April 20, 2026 2:13 am
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नारी वंदन की बात कर रहे PM को इन आदिवासी महिलाओं के आंसू नहीं दिख रहे!

मध्य प्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ आदिवासी महिलाओं का अनोखा और दर्दनाक विरोध। जानिए विस्थापन, पर्यावरण और विकास की पूरी कहानी।

केन–बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ उग्र प्रतिरोध: विकास बनाम विस्थापन की हकीकत

मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले से सामने आई तस्वीरें भारत के विकास मॉडल पर एक असहज और तीखा सवाल खड़ा करती हैं। एक ओर संसद के भीतर महिला आरक्षण और नारी वंदन जैसे बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी देश में आदिवासी महिलाएं अपनी अर्थी सजाकर, गले में फांसी का फंदा डालकर और शरीर पर नदी की मिट्टी पोतकर विरोध करने को मजबूर हैं।

यह विरोध केवल एक परियोजना के खिलाफ नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल के खिलाफ है जो सबसे हाशिये पर खड़े समुदायों को कुचलकर आगे बढ़ता है।

क्या है केन–बेतवा लिंक परियोजना?

Ken-Betwa River Linking Project भारत की पहली प्रमुख नदी-लिंकिंग परियोजना है, जिसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी से जोड़ना है।

इस परियोजना की परिकल्पना Atal Bihari Vajpayee के कार्यकाल में की गई थी, और इसे देश के जल संकट का समाधान बताकर आगे बढ़ाया गया।

सरकार के दावे:

  • सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी
  • पेयजल की उपलब्धता
  • जलविद्युत उत्पादन
  • बुंदेलखंड क्षेत्र का विकास

लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग कहानी बयां करती है।

विरोध क्यों कर रही हैं आदिवासी महिलाएं?

छतरपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर, कई गांवों की आदिवासी महिलाएं 6-7 अप्रैल से भूख हड़ताल और विभिन्न शांतिपूर्ण विरोध तरीकों का सहारा ले रही हैं।

उनकी प्रमुख मांगें हैं:

  • जमीन के बदले जमीन
  • सम्मानजनक पुनर्वास
  • जंगल, नदी और आजीविका के अधिकार की रक्षा

इनका कहना है कि:

“हम आदिवासी हैं, बिना जंगल और जमीन के नहीं जी सकते।”

जब उनकी आवाज़ नहीं सुनी गई, तो उन्होंने अपने विरोध को चरम पर ले जाते हुए:

  • अपनी अर्थी सजाई
  • बच्चों के साथ बैठकर मरने का संकल्प लिया
  • केन नदी की मिट्टी शरीर पर पोती
  • जल सत्याग्रह किया

यह केवल विरोध नहीं, बल्कि निराशा की अंतिम अभिव्यक्ति है।

कितने बड़े पैमाने पर होगा विस्थापन?

इस परियोजना के तहत:

  • लगभग 50 से अधिक गांव डूब क्षेत्र में आएंगे
  • हजारों आदिवासी परिवारों का विस्थापन होगा
  • पारंपरिक जीवनशैली पूरी तरह खत्म होने का खतरा है

साथ ही, यह परियोजना पर्यावरण के लिहाज से भी गंभीर चिंता पैदा करती है।

पन्ना टाइगर रिजर्व पर खतरा

Panna Tiger Reserve, जो देश के प्रमुख टाइगर रिजर्व में से एक है, इस परियोजना से प्रभावित होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • बाघों के आवास क्षेत्र में कमी आएगी
  • जैव विविधता को भारी नुकसान होगा
  • जंगलों का बड़ा हिस्सा डूब सकता है

विकास की कीमत: किसके लिए और किसकी कीमत पर?

सरकार इस परियोजना को “स्टार प्रोजेक्ट” बताकर बड़े निवेश और विकास का दावा करती है। लेकिन सवाल यह है कि:

  • क्या विकास का मतलब लोगों को उजाड़ना है?
  • क्या आदिवासी समुदायों की सहमति के बिना उनकी जमीन ली जा सकती है?
  • क्या पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज किया जा सकता है?

यह विरोध इन्हीं सवालों को केंद्र में लाता है।

राजनीतिक और नैतिक सवाल

जब संसद में महिला सशक्तिकरण की बात हो रही है, तब ये तस्वीरें सीधे तौर पर सवाल उठाती हैं:

  • Narendra Modi की “नारी शक्ति” की गारंटी क्या इन महिलाओं तक पहुँचती है?
  • जब देश की राष्ट्रपति Droupadi Murmu स्वयं एक आदिवासी महिला हैं, तब आदिवासी महिलाओं को इस हद तक जाने की नौबत क्यों आ रही है?

यह विरोध केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नैतिकता और लोकतंत्र की परीक्षा है।

मीडिया और संस्थाओं की चुप्पी

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि:

  • यह मुद्दा मुख्यधारा मीडिया से लगभग गायब है
  • संसद और विधानसभा में इसकी चर्चा नगण्य है

ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि प्रभावित लोग समाज के सबसे हाशिये पर खड़े हैं—आदिवासी, गरीब और राजनीतिक रूप से कमजोर।

निष्कर्ष: क्या मिलेगा न्याय?

छतरपुर की ये महिलाएं केवल अपने गांव, जंगल और नदी के लिए नहीं लड़ रहीं—वे उस अधिकार के लिए लड़ रही हैं जो उन्हें संविधान देता है: सम्मानजनक जीवन का अधिकार

लेकिन सवाल अब भी कायम है:
क्या इनकी आवाज़ सत्ता तक पहुंचेगी?
या ये महिलाएं यूँ ही अर्थी सजाकर न्याय की गुहार लगाती रहेंगी?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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