सोशल मीडिया पर कार्रवाई और डरती हुई सत्ता का नैरेटिव
“यह कोई इमरजेंसी नहीं है…” — लेकिन क्या सच में ऐसा ही है?
देश में एक बार फिर सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वालों, व्यंग्य करने वालों और जनता की आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई ने कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा आलोचनात्मक अकाउंट्स को ब्लॉक करने की यह मुहिम अब सिर्फ डिजिटल स्पेस का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी और जवाबदेही के सवालों से सीधे जुड़ गई है।
सोशल मीडिया पर ‘सफाई अभियान’ या असहमति पर प्रहार?
हाल के दिनों में X (जिसे पहले ट्विटर कहा जाता था) पर बड़ी संख्या में ऐसे अकाउंट्स को ब्लॉक या प्रतिबंधित किया गया है, जो सरकार से सवाल पूछ रहे थे या व्यंग्य के जरिए आलोचना कर रहे थे।
यह कार्रवाई मुख्य रूप से Information Technology Act, 2000 की धारा 69A के तहत की गई बताई जा रही है — वही प्रावधान जिसके जरिए सरकार ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने का अधिकार रखती है।
लेकिन सवाल यह है कि:
- क्या यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए था या आलोचना दबाने के लिए?
- क्या व्यंग्य और सवाल पूछना अब “खतरा” बन गया है?
डर किससे है? सवालों से या हालात से?
विडंबना यह है कि जिस समय यह डिजिटल कार्रवाई हो रही है, उसी समय देश की अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है:
- रुपया लगातार गिरावट के दबाव में है
- महंगाई का असर आम जनता की जेब पर साफ दिख रहा है
- गैस, दवाइयों और जरूरी सामान की कीमतें बढ़ रही हैं
- बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा के सवाल बने हुए हैं
ऐसे समय में सरकार का ध्यान इन मुद्दों के समाधान से हटकर सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कार्रवाई की ओर जाना कई लोगों को चिंतित कर रहा है।
मंत्रालय की भूमिका और सत्ता का रवैया
इस पूरे अभियान में अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व वाले सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अहम भूमिका बताई जा रही है।
आलोचकों का आरोप है कि:
- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की आलोचना को व्यवस्थित रूप से हटाया जा रहा है
- “सफाई अभियान” के नाम पर असहमति को खत्म किया जा रहा है
- यह एक तरह का “डिजिटल कंट्रोल” स्थापित करने की कोशिश है
क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध है?
भारत का संविधान “We the People” से शुरू होता है — यानी सत्ता का स्रोत जनता है। ऐसे में:
- क्या जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से सवाल नहीं पूछ सकती?
- क्या सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा नहीं है?
यदि जवाब “हां” है, तो फिर यह कार्रवाई किस दिशा की ओर इशारा करती है?
आने वाले चुनाव और ‘डिजिटल नैरेटिव’
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले राज्यों के चुनावों को देखते हुए सरकार डिजिटल नैरेटिव को नियंत्रित करना चाहती है।
इस संदर्भ में:
- आलोचनात्मक आवाज़ों को कम करना
- सकारात्मक छवि बनाए रखना
- और असंतोष को सीमित करना
— यह सब एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
व्यंग्य की ताकत और उसका असर
विडंबना यह भी है कि जिन अकाउंट्स को ब्लॉक किया गया, उनके पोस्ट और ज्यादा वायरल हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर यह ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है कि:
“जिन्हें चुप कराना था, वही अब और ज्यादा सुने जा रहे हैं।”
निष्कर्ष: “डर” का डिजिटल चेहरा
सरकार के समर्थक इसे जरूरी कदम बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ मान रहे हैं।
लेकिन एक बात साफ है—
जब सत्ता सवालों से डरने लगे, तो वह जवाब देने के बजाय आवाज़ों को बंद करने की कोशिश करती है।
और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है।
