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि जब लोग लगातार चेतावनी दे रहे थे, तब प्रशासन क्या कर रहा था? और जब मौतें होने लगीं, तब भी ना किसी अधिकारी पर कार्रवाई हुई, ना कोई गिरफ्तारी, ना कोई स्पष्ट जवाबदेही तय की गई

नफरत का एजेंडा बनाम जनता की ज़िंदगी

यह वही इंदौर है जहाँ हाल के महीनों में भाजपा विधायक, उनके पुत्र और पूरी राजनीतिक ब्रिगेड मुसलमानों को कॉलोनियों, दुकानों और बाज़ारों से बाहर करने के अभियानों में लगी हुई थी। सत्ता का पूरा फोकस हिंदू-मुसलमान, नफरत और ध्रुवीकरण पर था।

जब सरकार का एजेंडा नफरत हो, तब यह सवाल उठता है कि अगर हिंदू जनता भी गंदा पानी पी रही है और मर रही है, तो क्या फर्क पड़ता है?
यही इस राजनीतिक मॉडल की असलियत है—जहाँ इंसानी ज़िंदगी से ज़्यादा अहम चुनावी ज़हर होता है।

‘सबसे साफ शहर’ का खोखला तमगा

इंदौर को साल दर साल स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर-1 घोषित किया जाता रहा है। लेकिन भागीरथपुरा की गलियों में फैली यह त्रासदी बताती है कि स्वच्छता का यह तमगा केवल फोटो-ऑप और इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित है

अगर पानी पीने लायक नहीं है, अगर सीवेज और पेयजल लाइनें आपस में मिली हुई हैं, अगर महीनों तक शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं होती—तो यह साफ शहर नहीं, बल्कि प्रचार का चमकदार झूठ है।

जिम्मेदार कौन? और जवाबदेही कब?

आज तक:

  • किसी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई
  • किसी मंत्री ने जिम्मेदारी नहीं ली
  • किसी ठेकेदार या निगम अफसर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई

हर बार की तरह क्या अब भी वही होगा—
एक-दो फोन कॉल, कुछ दौरे, मुआवज़े की घोषणा और फिर सब कुछ मटियामेट?

यह सिर्फ आठ मौतों का मामला नहीं है। यह उस डेवलपमेंट मॉडल का आईना है, जिसमें जिंदगी से ज़्यादा ज़रूरी इमेज मैनेजमेंट और नफरत की राजनीति है।

नए साल के जश्न के बीच मौत का मंजर

जब पूरा देश नए साल का जश्न मना रहा था, ठीक उसी वक्त भागीरथपुरा में मौत तांडव कर रही थी। अस्पतालों के बाहर रोते परिजन, बेड पर तड़पते बच्चे, और नलों से बहता ज़हर—यह तस्वीरें उस शासन की हैं जो खुद को “डबल इंजन” कहता है।

सवाल साफ है:
इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
और क्या कभी इस सवाल का ईमानदार जवाब मिलेगा?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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