February 13, 2026 6:07 am
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देशव्यापी आम हड़ताल: मज़दूर–किसान एकजुट

केंद्र सरकार की नीतियों, नए लेबर कोड और भारत-अमेरिका डील के विरोध में देशभर में मज़दूरों और किसानों की आम हड़ताल, जंतर-मंतर से ग्राउंड रिपोर्ट।

‘भारत-अमेरिका डील’ और लेबर कोड के खिलाफ देशभर में हुंकार

“मर्ज़ मुक्ति का करना होगा, जीना है तो लड़ना होगा”—इसी नारे के साथ गुरुवार को देशभर में मज़दूरों और किसानों ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आम हड़ताल की। 12 फरवरी की यह हड़ताल पहले से मज़दूर संगठनों द्वारा घोषित थी, लेकिन इसमें किसानों का मुद्दा भी प्रमुखता से जुड़ गया—खासकर कथित भारत-अमेरिका डील और नए लेबर कोड के विरोध को लेकर।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर सुबह से ही विभिन्न यूनियनों, किसान संगठनों, छात्र समूहों, कर्मचारियों और पत्रकारों का जमावड़ा देखने को मिला। लाल झंडों और नारों के बीच प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया और कहा कि संसद में बिना पर्याप्त चर्चा के श्रम कानूनों में बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान है।

‘भारत-अमेरिका डील’ या ‘नरेंद्र का सरेंडर’?

किसान संगठनों ने जिस समझौते को सरकार ‘भारत-अमेरिका डील’ बता रही है, उसे प्रदर्शनकारियों ने “नरेंद्र का सरेंडर” कहा। उनका आरोप है कि इस समझौते की शर्तें सार्वजनिक नहीं की जा रहीं और इससे कृषि क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। किसानों की मांग है कि डील की सभी शर्तें सार्वजनिक की जाएं और संसद में विस्तृत चर्चा के बाद ही कोई निर्णय लिया जाए।

12 घंटे काम का प्रावधान: 8-8-8 की ऐतिहासिक लड़ाई पर खतरा?

नए लेबर कोड के तहत 12 घंटे कार्य-दिवस की संभावना को लेकर मज़दूर संगठनों में गहरा असंतोष है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन” की ऐतिहासिक लड़ाई से हासिल अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।

मज़दूर नेताओं के मुताबिक, लंबे कार्य-दिवस से नौकरी की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उनका आरोप है कि सरकार मालिकों को अधिक छूट दे रही है, जिससे श्रमिकों पर दबाव बढ़ेगा और श्रम अधिकार कमजोर होंगे।

महिलाओं की रात की शिफ्ट: अधिकार या शोषण का जोखिम?

सरकार का तर्क है कि नए प्रावधानों से महिलाएं रात में भी काम कर सकेंगी, जो लैंगिक समानता की दिशा में कदम है। लेकिन प्रदर्शन में शामिल महिला मज़दूरों और छात्राओं ने सवाल उठाया कि कानून में समान वेतन, कार्यस्थल की सुरक्षा और उत्पीड़न से संरक्षण जैसे मुद्दों का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं है?

उनका कहना है कि जब तक सुरक्षा और समान वेतन की गारंटी नहीं होगी, तब तक रात की शिफ्ट का प्रावधान महिलाओं के लिए अवसर से अधिक जोखिम बन सकता है।

छात्र भी मैदान में: “स्टूडेंट्स और वर्कर्स का भविष्य अलग नहीं”

जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में छात्र संगठनों की मौजूदगी ने इस आंदोलन को व्यापक सामाजिक आयाम दिया। छात्रों का कहना था कि आज वे पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद वे भी श्रम बाजार का हिस्सा होंगे—इसलिए जो कानून आज पास हो रहे हैं, उनका प्रभाव उनके भविष्य पर पड़ेगा।

छात्रों ने बिजली बिल, श्रम सुधार और निजीकरण की नीतियों को आम वर्किंग क्लास के खिलाफ बताया और कहा कि “स्टूडेंट्स और वर्कर्स का भविष्य अलग नहीं है।”

पत्रकारों और कर्मचारियों की भागीदारी

इस हड़ताल में विभिन्न विभागों के कर्मचारी और पत्रकार भी शामिल हुए। मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हुए पत्रकारों ने कहा कि जिस तरह से मीडिया पर नियंत्रण की कोशिशें बढ़ी हैं, वह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने मज़दूरों और किसानों के साथ एकजुटता जताई।

संसद के भीतर और बाहर—लेकिन क्या सरकार सुनेगी?

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संसद के भीतर विपक्ष की आवाज़ें उठ रही हैं और सड़कों पर भी जनाक्रोश दिख रहा है, लेकिन सरकार इन आवाज़ों पर संज्ञान नहीं ले रही। जंतर-मंतर से उठी आवाज़ साफ़ थी—यह लड़ाई लंबी है और यहीं समाप्त नहीं होगी।

देशव्यापी हड़ताल ने यह संकेत दिया है कि श्रम अधिकार, कृषि नीति और कॉरपोरेट प्रभाव जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। सवाल यह है कि क्या सरकार इन चिंताओं पर संवाद का रास्ता चुनेगी या टकराव की स्थिति और गहरी होगी?

मुकुल सरल

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