September 10, 2026 8:53 pm
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मतदाता सूची का यह ‘शुद्धीकरण’ सवालों के घेरे में

दिल्ली SIR में 47.56 लाख नाम draft voter list से बाहर हुए और करीब 33 लाख मतदाताओं को notice की तैयारी है। जानिए SIR के आंकड़े, सवाल और देशभर पर असर।

SIR का बुलडोजर: दिल्ली में 47 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर, 33 लाख को नोटिस

दिल्ली से उठे सवाल अब पूरे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया तक पहुँच रहे हैं। Special Intensive Revision यानी SIR के तहत दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 47.56 लाख नाम बाहर हो गए हैं। करीब 33 लाख मतदाताओं को अपने रिकॉर्ड और पात्रता से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए नोटिस मिलने हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी करोड़ों नाम ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हुए हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने नाम हटे—सवाल यह है कि इनमें से कितने वास्तविक मतदाता हैं और कितनों को अंतिम सूची से बाहर होने का जोखिम है।

दिल्ली इस समय एक ऐसे चुनावी पुनरीक्षण की प्रयोगशाला बन गई है, जिसका असर केवल राजधानी के मतदाताओं पर नहीं, बल्कि देश में मतदाता अधिकार और चुनावी विश्वसनीयता की बहस पर पड़ सकता है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय जनवरी 2025 में राजधानी की मतदाता सूची में करीब 1.56 करोड़ मतदाता थे। जून 2026 में SIR शुरू होने के समय यह संख्या करीब 1.45 करोड़ रह गई थी। इसके बाद SIR की enumeration प्रक्रिया में 47,56,722 नाम draft electoral roll में आगे नहीं बढ़े। 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट सूची में करीब 97.53 लाख नाम रह गए।

यानी दिल्ली की SIR प्रक्रिया के draft stage पर लगभग हर तीन में से एक मतदाता सूची से बाहर हो गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

करीब 33 लाख मतदाता draft roll में तो हैं, लेकिन उनके रिकॉर्ड में discrepancies या पुराने electoral roll से mapping की समस्या पाई गई है। इन मतदाताओं को नोटिस भेजकर पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज देने को कहा जा रहा है। इनमें लगभग 14 लाख ऐसे मतदाता बताए गए हैं जिनका रिकॉर्ड 2002 की SIR सूची से map नहीं हो पाया।

यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है।

1.56 करोड़ से 97.5 लाख तक: दिल्ली में क्या हुआ?

आंकड़ों को क्रम से देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है।

  • जनवरी 2025: करीब 1.56 करोड़ मतदाता
  • जून 2026 में SIR शुरू होने के समय: करीब 1.45 करोड़
  • SIR enumeration के बाद draft roll: 97.53 लाख
  • draft में आगे न बढ़े नाम: 47.56 लाख
  • draft roll में मौजूद लेकिन discrepancy/mapping के कारण नोटिस की श्रेणी में: करीब 33 लाख

इसलिए “91 लाख वोटर डिलीट हो गए” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। 91 लाख का आंकड़ा अलग-अलग चरणों और श्रेणियों को जोड़कर निकाला गया है। 47.56 लाख नाम draft roll से बाहर हुए हैं, जबकि 33 लाख अन्य मतदाता अभी draft में मौजूद हैं लेकिन verification के दायरे में हैं।

फिर भी यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे केवल प्रशासनिक आंकड़ा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा सवाल: क्या 2025 का चुनाव भी सवालों के घेरे में आएगा?

यही वह प्रश्न है जो दिल्ली में उठ रहा है।

2025 के विधानसभा चुनाव में जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में थे, उनमें से लाखों लोगों ने मतदान किया। यदि आज SIR के draft stage में उन्हीं मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम बाहर हो रहे हैं, तो स्वाभाविक सवाल है:

क्या वर्तमान SIR से पहले की मतदाता सूची पर्याप्त रूप से विश्वसनीय थी?

और यदि वह विश्वसनीय थी, तो इतने बड़े पैमाने पर नाम बाहर होने का कारण क्या है?

