युवा ‘गुंडों’ की फौज, नफरत का इकोसिस्टम और BJP-RSS पर उठते सवाल
क्या देश की राजनीति में एक ऐसा नया दक्षिणपंथी इकोसिस्टम तैयार हो रहा है, जिसमें सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा चेहरे नफरत, हिंसा और ध्रुवीकरण की भाषा को आगे बढ़ा रहे हैं? क्या ऐसे लोगों को राजनीतिक संरक्षण हासिल है? और अगर है, तो सत्ता और इन चेहरों के बीच संबंध किस तरह का है?
हमारे वीडियो कार्यक्रम में इन्हीं सवालों को केंद्र में रखते हुए दक्षिणपंथी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले कुछ चर्चित सोशल मीडिया चेहरों और उनके कथित राजनीतिक संबंधों पर सवाल उठाए गए।
कार्यक्रम में सवाल किया गया कि क्या मोदी-शाह का राजनीतिक तंत्र ऐसे बेलगाम समूहों के सहारे भी मजबूत हो रहा है, जो समाज में नफरत और हिंसा को बढ़ावा देने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि कार्यक्रम में लगाए गए सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस लेख में नहीं की गई है।
स्वतंत्र भारतद्वाज के वीडियो को लेकर विवाद
कार्यक्रम में स्वतंत्र भारतद्वाज के एक वायरल वीडियो का उल्लेख किया गया। वीडियो में उनके द्वारा कथित तौर पर एक दलित युवक के साथ मारपीट किए जाने का दावा किए जाने की बात कही गई है। कार्यक्रम के मुताबिक, वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसको लेकर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
कार्यक्रम में यह भी सवाल उठाया गया कि ऐसे मामलों में राजनीतिक और मीडिया संस्थानों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है।
एंकर ने दावा किया कि वीडियो सामने आने के बाद स्वतंत्र भारतद्वाज के समर्थन में सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में सक्रियता दिखाई गई, लेकिन जब पुलिस कार्रवाई की बात आई तो कथित राजनीतिक समर्थक खुलकर सामने नहीं आए।
‘कपिल मिश्रा और मोदी मेरे बड़े भाई हैं’—दावों पर सवाल
कार्यक्रम में स्वतंत्र भारतद्वाज के पुराने वीडियो और पॉडकास्ट में किए गए कथित दावों का भी जिक्र किया गया। कार्यक्रम के अनुसार, उन्होंने कपिल मिश्रा को अपना ‘बड़ा भाई’, चिराग पासवान को भाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बड़े भैया’ के तौर पर संबोधित किया था।
इसी संदर्भ में कार्यक्रम में सवाल उठाया गया कि यदि ये राजनीतिक संबंध वास्तव में इतने करीबी हैं, तो पुलिस कार्रवाई के दौरान संबंधित नेता उनके समर्थन में सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं आए?
कार्यक्रम में चिराग पासवान से जुड़ी कथित तस्वीरों और उनके द्वारा पुलिस में शिकायत किए जाने का भी उल्लेख किया गया।
इस मामले में चिराग पासवान की ओर से कथित तौर पर यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति ने कई राजनेताओं के साथ-साथ उनके नाम का भी दुरुपयोग किया है और उन्होंने उसके खिलाफ आधिकारिक शिकायत की है।
‘नफरत का इकोसिस्टम’ किसे निशाना बनाता है?
कार्यक्रम का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ किसी एक व्यक्ति या वायरल वीडियो तक सीमित नहीं रहा। इसमें दावा किया गया कि देश में एक व्यापक ‘नफरत का इकोसिस्टम’ विकसित हुआ है, जिसका निशाना संविधान, लोकतंत्र, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले लोग बन रहे हैं।
कार्यक्रम में विशेष तौर पर दलितों, मुसलमानों और महिलाओं के खिलाफ कथित आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया।
एंकर ने आरोप लगाया कि दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इकोसिस्टम के कुछ चेहरे दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों के प्रति भी आक्रामक रवैया रखते हैं।
हालांकि, ऐसे आरोपों को किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ स्थापित तथ्य मानने से पहले संबंधित वीडियो, पोस्ट और मूल स्रोतों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
जब ‘गुंडा’ को ‘एक्टिविस्ट’ कहा जाता है
कार्यक्रम में मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की गई।
एंकर ने सवाल उठाया कि यदि किसी मुस्लिम व्यक्ति पर हिंसा या भड़काऊ बयान का आरोप लगता है तो मीडिया में उसे तुरंत ‘आतंकवादी’ या अन्य कठोर विशेषणों से संबोधित किया जा सकता है, लेकिन दक्षिणपंथी पृष्ठभूमि वाले विवादित चेहरों के लिए भाषा अलग क्यों हो जाती है?
