प्रशांत भूषण के बयान पर विवाद और लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का सवाल
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग क्या देश-विरोधी है? वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज’ संबंधी बयान पर उठे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है। आखिर नरेंद्र मोदी के पुराने भाषण में सत्ता परिवर्तन की बात और प्रशांत भूषण की मांग को अलग-अलग नजरिए से क्यों देखा जा रहा है? क्या हर सरकार की आलोचना को देश-विरोधी साजिश बताना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज’ बयान पर विवाद क्यों?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रही बहस अब ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन के सवाल तक पहुंच गई है। इसी मुद्दे पर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के बयान ने राजनीतिक विवाद को हवा दी है।
दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 15 अक्टूबर को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, जिसमें सीजेपी और अन्य संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे, प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन की मांग को लोकतांत्रिक अधिकार बताया।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर नागरिक मौजूदा सरकार की नीतियों से असहमत हैं और लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, तो इसमें गलत क्या है? उनके तर्क का मूल यह था कि किसी सरकार के प्रति असहमति जताना अपने आप में अपराध नहीं है। जब तक किसी को हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के लिए उकसाया नहीं जा रहा, तब तक सरकार की आलोचना को देश-विरोधी साजिश मान लेना उचित नहीं है।
इस बयान के बाद एक पुरानी बहस फिर सामने आ गई है: क्या किसी सरकार को बदलने की मांग करना और देश के खिलाफ काम करना एक ही बात है?
‘रेजीम चेंज’ का मतलब क्या है?
‘रेजीम चेंज’ अंग्रेजी का शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ किसी शासन व्यवस्था या सत्ता में बदलाव से है। भारतीय लोकतांत्रिक संदर्भ में इसका इस्तेमाल मौजूदा सरकार को हटाकर दूसरी सरकार लाने या राजनीतिक सत्ता में बदलाव की मांग के लिए भी किया जाता है।
संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, जनता के सामने अपने विचार और नीतियां रखते हैं और सरकार बनाने के लिए समर्थन मांगते हैं। विपक्ष का उद्देश्य भी मौजूदा सरकार की जगह सत्ता में आना होता है। चुनाव के जरिए सरकार बदलना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसलिए सत्ता परिवर्तन की मांग को केवल इस आधार पर अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता कि उससे मौजूदा सरकार को चुनौती मिलती है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बदलाव किस तरीके से मांगा जा रहा है।
अगर कोई राजनीतिक दल चुनाव लड़कर, जनसमर्थन जुटाकर, विरोध प्रदर्शन करके या सरकार की आलोचना करके सत्ता परिवर्तन चाहता है, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति के सामान्य दायरे में आता है। इसके विपरीत, हिंसा, धमकी या गैरकानूनी तरीकों से सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश एक अलग मामला है।
सरकार बदलने की मांग और देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के बीच अंतर करना लोकतांत्रिक बहस के लिए जरूरी है।
राजनाथ सिंह की आलोचना और मोदी के पुराने भाषण का सवाल
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उस राजनीतिक प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसमें कांग्रेस, राहुल गांधी और युवाओं के संदर्भ में ‘रेजीम चेंज’ की मांग को लेकर आलोचना की गई थी। इस तरह की मांग को अराजकता या देश-विरोध से जोड़ने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या उसकी पैरवी लोकतांत्रिक तरीकों से की जा रही है।
इसी संदर्भ में कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के समय का एक पुराना भाषण भी याद रखना चाहिए। उस भाषण में अन्याय के सामने न झुकने और बदलाव के लिए संघर्ष करने की भावना व्यक्त की गई थी। केंद्रीय सवाल यह है कि अगर सत्ता में बदलाव की बात राजनीतिक संघर्ष और जनसमर्थन के संदर्भ में की जाए, तो उसे एक नेता के लिए उचित और दूसरे के लिए आपत्तिजनक क्यों माना जाए?
क्या सरकार की आलोचना करना देश-विरोध है?