दूसरी तरफ चुनाव आयोग का पक्ष यह है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित, duplicate या अन्य अयोग्य entries को हटाना है। केंद्र सरकार ने भी SIR को electoral rolls को accurate और up-to-date बनाने की प्रक्रिया बताया है तथा कहा है कि पात्र मतदाता बाहर न रह जाएं, इसके लिए safeguards मौजूद हैं।

लेकिन जमीन पर सामने आ रही शिकायतें प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती हैं।

दिल्ली में नागरिकों ने ऐसे मामलों की शिकायत की है जिनमें जीवित और लंबे समय से उसी पते पर रह रहे लोगों के नाम गायब हैं या उन्हें गलत श्रेणी में डाल दिया गया है। हाल की जनसुनवाइयों में ऐसे मतदाताओं ने अपने नाम दोबारा शामिल कराने की कोशिशों के बारे में बताया है।

यह सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं का सवाल नहीं

SIR पर राजनीतिक बहस में अक्सर यह धारणा सामने आती है कि इसका सबसे बड़ा असर मुस्लिम मतदाताओं पर होगा।

लेकिन दिल्ली के आंकड़े इससे कहीं ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करते हैं।

किसी व्यक्ति का नाम electoral roll से हटने के पीछे धर्म का कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं किया गया है। इसलिए किसी भी पूरी सूची को धार्मिक आधार पर पढ़ना उचित नहीं होगा।

लेकिन यही बात एक दूसरे महत्वपूर्ण सवाल को जन्म देती है:

यदि SIR में बड़ी संख्या में सामान्य, लंबे समय से मतदान करते आ रहे नागरिकों के नाम भी प्रभावित हो रहे हैं, तो प्रक्रिया की त्रुटियों का बोझ किस पर पड़ेगा?

गरीब, किरायेदार, झुग्गी-बस्ती में रहने वाले, बार-बार विस्थापित होने वाले और ऐसे नागरिक जिनके दस्तावेज व्यवस्थित नहीं हैं—इनके लिए यह प्रक्रिया कहीं अधिक कठिन हो सकती है।

यही कारण है कि SIR की बहस को केवल “फर्जी वोटरों को हटाने” बनाम “वोटरों के अधिकार बचाने” की राजनीतिक लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि inclusion और exclusion की प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में देखना जरूरी है।

दिल्ली अकेली नहीं है

दिल्ली का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देशभर में चल रहे SIR के बड़े परिदृश्य का हिस्सा है।

1 सितंबर तक 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की draft electoral rolls के आंकड़ों के आधार पर 13.37 करोड़ से अधिक नाम draft lists से बाहर हो चुके थे। Indian Express के विश्लेषण के मुताबिक यह संख्या pre-revision electorate की तुलना में करीब 14.1 प्रतिशत बैठती है।

दिल्ली में exclusion rate करीब 32.8 प्रतिशत रहा, जो draft stage पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे ऊंचे स्तरों में है। महाराष्ट्र में यह करीब 21.1 प्रतिशत और तेलंगाना में करीब 21.7 प्रतिशत बताया गया।

इसका अर्थ यह नहीं है कि ये सभी लोग स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से वंचित हो चुके हैं। Draft roll अंतिम electoral roll नहीं है। जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उनके लिए claims और objections की प्रक्रिया उपलब्ध है।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह भी है कि कितने नागरिकों को अपना अधिकार बचाने के लिए खुद आगे आना पड़ेगा और कितने नागरिक इस प्रक्रिया की जानकारी या साधनों के अभाव में चुपचाप बाहर रह जाएंगे?

