March 31, 2026 1:26 am
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“हमें भाषण नहीं, ज़िंदा रहने का अधिकार चाहिए”

2026 के 80 दिनों में 41 सीवर मौतों के खिलाफ जंतर-मंतर पर सफाई कर्मियों का प्रदर्शन। सरकार पर आंकड़े छुपाने का आरोप, PM से माफी और ठोस योजना की मांग।

80 दिन में सीवर-सेप्टिक टैंकों में 41 मौतें: जंतर-मंतर पर फूटा गुस्सा

2026 के महज़ शुरुआती 80 दिनों में सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करते हुए 41 लोगों की मौत—यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसे लगातार छुपाया जा रहा है। इसी के खिलाफ पिछले दिनों Safai Karmachari Andolan (SKA) के बैनर तले देशभर से आए सफाई कर्मियों ने Jantar Mantar पर विरोध प्रदर्शन किया।

धरना, रैली और आक्रोश के बीच एक ही मांग बार-बार गूंज रही थी—
“प्रधानमंत्री माफी मांगो” और “हमें मारना बंद करो”

“भाषण नहीं, काम करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए”

प्रदर्शन में शामिल सफाई कर्मियों का गुस्सा साफ था। उनका कहना था कि सरकार सिर्फ भाषण देती है, योजनाओं का दावा करती है, लेकिन ज़मीन पर हालात जस के तस हैं।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक और रमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन ने कहा—

हमें भाषण देने वाला प्रधानमंत्री नहीं चाहिए, हमें हमारे लिए काम करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए।

यह गुस्सा सीधे तौर पर Narendra Modi की ओर निर्देशित था, जिनसे माफी मांगने और जवाबदेही तय करने की मांग की गई।

“क्या 2026 में भी इंसान सीवर में मरते रहेंगे?”

धरने के दौरान एक बड़ा सवाल बार-बार उठाया गया—
क्या आज़ादी के इतने सालों बाद भी भारत में लोग सीवर में मरते रहेंगे?

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार आंकड़ों में हेरफेर कर रही है और मौतों की असली संख्या छुपाई जा रही है।
उनका कहना है कि संसद में सवाल उठते हैं, मेमोरेंडम दिए जाते हैं, लेकिन जवाब नहीं मिलता।

“मुआवज़ा नहीं, ज़िंदगी चाहिए”

प्रदर्शन में शामिल एक कार्यकर्ता ने साफ कहा—

“हमें 10 लाख, 30 लाख का मुआवज़ा नहीं चाहिए। हमने अपनी जान बिकाऊ नहीं रखी है।”

यह बयान इस आंदोलन की दिशा को स्पष्ट करता है—यह लड़ाई मुआवज़े की नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार की है।

“सरकार के पास पैसा है, लेकिन प्राथमिकता नहीं”

प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि जब सरकार के पास संसाधन हैं, तो सीवर सफाई को पूरी तरह मशीनीकृत क्यों नहीं किया जा सकता?

उनका कहना था कि—

  • टॉयलेट बनाने की योजनाएं बड़े पैमाने पर चलाई जाती हैं
  • लेकिन मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म करने के लिए वैसी ही गंभीरता नहीं दिखती

“सम्मान पांव धोने से नहीं, अधिकार देने से मिलेगा”

प्रदर्शन के दौरान एक और तीखी टिप्पणी सामने आई—

“सम्मान पांव धोने से नहीं मिलता, बराबरी का अधिकार देने से मिलता है।”

यह टिप्पणी उन प्रतीकात्मक कार्रवाइयों पर सवाल उठाती है, जिन्हें सरकार ‘सम्मान’ के तौर पर पेश करती है, लेकिन जिनका ज़मीनी बदलाव से कोई सीधा संबंध नहीं होता।

मुख्य मांगें क्या हैं?

Safai Karmachari Andolan ने प्रधानमंत्री को सौंपे गए मेमोरेंडम में प्रमुख मांगें रखीं:

  1. प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से माफी मांगें
  2. सरकार यह स्वीकार करे कि वह नागरिकों के जीवन की रक्षा में विफल रही है
  3. एक टाइम-बाउंड योजना घोषित की जाए
  4. सीवर और सेप्टिक टैंक में मानव प्रवेश पूरी तरह बंद किया जाए
  5. सफाई कर्मियों के पुनर्वास और स्किल डेवलपमेंट की ठोस योजना बने

“क्या सीवर में मौतें रोकना इतना मुश्किल है?”

इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह तकनीकी रूप से इतना मुश्किल काम है?

प्रदर्शनकारियों का जवाब साफ है—
“बिल्कुल नहीं।”

उनके अनुसार:

  • टेक्नोलॉजी उपलब्ध है
  • संसाधन भी मौजूद हैं
  • कमी सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की है

निष्कर्ष

जंतर-मंतर पर जो आवाज उठी, वह सिर्फ 41 मौतों का शोक नहीं थी—वह एक लंबे समय से जारी अन्याय के खिलाफ चेतावनी थी।
यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि पूरे समाज से है—

क्या हम अब भी उन लोगों को अदृश्य मानते रहेंगे, जिनके श्रम पर हमारी जिंदगी टिकी है?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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