September 9, 2026 12:44 am
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सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे पर PM मोदी की चुप्पी से सवाल

दिल्ली के सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे के बाद छात्रों की सुरक्षा, राहत-बचाव और प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। PM मोदी की प्रतिक्रिया को लेकर भी बहस।

जवाबदेही तय करने की मांग, लेकिन मोदीजी तो पेरिस में मंदिर की बधाई देने में व्यस्त

राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पीजी हॉस्टल की इमारत गिरने की घटना ने देश के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद मलबे में छात्रों के दबे होने, राहत और बचाव अभियान की गति तथा प्रशासन की तैयारियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस हादसे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया को लेकर भी विपक्षी आवाजों और सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र व दिल्ली सरकार के रवैये से सवाल उठता है कि जब देश की राजधानी में एक इमारत गिरने के बाद छात्र मलबे में फंसे हुए थे, तब प्रधानमंत्री की ओर से हादसे पर सार्वजनिक रूप से संवेदना व्यक्त करने में कथित तौर पर देरी क्यों हुई?

सत्य निकेतन हादसे ने राजधानी की तैयारियों पर उठाए सवाल

6 सितंबर को सत्य निकेतन इलाके में पीजी हॉस्टल की इमारत ढह गई और बड़ी संख्या में छात्र उसके मलबे में फंस गए। राहत और बचाव अभियान के दौरान परिवारों की चिंता लगातार बढ़ती रही। दिल्ली प्रशासन और आपदा प्रबंधन तंत्र की प्रतिक्रिया को लेकर कई सवाल हैं। निजी क्षेत्र की एम्बुलेंस सेवाएं सरकारी एम्बुलेंस से पहले मौके पर पहुंचीं।

हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजधानी दिल्ली में इतने बड़े स्तर की इमारत दुर्घटना से निपटने के लिए राहत और बचाव व्यवस्था कितनी तैयार थी।

प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकताओं पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर भी सवाल है। हादसे के दौरान प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्वामीनारायण मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम को लेकर सार्वजनिक संदेश दिया, लेकिन सत्य निकेतन हादसे पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। जाहिर है कि प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं और संवेदनशीलता पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है।

अमित शाह के गोवा कार्यक्रम को लेकर भी निशाना

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गोवा में भाजपा कार्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने पर भी सवाल है। जिस समय दिल्ली में राहत व बचाव अभियान चल रहा था, उसी दौरान केंद्र के शीर्ष नेताओं की अन्य राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं। क्या ऐसे गंभीर हादसे के दौरान शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को घटनास्थल और पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता सार्वजनिक रूप से दिखानी नहीं चाहिए थी?

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर भी सवाल

हादसे को लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की भूमिका भी घेरे में है। आरोप कि हादसे के बाद प्रशासन की कार्रवाई में निचले स्तर के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, लेकिन बड़े अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल बने हुए हैं।

छात्रों और उनके परिवारों की सबसे बड़ी चिंता—मारे गए लोगों की पहचान

हादसे के बाद प्रभावित परिवारों के लिए सबसे कठिन स्थिति यह रही कि उन्हें अपने बच्चों की स्थिति को लेकर लगातार इंतजार करना पड़ा। हादसे के 24 घंटे से अधिक समय बाद भी मृतकों और घायलों की स्थिति को लेकर स्पष्ट और समयबद्ध जानकारी क्यों नहीं दी गई। किसी भी बड़े हादसे में पीड़ितों की पहचान, परिवारों को सूचना और पारदर्शी हेल्पलाइन व्यवस्था राहत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

मलबे में दबे छात्रों के परिवारों के लिए हर गुजरता मिनट चिंता और अनिश्चितता से भरा रहा।

क्या राजधानी ने पिछली घटनाओं से कोई सबक लिया?

सत्य निकेतन की घटना राजधानी दिल्ली में पहले हुई इमारत गिरने और आग जैसी घटनाओं से जोड़कर देखा जाना चाहिए। सवाल यह है कि बार-बार होने वाली ऐसी घटनाओं के बावजूद दिल्ली में आपदा प्रतिक्रिया तंत्र कितना मजबूत हुआ है।

  • क्या राजधानी में पर्याप्त आधुनिक रेस्क्यू उपकरण उपलब्ध हैं?
  • क्या सरकारी एम्बुलेंस नेटवर्क बड़े हादसे की स्थिति में तुरंत सक्रिय हो सकता है?
  • क्या राष्ट्रीय और स्थानीय आपदा राहत एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय है?
  • और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अवैध या असुरक्षित पीजी और इमारतों की समय रहते जांच होती है?

इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि प्रशासनिक जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट से मिलना चाहिए।

मलबे के नीचे सिर्फ इमारत नहीं, परिवारों के सपने भी दबे

सत्य निकेतन हादसे ने राजधानी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा की है। देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली पढ़ने और अपना भविष्य बनाने आए युवाओं के लिए सुरक्षित आवास की व्यवस्था सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है।

इस हादसे ने यह सवाल भी सामने रखा है कि दिल्ली के पीजी और किराये के आवासों में सुरक्षा मानकों की नियमित जांच कितनी प्रभावी है। हादसे की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार लोगों की पहचान की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं, जवाबदेही का है

सत्य निकेतन की घटना को केवल एक इमारत गिरने की दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। इस हादसे से जुड़े हर सवाल का जवाब सामने आना चाहिए—इमारत की स्थिति क्या थी, सुरक्षा मानकों का पालन हुआ या नहीं, पीजी का संचालन किस तरह हो रहा था, निरीक्षण किसने किया और हादसे के बाद राहत व बचाव अभियान में कहीं कोई लापरवाही हुई या नहीं। प्रधानमंत्री से लेकर दिल्ली सरकार और स्थानीय प्रशासन तक, जिस भी स्तर पर जिम्मेदारी बनती है, वहां जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि मलबे में दबे छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे उन परिवारों के बच्चे हैं जिन्होंने अपने भविष्य के सपने लेकर दिल्ली का रुख किया था।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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