April 21, 2026 4:41 pm
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मोदी के गुजरात से पलायन को मजबूर हज़ारों मज़दूर

सूरत में मजदूरों के पलायन के पीछे गैस संकट, बेरोजगारी और औद्योगिक मंदी की असली कहानी। जानिए ‘गुजरात मॉडल’ का सच।

“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से आती दर्दनाक कहानी और ‘गुजरात मॉडल’ का सच

“अब नहीं आऊंगा दोस्त…” — यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उस दर्द, हताशा और टूटन की अभिव्यक्ति है जिसे सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर हजारों प्रवासी मजदूरों के चेहरों पर साफ देखा जा सकता है। लाठीचार्ज, अफरातफरी और भीड़—ये दृश्य किसी त्योहार या छुट्टियों के नहीं, बल्कि मजबूरी में घर लौटते मजदूरों के हैं।

गुजरात, जिसे अक्सर ‘विकास मॉडल’ के रूप में पेश किया जाता है, वहीं से इस तरह का पलायन कई सवाल खड़े करता है। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया इसे “गर्मियों की छुट्टियों का असर” बताकर वास्तविकता से ध्यान भटका रही है। सवाल उठता है—क्या कोई मजदूर छुट्टी मनाने जाते समय कहता है, “अब नहीं आऊंगा दोस्त”?

मीडिया नैरेटिव बनाम हकीकत

कुछ मीडिया संस्थानों ने इस भीड़ को सामान्य मौसमी घटना बताने की कोशिश की। जबकि हकीकत यह है कि:

  • अभी देश में कहीं भी गर्मियों की छुट्टियां शुरू नहीं हुई हैं।
  • न स्कूल-कॉलेज बंद हैं, न ही कोई ऐसा मौसम है जब लोग स्वाभाविक रूप से अपने गांव लौटते हों।
  • रेलवे ने खुद स्वीकार किया कि ऐसी भीड़ उसने पहले कभी नहीं देखी।

यह स्पष्ट करता है कि यह कोई सामान्य पलायन नहीं, बल्कि एक असाधारण संकट का संकेत है।

क्या है असली वजह?

सूरत का टेक्सटाइल और हीरा उद्योग लंबे समय से दबाव में है। लेकिन इस बार संकट और गहरा है।

1. गैस संकट का असर

पश्चिम एशिया में तनाव, खासकर ईरान पर हमले और युद्ध जैसी स्थिति के कारण:

  • औद्योगिक गैस में 50% तक कटौती कर दी गई।
  • फैक्ट्रियों का उत्पादन आधा हो गया।
  • काम कम हुआ, मजदूरी घटी।

2. रसोई गैस की समस्या

  • मजदूरों को घरेलू गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा या बेहद महंगा मिल रहा है।
  • 300-400 रुपये प्रति किलो तक गैस भरवानी पड़ रही है।
  • रोजमर्रा का जीवन असंभव होता जा रहा है।

3. काम की अनिश्चितता

  • फैक्ट्रियों में 10-15 दिन के लिए काम रोक दिया जाता है।
  • मजदूरों की संख्या घटा दी जाती है।
  • रोजगार की स्थिरता खत्म हो रही है।

त्योहार या खेती का भी कोई कारण नहीं

यह पलायन न तो दिवाली का है, न छठ का, और न ही खेती का मौसम है:

  • न कोई बुवाई हो रही है, न कटाई।
  • न ही कोई चुनावी गतिविधि है जिससे मजदूरों को बुलाया जा रहा हो।

यानी यह पूरी तरह से आर्थिक संकट और जीविका के संकट का परिणाम है।

देशभर में एक जैसी स्थिति

सूरत ही नहीं, दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े औद्योगिक शहरों में भी यही हालात देखने को मिल रहे हैं। मजदूर या तो:

  • पलायन कर रहे हैं
  • या फिर आंदोलन करने को मजबूर हो रहे हैं

यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की है।

छुपाया जा रहा है असली संकट

जब इन सभी तथ्यों को एक साथ देखा जाए, तो साफ होता है कि यह एक गहरा आर्थिक और सामाजिक संकट है, जिसे मीडिया के एक हिस्से द्वारा जानबूझकर छुपाया जा रहा है।

“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”—यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो मजदूरों को जीने की बुनियादी शर्तें भी नहीं दे पा रही।

मुकुल सरल

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