August 7, 2026 12:36 am
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रांची का ‘जंतर-मंतर’ क्यों है दिल्ली से अलग

रांची में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक के खिलाफ छात्र आंदोलन तेज। विधानसभा घेराव का ऐलान, सोनम वांगचुक का समर्थन और राजनीति के कई नए सवाल।

झारखंड में छात्र आंदोलन को क्यों मिल रहा है हर तरफ से समर्थन

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद अब झारखंड की राजधानी रांची भी छात्रों के बड़े आंदोलन का केंद्र बनती दिखाई दे रही है। मुद्दा लगभग वही है—भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, अनियमितताएं और युवाओं के भविष्य का सवाल। लेकिन रांची का यह आंदोलन कई मायनों में दिल्ली से अलग है और यही इसे राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है।

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के खिलाफ छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन अब सिर्फ धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। छात्र नेता और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) से जुड़े देवेंद्रनाथ महतो ने 2 अगस्त से आमरण अनशन शुरू किया। 5 अगस्त से उन्होंने सोनम वांगचुक की सलाह पर केवल पानी पीना शुरू किया, लेकिन अनशन जारी रखा। 7 अगस्त को विधानसभा घेराव का ऐलान किया गया है और हजारों छात्र मशाल जुलूस निकाल चुके हैं।

छात्रों के हाथों में शिबू सोरेन की तस्वीर

आंदोलन स्थल पर छात्रों के हाथों में झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। छात्रों का संदेश साफ है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने पिता के संघर्ष और जनपक्षधर राजनीति से सीख लें तथा युवाओं की मांगों को गंभीरता से सुनें।

हालांकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर संवेदनशील होने की बात कह चुके हैं, लेकिन छात्रों का आरोप है कि सरकार की ओर से अब तक ठोस पहल नहीं हुई है।

दिल्ली के जंतर-मंतर जैसा माहौल, लेकिन बड़ा अंतर भी

रांची का आंदोलन कई मामलों में दिल्ली के जंतर-मंतर की याद दिलाता है। विभिन्न छात्र संगठनों की भागीदारी है, मशाल जुलूस निकल रहे हैं और विधानसभा घेराव का आह्वान किया गया है।

इस आंदोलन को सोनम वांगचुक ने भी समर्थन दिया है। झारखंड के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ वामपंथी छात्र संगठन आइसा (AISA) और एसएफआई (SFI) भी सक्रिय रूप से आंदोलन में शामिल हैं। बताया जा रहा है कि आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा तिवारी भी विधानसभा घेराव कार्यक्रम में भाग लेने रांची पहुंच रही हैं।

लेकिन सबसे बड़ा अंतर राजनीतिक है।

यहां विपक्ष की नहीं, विपक्ष की सरकार के खिलाफ आंदोलन

दिल्ली के छात्र आंदोलन के दौरान केंद्र में भाजपा-नीत सरकार थी। जबकि झारखंड में आंदोलन का सामना कर रही सरकार झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेतृत्व वाली INDIA गठबंधन सरकार है, जिसमें कांग्रेस और वाम दल भी सहयोगी हैं।

ऐसे में यह तर्क देना कठिन है कि विपक्ष छात्रों को सरकार के खिलाफ उकसा रहा है, क्योंकि यहां स्वयं विपक्ष की सरकार सत्ता में है।

यही कारण है कि यह आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक अलग उदाहरण भी पेश करता है, जहां छात्र सरकार की राजनीतिक पहचान से इतर अपने भविष्य और रोजगार के सवाल पर संघर्ष कर रहे हैं।

भाजपा और एबीवीपी की सक्रियता भी चर्चा में

दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसका छात्र संगठन ABVP अपेक्षाकृत शांत दिखाई दिए थे, वहीं झारखंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) आंदोलन के समर्थन में सक्रिय नजर आ रही है।

आंदोलन के एक वर्ग द्वारा इसे “संस्कारयुक्त आंदोलन” बताया जा रहा है और दिल्ली के आंदोलन से अलग साबित करने की कोशिश भी की जा रही है।

हालांकि आंदोलन के दौरान “पेपर लीक से आज़ादी” और “भ्रष्टाचार से आज़ादी” जैसे नारे भी सुनाई दे रहे हैं। सवाल उठता है कि ऐसे नारों से आखिर किसे आपत्ति हो सकती है, जब मुद्दा छात्रों के भविष्य का हो।

वाम दल सरकार में भी, आंदोलन के साथ भी

इस आंदोलन का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) सरकार की सहयोगी होने के बावजूद छात्रों के साथ खुलकर खड़ी दिखाई दे रही है।

माले ने सरकार से छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेने की अपील की है, जबकि उसका छात्र संगठन आइसा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर रहा है। यह इस बात का संकेत माना जा रहा है कि छात्र हितों के सवाल पर सहयोगी दल भी सरकार की आलोचना करने से पीछे नहीं हट रहे।

दूसरी ओर कांग्रेस फिलहाल आंदोलन को देख-परख रही है, हालांकि युवा कांग्रेस और NSUI के कुछ नेता आंदोलन में दिखाई दे रहे हैं।

मीडिया की भूमिका भी बदली हुई

दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान जिस मीडिया के एक हिस्से पर आंदोलन को बदनाम करने के आरोप लगे थे, वही मीडिया रांची आंदोलन की सकारात्मक रिपोर्टिंग करता दिखाई दे रहा है।

कई चर्चित टीवी एंकर रांची पहुंचकर आंदोलन को प्रमुखता से कवर कर रहे हैं। हालांकि आंदोलन के भीतर यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं छात्र आंदोलन को धार्मिक या सांप्रदायिक विमर्श की ओर मोड़ने की कोशिश न हो।

असली सवाल राजनीति नहीं, छात्रों का भविष्य

झारखंड का छात्र आंदोलन एक बार फिर यह सवाल सामने ला रहा है कि पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताएं किसी एक राज्य या किसी एक दल की समस्या नहीं हैं।

चाहे केंद्र में भाजपा की सरकार हो या किसी राज्य में विपक्ष की सरकार, छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के अनुसार आंदोलन का समर्थन या विरोध कर सकते हैं, लेकिन अंततः जवाबदेही हर सरकार की है। क्योंकि पेपर लीक, भर्ती में पारदर्शिता और युवाओं के रोजगार का सवाल किसी दल का नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य का प्रश्न है।

मुकुल सरल

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