October 17, 2026 5:30 pm
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मदर ऑफ डेमोक्रेसी में सत्ता का दमनचक्र!

मोदी के ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ और ‘पावर टू एम्पावर’ के दावों के बीच दिल्ली में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन, पत्रकारों की हिरासत और लोकतांत्रिक अधिकारों पर उठते सवालों की पड़ताल।

मोदी के ‘पावर टू एम्पावर’ के दावे पर दिल्ली के विरोध-प्रदर्शनों ने उठाए सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ बता रहे हैं और ‘पावर टू एम्पावर’ का संदेश दे रहे हैं। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन, पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट की घटनाएं लोकतांत्रिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े करती हैं।

मोदी जी, बिल्कुल सही कहा आपने—भारत Mother of Democracy है। लेकिन सवाल यह है कि इस लोकतंत्र की मां की सेहत कैसी है? क्या लोकतंत्र केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोहराया जाने वाला एक आकर्षक जुमला है, या वह देश के नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन में भी दिखाई देता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 अक्टूबर 2026 को ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ बताते हुए कहा कि यहां अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर बहस होती है और विविध विचारों पर चर्चा की जाती है। उन्होंने ‘पावर टू एम्पावर’ यानी सत्ता के जरिए लोगों को सशक्त बनाने की अवधारणा भी रखी। <a href=”https://finance.yahoo.com/video/modi-says-india-mother-democracy-065310785.html“>उनके भाषण का वीडियो यहां देखा जा सकता है।</a>

दावा प्रभावशाली है। लेकिन किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा विदेशी निवेशकों, कारोबारी दिग्गजों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने दिए गए भाषणों से नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है, जब नागरिक सरकार से सवाल पूछते हैं, चुनावी प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हैं, सड़कों पर उतरते हैं और पत्रकार सत्ता या पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड करते हैं।

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और उन्हें कवर कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने इसी बुनियादी सवाल को फिर सामने ला दिया है: क्या असहमति के लिए लोकतंत्र में पर्याप्त जगह बची है?

लोकतंत्र का दावा और दिल्ली की तस्वीर

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का संबंध मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) को लेकर उठे विवाद से है। विपक्षी दलों और दूसरे आलोचकों ने इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने पर सवाल उठाए हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सितंबर 2026 तक 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम कम हुए थे। यह आंकड़ा अपने आप में गंभीर सार्वजनिक बहस की मांग करता है। हालांकि, इसे सीधे 13 करोड़ पात्र मतदाताओं के अंतिम रूप से मताधिकार से वंचित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग के अनुसार, संबंधित आंकड़ों में अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टियों वाले मतदाता भी शामिल हैं। <a href=”https://indianexpress.com/article/india/election-commission-sir-left-out-voters-special-drive-10903082/“>चुनाव आयोग की प्रक्रिया और छूटे हुए मतदाताओं के लिए विशेष अभियान पर रिपोर्ट पढ़ें।</a>

यहां असली सवाल केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने और गलती से बाहर हुए लोगों को समय पर न्यायसंगत अवसर मिलने का भी है।

जब चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हों, तब मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाबदेही की मांग करना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। ऐसी मांगों पर सरकार, चुनाव आयोग और पुलिस की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी स्वयं विरोध-प्रदर्शन की वजह।

पत्रकारों पर कार्रवाई: लोकतंत्र में सवाल पूछने की जगह कहां है?

लोकतंत्र में पत्रकार केवल घटनाओं के दर्शक नहीं होते। वे जनता तक सूचना पहुंचाने, सत्ता के दावों की जांच करने और सार्वजनिक संस्थाओं को जवाबदेह बनाने का काम करते हैं। इसलिए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों के साथ होने वाला व्यवहार प्रेस की स्वतंत्रता के व्यापक सवाल से जुड़ जाता है।

अक्टूबर 2026 में दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों को कवर कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। हिंदुस्तान टाइम्स ने 12 अक्टूबर को रिपोर्ट किया कि प्रदर्शन कवर कर रहे कम से कम 12 पत्रकारों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। कुछ पत्रकारों ने धक्का-मुक्की और चोट लगने के आरोप भी लगाए। <a href=”https://www.hindustantimes.com/cities/delhi-news/at-least-12-journalists-covering-anti-cec-protests-including-hindustan-reporter-detained-by-delhi-police-101791746725529.html“>रिपोर्ट पढ़ें।</a>

यदि पत्रकारों को केवल अपना काम करने के कारण रोका जाता है, उनके कैमरे छीने जाते हैं या उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है, तो यह सिर्फ पत्रकारों की सुरक्षा का मामला नहीं रह जाता। यह जनता के जानने के अधिकार से भी जुड़ जाता है।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास कानूनी अधिकार हैं। लेकिन इन अधिकारों का इस्तेमाल आवश्यक, आनुपातिक और जवाबदेह तरीके से होना चाहिए। किसी भी कथित दुर्व्यवहार की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितनी बड़ी संख्या में लोग सरकार की प्रशंसा करते हैं। यह भी देखना होगा कि सरकार और संस्थाएं आलोचना को कितना सहन करती हैं।

‘पावर टू एम्पावर’: आखिर किसे मिल रही है ताकत?

