खुशी के बीच आशंकाएँ और असली सवाल बाकी
गाजा में युद्ध विराम के पहले चरण की घोषणा से वहाँ के निवासियों में अद्भुत राहत और जश्न का माहौल देखा गया — बच्चे सड़कों पर नाच रहे हैं, लोगों के चेहरे पर मुस्कान लौट रही है। फिर भी यह खुशी संपूर्ण नहीं है: यह केवल पहला चरण है, और पीछे छिपी शर्तें, रिहाइयाँ और सवाल अभी भी अनसुलझे हैं।
गाजा-पट्टी में पिछले दो वर्षों से चले आ रहे रक्तपात और भारी हताहतों के बाद पहले चरण का सीज़फायर घोषित होना एक राहत भरा पल है। सैकड़ों बच्चे, हजारों नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं — आँकड़ों में ही नहीं, जिन मुसीबतों की तस्वीरें दुनिया ने देखीं, वे दिल दहला देने वाली थीं। इसलिए जब सीज़फायर की खबर आई तो वहाँ के लोग सड़कों पर निकल आए — नाच-गाना, रोशनी, और थोड़ी सी उम्मीद।
सीज़फायर की घोषणा कैसे हुई?
लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि यह पूरा युद्ध विराम नहीं है — यह पहला चरण है। मिस्र, कतर और तुर्की के मध्यस्थता प्रयासों के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष ने इस समझौते की घोषणा की। इसके प्रभाव और मर्यादाएँ कई स्तरों पर देखी जा रही हैं। पहला और सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या यह घोषणा टिकाऊ होगी? पिछले दो सालों में कई बार सीज़फायर की घोषणाएँ हुईं, पर बमबारी जारी रही। इसलिए लोग सतर्क भी हैं।
यह पहला चरण क्या देता है? (रिहाई और राहत)
पहला चरण किस बारे में सहमत हुआ है — इसकी झलक स्पष्ट है: दोनों पक्षों ने कुछ कैदियों की रिहाई पर सहमति जताई है। इस्राइल ने दशकों में वक्त-वेक्त पर बड़ी संख्या में फिलिस्तीनीयों को हिरासत में रखा है — हालिया रिकॉर्ड के मुताबिक हजारों लोग जेल में हैं जिनमें सैकड़ों बच्चे और दर्जनों महिलाएँ शामिल हैं। समझौते के तहत अब शुरुआती सूची में शामिल कुछ दर्जन बंदियों को रिहा किया जाना तय हुआ है। यह छोटे मगर प्रतीकात्मक कदम है जो गाजा में उम्मीद जगाने का काम कर रहा है।
किसने मध्यस्थता की — और क्यों असर पड़ा?
दूसरी बड़ी मांग — राहत माल और बुनियादी सेवाओं की पहुँच — पर भी चर्चा हुई। अस्पतालों की तबाही, दवाइयों की कमी, एनस्थीसिया की अनुपलब्धता जैसी भयावह स्थितियाँ रिपोर्ट हुईं। इस स्तर पर छोटे-छोटे राहत कदमों का असर तुरंत दिखा: पानी, भोजन और दवाइयों की एक सीमित डिलीवरी से लोगों को तात्कालिक राहत मिली। क्योंकि कई जगहों पर लोग भूख और बिना सुविधाओं के जीवन-यापन का शिकार थे, इसीलिए यह पलों की राहत भी है।
वहीं यूरोप और दुनिया भर की नागरिक आवाज़ों का दबाव इस समझौते के पीछे अहम कारणों में से एक बना। डॉक वर्कर्स का बंदरगाहों पर विरोध, बड़े पैमाने की बलपूर्वक नारेबाज़ियाँ और जनहित समूहों की मुहिमों ने भी अंतरराष्ट्रीय रुख को प्रभावित किया। ऐसे दबावों ने राजनैतिक मोर्चों को असहज कर दिया, और यही वजह है कि कुछ शक्तियाँ खुलकर इस संकट पर दबाव बनाने लगीं।
कौन-सी चिंताएँ बनी हुई हैं?
फिर भी खतरे और शर्तें बनी हुई हैं। इस समझौते में सशर्तियाँ और सुरक्षा चिंताएँ मौजूद हैं — दायरे का सीमित होना, हतियारों को लेकर आशंकाएँ, और इस्राइली रुख में गिरावट न दिखना — ये सब संकेत देते हैं कि युद्धपूर्ण स्थितियाँ फिर भी कहीं न कहीं बरक़रार रह सकती हैं। राजनीतिक नेतृत्वों के बयान, कट्टरपंथी समूहों की आपत्तियाँ और क्षेत्रीय जटिलताएँ कहीं न कहीं इस कदम की सीमाओं को रेखांकित करती हैं।
क्या यह शांति की राह है?
अंततः: इस पहले चरण ने गाजा में कुछ राहत पहुँचाई है — बच्चों के चेहरे पर मुस्कान, थोड़ी सांस — पर दीर्घकालीन शांति के लिए अभी और ठोस कदम, विश्वास की बहाली और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता है। अगर वैश्विक समुदाय और मध्यस्थ देशों ने दबाव बनाए रखा और मानवीय सहायता सुनिश्चित की, तभी यह राहत स्थायी रूप ले सकती है। फिलहाल गाजा की जनता के लिए यह ज़रूरी है कि उन्हें खाने, पानी, चिकित्सा और सुरक्षा तक निरंतर पहुँच मिले — तब ही यह जश्न असली अर्थ रखेगा।