जब ‘बड़े नाम’ भी discrepancy list में आए

SIR को लेकर चिंता तब और चर्चा में आई जब कर्नाटक में कुछ बेहद जाने-पहचाने नाम electoral verification के दौरान discrepancy/mapping से जुड़े मामलों में सामने आए।

Infosys के सह-संस्थापक Nandan Nilekani और उनके परिवार के नाम discrepancy list में आने की रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार Nilekani का रिकॉर्ड पिछले SIR database से “unmapped” बताया गया है।

वहीं Bharat Ratna से सम्मानित वैज्ञानिक Prof. C.N.R. Rao का नाम भी discrepancy report में सामने आया। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है: Bengaluru election authorities ने कहा है कि Rao को कोई औपचारिक SIR notice जारी नहीं किया गया था। उनके मौजूदा और 2002 के रिकॉर्ड में नाम की भिन्नता पाई गई थी, लेकिन BLO ने उनके नाम को final roll में बनाए रखने की सिफारिश की।

यह correction इसलिए जरूरी है क्योंकि C.N.R. Rao के मामले को “92 वर्षीय Bharat Ratna वैज्ञानिक को नोटिस” कहना वर्तमान आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

लेकिन इससे मूल सवाल खत्म नहीं होता।

अगर देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिकों में शामिल व्यक्ति का रिकॉर्ड भी पुराने database से mapping की समस्या में आ सकता है, तो सवाल यह है कि ऐसी तकनीकी या दस्तावेजी विसंगतियों से आम नागरिक कैसे निपटेगा?

यही SIR की सबसे बड़ी परीक्षा है।

क्या SIR चुनावी सुधार है या exclusion का खतरा?

मतदाता सूची का शुद्धिकरण लोकतंत्र के लिए जरूरी है। मृत लोगों, duplicate entries और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।

लेकिन उसी प्रक्रिया में यदि वास्तविक मतदाता भी छूट जाएं, तो “purification” स्वयं लोकतांत्रिक exclusion का कारण बन सकता है।

इसलिए असली कसौटी केवल यह नहीं होनी चाहिए कि कितने नाम हटाए गए।

असली सवाल होने चाहिए:

कितने नाम सही कारण से हटे?

कितने नाम गलत तरीके से बाहर हुए?

कितने लोगों को समय पर notice मिला?

कितनों को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर मिला?

कितने नाम claims और objections के बाद वापस जोड़े गए?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या अंतिम सूची तैयार होने के बाद स्वतंत्र रूप से यह audit किया जाएगा कि कितने eligible citizens वास्तव में electoral roll से बाहर रह गए?

दिल्ली अब एक टेस्ट केस है

दिल्ली में करीब 47.56 लाख नामों का draft stage पर बाहर होना अपने आप में एक असाधारण प्रशासनिक घटना है। करीब 33 लाख अन्य मतदाताओं का verification के दायरे में होना इस चिंता को और बढ़ाता है।

लेकिन इसे “13 करोड़ फर्जी वोटर” या “91 लाख फर्जी वोटर” कह देना भी उतना ही गलत होगा।

ये वे लोग हैं जिनके नाम विभिन्न कारणों से draft rolls में carry forward नहीं हुए या जिनके records में verification की जरूरत बताई गई है। इनमें कितने वास्तविक मतदाता हैं और कितने वास्तव में हटाए जाने योग्य हैं—इसका अंतिम उत्तर final electoral rolls और claims-objections की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मिलेगा।

यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

क्योंकि मतदाता सूची सिर्फ नामों की spreadsheet नहीं है।

मतदाता सूची में नाम होना नागरिक के लोकतांत्रिक अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

और अगर लाखों लोगों को यह साबित करने के लिए कतार में खड़ा होना पड़े कि वे मौजूद हैं, वे यहीं रहते हैं और वे वोट देने के हकदार हैं, तो सवाल पूछना लोकतंत्र-विरोधी नहीं है।

सवाल पूछना ही लोकतंत्र की पहली शर्त है।

SIR को लेकर बहस इसलिए होनी चाहिए कि मतदाता सूची साफ हो—लेकिन ऐसी सफाई में कोई वास्तविक मतदाता अपनी आवाज न खो दे।

दिल्ली का सवाल इसलिए सिर्फ दिल्ली का सवाल नहीं है।
यह सवाल देश के हर उस नागरिक का है जिसका लोकतांत्रिक अधिकार एक सूची में दर्ज है—और जो कल उसी सूची में अपना नाम खोजने जाएगा।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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