April 21, 2026 2:48 am
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क्यों है तमिलनाडु में हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ तगड़ा sentiment

जानिए तमिलनाडु में RSS का प्रभाव, द्रविड़ राजनीति से टकराव और BJP की जमीनी हकीकत का विस्तृत विश्लेषण।

आरएसएस की रणनीति और सीमाएँ: बीजेपी को कितना मिल रहा सहारा?

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से भारत के अन्य राज्यों से अलग पहचान रखती रही है। यहाँ द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि बाहरी राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों के लिए जमीन बनाना आसान नहीं रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तमिलनाडु में किस तरह काम कर रहा है और वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कितना मजबूत कर पा रहा है?

1940 से शुरुआत, लेकिन सीमित प्रभाव

आरएसएस ने तमिलनाडु में अपनी गतिविधियाँ 1940 के दशक से शुरू कर दी थीं। हालांकि, लंबे समय तक उसका प्रभाव सीमित ही रहा। पिछले दो वर्षों में संगठन ने राज्य पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है। पहले जहाँ लगभग 1500 शाखाएँ थीं, अब उनकी संख्या बढ़कर करीब 3000 तक पहुँच गई है। यह विस्तार अपने आप में एक रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है।

वैचारिक टकराव: सबसे बड़ी चुनौती

तमिलनाडु में आरएसएस के लिए सबसे बड़ा अवरोध वैचारिक रहा है।

  1. आर्य बनाम द्रविड़ विमर्श
    आरएसएस की हिंदुत्व की अवधारणा में आर्य पहचान को विशेष महत्व दिया जाता है, जबकि तमिलनाडु की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना द्रविड़ पहचान पर आधारित है। यहाँ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धारणाएँ हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता को द्रविड़ परंपरा से जोड़ती हैं, जो आरएसएस के दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं।
  2. पेरियार की विरासत
    ई. वी. रामासामी नायकर (पेरियार) ने तमिल समाज में आत्मसम्मान, नास्तिकता और सामाजिक न्याय की जो चेतना पैदा की, वह आरएसएस के विचारों के विपरीत है। पेरियार ने न केवल ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था का विरोध किया, बल्कि महिलाओं के अधिकारों और समानता के लिए भी संघर्ष किया।
  3. द्रविड़ राजनीति का प्रभाव
    पेरियार की विचारधारा से प्रेरित होकर द्रविड़ आंदोलन विकसित हुआ, जिससे द्रविड़ कड़गम, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और बाद में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जैसी पार्टियाँ बनीं। इन दलों ने राज्य की राजनीति में ऐसा प्रभाव बनाया जो आरएसएस और बीजेपी के विस्तार में बाधा बना।

बीजेपी के लिए जमीन तलाशने की कोशिश

तमिलनाडु में बीजेपी का अस्तित्व लंबे समय तक सीमित रहा है। एआईएडीएमके की नेता जे. जयललिता के निधन के बाद आरएसएस और बीजेपी ऐसे नेतृत्व की तलाश में रहे जो उनके साथ तालमेल बैठा सके। लेकिन अभी तक यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुआ है।

आरएसएस की वर्तमान रणनीतियाँ

पिछले कुछ वर्षों में आरएसएस ने तमिलनाडु में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई तरीके अपनाए हैं:

  • शाखाओं का विस्तार
  • यात्राएँ और परेड
  • कॉलेजों और युवाओं के बीच सक्रियता
  • धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए पहुँच
  • सेवा कार्यों के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव

आरएसएस विशेष रूप से छात्रों और युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि यही वर्ग भविष्य की राजनीति को प्रभावित करता है।

‘सनातन’ और राजनीतिक विवाद

तमिलनाडु में ‘सनातन धर्म’ को लेकर भी बड़ा विवाद सामने आया, जब उधयनिधि स्टालिन ने इसे बीमारी से तुलना करते हुए आलोचना की। यह बयान राज्य की वैचारिक दिशा को दर्शाता है, जहाँ आरएसएस की विचारधारा को खुली चुनौती मिलती है।

सांस्कृतिक हस्तक्षेप की रणनीति

आरएसएस ने सांस्कृतिक स्तर पर भी हस्तक्षेप की कोशिश की है। उदाहरण के तौर पर:

  • चेन्नई के स्लम इलाकों में गणेश (विनायक) मूर्तियों का वितरण
  • उत्तर भारतीय धार्मिक परंपराओं को स्थानीय स्तर पर स्थापित करने का प्रयास
  • धार्मिक आयोजनों के जरिए सामाजिक आधार तैयार करना

यह प्रयास उत्तर भारतीय सांस्कृतिक तत्वों को तमिल समाज में स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

भौगोलिक फोकस: किन शहरों पर ध्यान?

आरएसएस की प्रमुख गतिविधियाँ तमिलनाडु के कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित हैं:

  • मदुरई
  • कोयंबटूर
  • चेन्नई

इन क्षेत्रों में संगठन अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, खासकर ब्राह्मण और शहरी वर्गों के बीच।

क्या तमिलनाडु बदलेगा?

हालाँकि शाखाओं की संख्या और गतिविधियों में वृद्धि हुई है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि तमिलनाडु आरएसएस की विचारधारा के प्रभाव में आ गया है। द्रविड़ राजनीति, सामाजिक न्याय की परंपरा और भाषा-सांस्कृतिक अस्मिता अभी भी मजबूत हैं।

निष्कर्ष

तमिलनाडु आरएसएस के लिए एक चुनौतीपूर्ण भूगोल बना हुआ है। संगठन अपनी रणनीतियाँ बदलकर, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर काम करके अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन राज्य की ऐतिहासिक और वैचारिक विरासत उसे सीमित करती रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह संघर्ष किस दिशा में जाता है।

राम पुनियानी

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