September 17, 2026 3:44 pm
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क्या किताब पढ़ना इतना ही ज़रूरी है, दोस्तो!

अहमदाबाद के एक पार्क में कुछ लोग इकट्ठा हुए और एक किताब, ‘आई एम मलाला’ पढ़ने लगे। ‘आई एम मलाला’ पढ़ने पर पिटाई तो होनी ही थी। एक तो उस किताब की लेखिका मलाला महिला, दूसरे मुस्लिम, और उस पर पाकिस्तानी। 

डॉ. द्रोण कुमार शर्मा

घटना हमारे देश की है। घटना यह है कि एक पार्क में कुछ लोग इकट्ठा हुए और एक किताब पढ़ने लगे और फिर कुछ और लोग इकट्ठा हुए और उन्हें पीटने लगे। ऐसी घटना हमारे देश में ही हो सकती है कि किताब पढ़ने पर पीटने लगें। और यह घटना हमारे देश के ही एक प्रदेश की राजधानी की है। जी हाँ, घटना सच्ची है, हुई है और गुजरात प्रदेश की राजधानी अहमदाबाद में।

उसी गुजरात की राजधानी में जिसके विकास का ढिंढोरा सबसे ज्यादा पीटा गया है। जहाँ बलात्कारियों को सचरित्रता के कारण जेल से समय से पहले छोड़ा जाता है। जहाँ उन बलात्कारियों का सार्वजनिक सम्मान होता है। जहाँ मृत गौवंश की खाल उतारने का काम करने वाले दलितों को पेड़ से बांध कर पीटा जाता है। जिस राज्य में इस इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, उसी राज्य गुजरात की घटना है यह।

यह घटना उस राज्य की राजधानी अहमदाबाद में हुई। उस शहर में जिसमें हम अगले कॉमनवेल्थ खेल करवाने जा रहे हैं। उस शहर में जिसमें वर्तमान सरकार जी के नाम से बना विश्व का बड़ा स्टेडियम है। उस स्टेडियम का नाम पहले सरदार वल्लभ भाई पटेल स्टेडियम था। अब सरकार जी सरदार पटेल जी का बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं तो सरदार पटेल के नाम पर बने स्टेडियम का नाम अपने नाम कर लिया। सम्मान करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है।

खैर बात तो हम कर रहे थे किताब पढ़ने पर पीटने की और बात स्टेडियम की करने लगे। हाँ तो कुछ लोग पार्क में इकट्ठा हो किताब पढ़ रहे थे और उनकी पिटाई हो गई। पीटने वाले लोग वही थे जो ऐसे कामों में हरदम आगे रहते हैं। आरएसएस के, बजरंग दल के, विश्व हिन्दू परिषद के। वही जो आज कल के काल में देशभक्त और राष्ट्रवादी माने जाते हैं। अरे वही जो आजकल हमारी सनातन संस्कृति के वाहक बन चुके हैं।

इन्हीं संस्कृति के वाहकों ने कुछ दिन पहले ही मुंबई में एक आठ साल की बच्ची के परिवार को इसलिए पीट डाला था कि वह आठ साल की बच्ची मिनी (छोटी) निकर पहन पार्क में अपने माता पिता के साथ आ गई थी। इन संस्कारी लोगों को उस छोटी बच्ची की उघड़ी जाँघ में भी सेक्स दिखने लगा और उन्होंने उसके माता पिता की और उनको बचाने आए अन्य लोगों की पिटाई कर दी।

बात हम अहमदाबाद की कर रहे थे, बीच में यह मुंबई कहाँ से आ गई। तो हम अपनी बात पर ही टिकते हैं। अहमदाबाद के एक पार्क में कुछ लोग इकट्ठा हुए और एक किताब, ‘आई एम मलाला’ पढ़ने लगे। ‘आई एम मलाला’ पढ़ने पर पिटाई तो होनी ही थी। एक तो उस किताब की लेखिका मलाला महिला, दूसरे मुस्लिम, और उस पर पाकिस्तानी। और फिर मलाला को पढ़ने की ऐसी जिद कि जान पर बन आई। ऐसी लेखिका की किताब पढ़ोगे तो पिटोगे ही। मुस्लिम महिला लेखिका की किताब ही पढ़नी है तो तस्लीमा नसरीन की ‘लज्जा’ पढ़ो। कोई नहीं रोकेगा, कोई नहीं टोकगा। 

ये मलाला थी कौन। एक लड़की थी। पाकिस्तानी मुसलमान लड़की। पढ़ने की जिद थी। तालिबानों ने गोली मार दी। गोली सिर में लगी। इलाज हुआ, बच गई। नोबेल पुरस्कार मिला। भारतीय कैलाश सत्यार्थी के साथ मिला। 

ये तालिबानी भी अजीब हैं। पढ़ने की जिद थी तो गोली मार दी। लड़की वर्ड फेमस हो गई। वह पुरस्कार मिल गया जिसके लिए ट्रंप और मोदी तरसते हैं। हमारी तरह करते- स्कूल बंद कर देते। हमने एक लाख स्कूल बंद कर दिये। लाखों बच्चे बच्चियां पढ़ने से वंचित रह गए। किसी को नोबेल तो छोड़ो, कोई छोटा मोटा पुरस्कार भी मिला क्या? इन मुस्लिम तालिबानों को हिन्दू तालिबानों से अक्ल लेनी चाहिए थी। स्कूल ही बंद करवा देने चाहिये थे।

किताब पढ़ने के नाम पर याद आया। एक किताब आ रही है, सोनिया गाँधी की। पहले पेंगुइन उसको छाप रहा था। देश में भी और विदेश में भी। पर सरकार जी ने कहा, देश में मत छापो। किताब के शीर्षक में ‘लव’ है। हमारी संस्कृति के खिलाफ है। और देश के लोगों को किताब पढ़नी होगी तो मनुस्मृति है, रामायण और महाभारत है। ज्यादा पढ़ना हो तो गीता है ही। पेंगुइन प्रकाशन तो बड़ा है पर जंन्तु छोटा है। उड़ नहीं पाता है। तो पेंगुइन सरकार के सामने बैठ गई। किताब भारत में छापने से मना कर दिया। अब खबर है हारबर कॉलिंस किताब छाप रहा है। छाप लो भई। सरकार तो छापने के बाद भी बैन कर सकती है। क्योंकि किताब पढ़ना इतना जरूरी नहीं है दोस्तों।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

Bebaak Bhasha

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