September 16, 2026 10:51 am
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सवाल पूछा तो पत्रकार पर सवाल!

योगी आदित्यनाथ की प्रेस वार्ता में पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव के सवाल और उसके बाद सामने आए पूछताछ व नौकरी जाने के दावों ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए हैं।

योगी की प्रेस वार्ता में दिव्या श्रीवास्तव के साथ क्या हुआ?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक प्रेस वार्ता का वीडियो इन दिनों चर्चा में है। वजह मुख्यमंत्री का भाषण नहीं, बल्कि उस प्रेस वार्ता में एक महिला पत्रकार का सवाल है—और उससे भी ज्यादा चर्चा इस बात की है कि उस सवाल का जवाब नहीं मिला।

महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल किया और उनसे अपने सवाल का जवाब देने का आग्रह किया। लेकिन सवाल का जवाब देने के बजाय मुख्यमंत्री वहां से चले गए। इसके बाद दिव्या श्रीवास्तव का मुख्यमंत्री से यह कहना भी सामने आया कि अगर पत्रकारों को सवाल पूछने और जवाब पाने का अधिकार ही नहीं है, तो फिर प्रेस वार्ता क्यों?

यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

प्रेस वार्ता या प्रेस एकालाप?

प्रेस वार्ता का सामान्य अर्थ ही है—पत्रकारों से संवाद। मुख्यमंत्री या कोई भी सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपनी बात रख सकता है, लेकिन पत्रकारों की मौजूदगी का अर्थ यही होता है कि वे सवाल भी पूछेंगे।

अगर कार्यक्रम केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने और प्रचार करने के लिए हो, तो उसे प्रेस वार्ता कहने का औचित्य क्या है?

दिव्या श्रीवास्तव ने इसी बुनियादी सवाल को उठाया।

वह मुख्यमंत्री से जवाब मांगती रहीं। मुख्यमंत्री वहां से चले गए, लेकिन पत्रकार का सवाल वहीं रह गया।

और यही सवाल अब सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस का विषय बना हुआ है।

सवाल पूछना पत्रकार का अपराध कब से हो गया?

इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू वह है जो प्रेस वार्ता के बाद सामने आने के दावे हैं।

मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री से सवाल पूछने वाली पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव से पुलिस/एलआईयू द्वारा पूछताछ की गई और उन्हें परेशान किया गया। यह भी दावा सामने आया है कि उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।

लेकिन यदि किसी पत्रकार को केवल सत्ता से सवाल पूछने के कारण पुलिस या प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ता है, तो यह सिर्फ एक पत्रकार की कहानी नहीं रह जाती। यह सीधे-सीधे पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का सवाल बन जाता है।

सवाल सत्ता से था, जवाब पत्रकार से क्यों मांगा गया?

लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है।

मुख्यमंत्री से सवाल पूछा जाए तो मुख्यमंत्री से जवाब अपेक्षित है। पत्रकार से ही पूछताछ होने लगे कि उसने सवाल क्यों पूछा, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे ज्यादा असहज स्थिति क्या हो सकती है?

दिव्या श्रीवास्तव का सवाल भी किसी निजी विवाद का सवाल नहीं था। वह सरकार और सत्ता के कामकाज से जुड़ा सवाल था।

ऐसे सवालों से असहमति हो सकती है। सवाल तीखा लग सकता है। सरकार उसका जवाब देने से भी इनकार कर सकती है। लेकिन सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही कटघरे में खड़ा कर देना पत्रकारिता और सत्ता के रिश्ते को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।

‘प्रेस वार्ता’ में सवाल नहीं तो फिर क्या?

इस घटना पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जब प्रेस को सवाल पूछने का अधिकार ही नहीं है तो प्रेस वार्ता का नाम बदलकर ‘प्रेस एकालाप’ कर देना चाहिए।

राजनीतिक बयान से अलग हटकर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है।

प्रेस वार्ता में पत्रकारों को केवल सरकार की उपलब्धियां सुनने के लिए बुलाया जाएगा या वे असहज सवाल भी पूछ सकेंगे?

अगर केवल प्रशंसा सुननी है, तो प्रेस वार्ता और सरकारी प्रचार कार्यक्रम में फर्क क्या रह जाएगा?

एक महिला पत्रकार की हिम्मत और बाकी पत्रकारों की चुप्पी

इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है।

जब दिव्या श्रीवास्तव मुख्यमंत्री से लगातार जवाब मांग रही थीं, तब वहां मौजूद बाकी पत्रकारों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।

एक महिला पत्रकार अकेले मुख्यमंत्री से सवाल करती रही। वह जवाब मांगती रही। मुख्यमंत्री चले गए, लेकिन सवाल करने वाली पत्रकार अपनी बात पर कायम रही।

क्या वहां मौजूद बाकी पत्रकारों को भी उनके सवाल के समर्थन में खड़ा नहीं होना चाहिए था?

पत्रकारिता केवल अपने लिए सवाल पूछने का नाम नहीं है। पत्रकारिता का मतलब यह भी है कि जब किसी पत्रकार को सवाल पूछने की वजह से दबाव का सामना करना पड़े तो पूरा मीडिया समुदाय उसके साथ खड़ा हो।

सत्ता को सवाल पसंद नहीं आए तो लोकतंत्र कैसे चलेगा?

आज असली मुद्दा दिव्या श्रीवास्तव नहीं, बल्कि सवाल पूछने का अधिकार है।

सरकारें आती-जाती रहती हैं। मुख्यमंत्री बदलते हैं। राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते हैं। लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं है।

सत्ता से सवाल पूछने वाला पत्रकार लोकतंत्र का विरोधी नहीं होता। वह लोकतंत्र की निगरानी करने वाले संस्थानों में से एक होता है।

इसलिए मुख्यमंत्री से पूछा गया एक सवाल अगर इतना असहज पैदा कर देता है कि सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही सफाई देनी पड़े, तो सवाल केवल मुख्यमंत्री से नहीं, पूरी व्यवस्था से है।

सवाल यह नहीं कि दिव्या श्रीवास्तव ने इतना बड़ा सवाल क्यों पूछा।

सवाल यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उस सवाल का जवाब क्यों नहीं दिया?

और उससे भी बड़ा सवाल—

अगर प्रेस वार्ता में पत्रकार सवाल नहीं पूछ सकता, तो फिर उसे प्रेस वार्ता कहें या प्रेस एकालाप?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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