लोकतंत्र में सरकार और देश एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सरकार एक निर्वाचित राजनीतिक व्यवस्था है, जबकि देश और उसकी जनता उससे कहीं व्यापक हैं।
किसी सरकार की नीतियों की आलोचना करना, चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाना या प्रधानमंत्री से असहमति जताना अपने आप में देश के प्रति विरोध नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में असहमति की जगह होती है और जनता को सरकार से जवाब मांगने का अधिकार है।
व्यापक सिद्धांत यह है कि सरकार के प्रति असहमति और हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसावे के बीच कानूनी अंतर महत्वपूर्ण है। किसी भी राजनीतिक बयान का मूल्यांकन इसी अंतर को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
चुनाव का मकसद ही सत्ता बदलने का विकल्प देना है
भारत में चुनावी लोकतंत्र इस विचार पर आधारित है कि जनता सरकार चुन सकती है और अगले चुनाव में उसे बदल भी सकती है। कोई भी राजनीतिक दल हमेशा के लिए सत्ता का अधिकारी नहीं होता।
हर पांच साल में होने वाले लोकसभा चुनावों का महत्व इसी में है कि जनता अपने अनुभव, अपेक्षाओं और राजनीतिक पसंद के आधार पर फैसला कर सके। चुनाव के जरिए सत्ता में आने वाली पार्टी को यह स्वीकार करना होता है कि जनता भविष्य में उसे सत्ता से बाहर भी कर सकती है।
विपक्षी दलों का सरकार बदलने का प्रयास राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। अगर विपक्ष सरकार बदलना नहीं चाहेगा, तो फिर वह चुनाव क्यों लड़ेगा? और अगर मतदाता बदलाव चाहते हैं, तो उन्हें अपना फैसला व्यक्त करने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए?
इस लिहाज से ‘रेजीम चेंज’ शब्द सुनते ही उसे साजिश मान लेना लोकतांत्रिक राजनीति की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा। हालांकि, किसी विशेष अभियान के उद्देश्यों और तरीकों की जांच तथ्यों के आधार पर की जा सकती है।
युवाओं की असहमति सुनना भी सरकार की जिम्मेदारी
युवाओं और असहमत नागरिकों की मांगों को केवल राजनीतिक विरोध के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। यदि लोग चुनावी प्रक्रिया, संस्थाओं की निष्पक्षता या सरकार की नीतियों को लेकर सवाल पूछते हैं, तो उनका जवाब तर्क और तथ्यों से दिया जाना चाहिए। किसी आंदोलन की आलोचना करना राजनीतिक दलों का अधिकार है। उसी तरह किसी सरकार की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार भी है। लेकिन जब हर असहमति को देश-विरोधी साजिश बताने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो वास्तविक समस्याओं पर चर्चा पीछे छूट सकती है।
बांग्लादेश जैसे देशों के राजनीतिक घटनाक्रम का उदाहरण देकर घरेलू विरोध को खारिज करने के बजाय भारत की अपनी संवैधानिक व्यवस्था, चुनावी प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों के आधार पर बहस करना अधिक उपयोगी होगा।
निष्कर्ष: सत्ता स्थायी नहीं, लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है
‘रेजीम चेंज’ पर उठा विवाद केवल दो राजनीतिक बयानों की तुलना तक सीमित नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि भारतीय लोकतंत्र में असहमति, विरोध और सत्ता परिवर्तन की मांग को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
प्रशांत भूषण के बयान का मूल तर्क यह है कि लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन चाहना अपने आप में गलत नहीं है। इस बहस में सबसे जरूरी बात यह है कि शब्दों और बयानों का मूल्यांकन उनके संदर्भ में हो, कानूनी दावों को सटीक रूप से प्रस्तुत किया जाए और लोकतांत्रिक अधिकारों तथा गैरकानूनी गतिविधियों के बीच अंतर बनाए रखा जाए।
आखिरकार, लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं। जनता को सवाल पूछने, विरोध करने और चुनाव के जरिए सरकार बदलने का अधिकार है। किसी भी राजनीतिक दल की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की असली परीक्षा यही है कि वह सत्ता में रहते हुए असहमति को कितनी जगह देता है।
आपकी राय क्या है? क्या लोकतांत्रिक तरीके से ‘रेजीम चेंज’ की मांग को देश-विरोधी कहना उचित है? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।