कार्यक्रम में ऐसे ही संदर्भ में ‘गुंडा एक्टिविस्ट’ और ‘राइट विंग एक्टिविस्ट’ जैसे मीडिया इस्तेमाल किए गए शब्दों का जिक्र किया गया।
सवाल यह है कि मीडिया की शब्दावली क्या राजनीतिक पहचान के आधार पर बदल जाती है?
पत्रकारों और सरकार से सवाल पूछने वालों पर कार्रवाई का मुद्दा
कार्यक्रम में उन मामलों का भी उल्लेख किया गया जहां सरकार या स्थानीय प्रशासन से सवाल पूछने वाले पत्रकारों और सोशल एक्टिविस्टों पर कार्रवाई का आरोप लगाया गया।
पुणे के संतोष पंडित का उदाहरण देते हुए कार्यक्रम में कहा गया कि उन्होंने शहर के विकास, सड़कों और गड्ढों को लेकर रचनात्मक विरोध प्रदर्शन किए थे। कार्यक्रम के अनुसार, बाद में उन्हें पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
इसी तरह कार्यक्रम में महिला पत्रकारों शाहीन और नफीसा के साथ कथित पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया और सवाल उठाया गया कि क्या मुख्यधारा का मीडिया ऐसे मामलों को पर्याप्त प्रमुखता देता है।
इन घटनाओं से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल नहीं है।
गणेश उत्सव, डीजे और सार्वजनिक सवालों की आजादी
कार्यक्रम के अंतिम हिस्से में पुणे से जुड़े एक अन्य मामले का जिक्र किया गया, जहां सार्वजनिक उत्सवों और तेज आवाज वाले डीजे सिस्टम को लेकर सवाल उठाए जाने की बात कही गई।
कार्यक्रम में यह सवाल रखा गया कि लोकतंत्र में नागरिकों को धार्मिक आयोजनों, प्रशासनिक फैसलों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की कितनी स्वतंत्रता है।
यही सवाल पूरे कार्यक्रम की केंद्रीय चिंता बनकर सामने आता है—क्या भारत में राजनीतिक असहमति और सरकार से सवाल पूछने की जगह लगातार सिकुड़ रही है?
असली सवाल: राजनीतिक संरक्षण या सोशल मीडिया की स्वतंत्र ताकत?
पूरे मामले को सिर्फ कुछ विवादित सोशल मीडिया चेहरों तक सीमित करना आसान होगा। लेकिन कार्यक्रम इससे बड़ा सवाल उठाता है।
यदि ऐसे युवा चेहरे लगातार राजनीतिक विचारधारा के समर्थन में आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, हिंसा को सामान्य बनाने वाली सामग्री पोस्ट करते हैं और राजनीतिक नेताओं के साथ अपनी तस्वीरों या संबंधों का प्रदर्शन करते हैं, तो उनकी भूमिका और राजनीतिक नेटवर्क की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
दूसरी तरफ, यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी व्यक्ति के राजनीतिक संबंधों या सोशल मीडिया गतिविधियों के आधार पर उसके खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को बिना प्रमाण के तथ्य न माना जाए।
लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कौन किस विचारधारा का समर्थन करता है। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या राजनीतिक विचारधारा के नाम पर हिंसा, नफरत और कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है?
और इससे भी बड़ा सवाल—अगर ऐसा इकोसिस्टम वास्तव में मौजूद है, तो उसकी राजनीतिक, सामाजिक और डिजिटल संरचना क्या है?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब देश की राजनीति, मीडिया और समाज—तीनों को देना होगा।