प्रधानमंत्री का ‘पावर टू एम्पावर’ का संदेश सुनने में आकर्षक है। सत्ता का उद्देश्य यदि नागरिकों को सशक्त बनाना है, तो इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण यही होना चाहिए कि आम नागरिक अपने अधिकारों का इस्तेमाल बिना भय के कर सकें।

लेकिन जब विरोध करने वालों को हिरासत में लिए जाने की खबरें आती हैं, जब प्रदर्शनकारी पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हैं और जब पत्रकारों के काम में बाधा पड़ने के आरोप सामने आते हैं, तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि सशक्तीकरण की इस अवधारणा में नागरिक की असहमति के लिए कितनी जगह है।

सत्ता का वास्तविक मूल्य केवल उसकी ताकत में नहीं, बल्कि उस ताकत के इस्तेमाल के उद्देश्य और तरीके में होता है। संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाएं सत्ता को मनमानी करने से रोकने के लिए ही हैं।

इसीलिए ‘पावर टू एम्पावर’ का मूल्यांकन भाषण के शब्दों से आगे जाकर करना होगा। क्या नागरिकों को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता मिल रही है? क्या विरोध-प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित करने का अधिकार सुरक्षित है? क्या पुलिस की कार्रवाई की जवाबदेही तय होती है? क्या स्वतंत्र पत्रकार बिना डर के घटनाओं की रिपोर्टिंग कर सकते हैं?

इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि सत्ता नागरिकों को सशक्त बना रही है या नागरिकों की आवाज पर अंकुश लग रहा है।

‘संस्कृति’ और ‘सभ्यता’ के दावे की असली परीक्षा

भारत की लोकतांत्रिक परंपरा पर गर्व करना स्वाभाविक है। भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर कानून के तहत कुछ उचित प्रतिबंध संभव हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नागरिक स्वतंत्रताओं को अनावश्यक रूप से सीमित करने के लिए नहीं होना चाहिए।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं है। इसका अर्थ है चुनावों की विश्वसनीयता, संस्थाओं की स्वतंत्रता, नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण और सत्ता से असहमत होने की गुंजाइश।

यदि कोई महिला प्रदर्शनकारी पुलिस या दूसरे लोगों की मौजूदगी में कथित हिंसा का सामना करती है, यदि किसी पत्रकार को अपना काम करने से रोका जाता है या यदि किसी नागरिक को अपने मताधिकार को लेकर जवाब मांगने पर परेशानी होती है, तो उन घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी संगठन या व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों को भी साक्ष्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

लोकतंत्र के नाम पर होने वाले समारोहों, भाषणों और प्रचार से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि संविधान के अधिकार जमीन पर कितने प्रभावी हैं।

लोकतंत्र की असली पहचान असहमति से होती है

मोदी जी, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ कहना एक बात है। देश के भीतर लोकतंत्र के सभी पक्षों को समान रूप से फलने-फूलने देना दूसरी बात है।

भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब सत्ता की आलोचना को देश-विरोध नहीं माना जाएगा, जब विरोध-प्रदर्शनों से निपटने में कानून का पालन होगा, जब पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने दिया जाएगा और जब चुनावी संस्थाओं पर उठने वाले सवालों के जवाब पारदर्शिता से दिए जाएंगे।

लोकतंत्र में सत्ता जनता से ताकत हासिल करती है। इसलिए उस ताकत का अंतिम उद्देश्य भी जनता के अधिकारों की रक्षा होना चाहिए।

आखिर सवाल वही है: भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ कहने वाले प्रधानमंत्री के लिए लोकतंत्र का अर्थ क्या केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिया जाने वाला संदेश है, या वह दिल्ली की सड़कों पर सवाल पूछ रहे नागरिकों और पत्रकारों के अधिकारों में भी दिखाई देगा?

इस सवाल का जवाब किसी नारे में नहीं, बल्कि सत्ता और संस्थाओं के वास्तविक आचरण में मिलेगा।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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