March 29, 2026 11:43 pm
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फिर सामने आया RSS का पाखंड, इज़रायल से प्रेम, ईरान से दूरी!

ईरान पर इज़रायल और अमेरिका के हमले पर RSS की प्रतिक्रिया और BJP सरकार की विदेश नीति का विश्लेषण। क्या भारत अपने पुराने मित्र से दूर हो रहा है?

ईरान पर हमले को लेकर RSS की सोच और भारत की विदेश नीति पर सवाल

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की हरियाणा में आयोजित ऑल इंडिया प्रतिनिधि सभा में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिए गए। यह बैठक संघ परिवार की नीतियों को तय करने वाला सबसे बड़ा मंच मानी जाती है। इसी बैठक के संदर्भ में ईरान पर इज़रायल और अमेरिका के संयुक्त हमले पर RSS की राय सामने आई है, जो भारत की विदेश नीति और उसके नैतिक रुख पर कई सवाल खड़े करती है।

खामेनेई की मौत और ‘साम्प्रदायिक सौहार्द’ का सवाल

RSS की ओर से कहा गया कि आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर शोक मनाना गलत नहीं है, क्योंकि शोक हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि इससे साम्प्रदायिक सौहार्द प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह बयान अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत होता है—क्योंकि किसी विदेशी नेता की मृत्यु पर शोक व्यक्त करना भारत के भीतर साम्प्रदायिक तनाव से कैसे जुड़ सकता है, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

BJP सरकार को समर्थन और विदेश नीति पर चुप्पी

RSS ने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार जो कर रही है, वह देशहित में है। लेकिन सवाल यह उठता है कि ईरान पर हमले के मुद्दे पर भारत सरकार का स्पष्ट रुख क्या है?

नरेंद्र मोदी की सरकार ने लंबे समय तक खामेनेई की मृत्यु पर औपचारिक शोक तक व्यक्त नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह एक सामान्य परंपरा मानी जाती है। इसके विपरीत, भारत का झुकाव लगातार इज़रायल की ओर दिखाई देता रहा है—चाहे वह प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा हो या सार्वजनिक सहानुभूति।

भारत-ईरान संबंधों पर असर

भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और व्यापारिक संबंध गहरे रहे हैं। ईरान लंबे समय से भारत के लिए तेल और गैस का महत्वपूर्ण स्रोत भी रहा है।

लेकिन वर्तमान राजनीतिक संकेतों से ईरान को यह संदेश गया है कि भारत अब उसके साथ पहले जैसा खड़ा नहीं है। इसका असर व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ सकता है, विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र में।

साम्राज्यवाद बनाम क्षेत्रीय संतुलन

मूल तर्क यह है कि इज़रायल और अमेरिका की नीतियाँ क्षेत्र में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को बढ़ावा देती हैं। वहीं ईरान अपनी संप्रभुता के तहत आंतरिक सुधारों की कोशिश कर रहा है।

यह इराक युद्ध 2003 की याद दिलाता है, जब Weapons of Mass Destruction के नाम पर इराक पर हमला किया गया था, जो बाद में झूठा साबित हुआ।

भारत की भूमिका: शांति या पक्षधरता?

भारत ऐतिहासिक रूप से एक शांति-प्रिय देश रहा है। ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि वह इस संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाए और युद्धविराम की अपील करे।

लेकिन यदि भारत एक पक्ष विशेष—विशेषकर इज़रायल और अमेरिका—की ओर झुकाव दिखाता है, तो इससे न केवल उसकी वैश्विक छवि प्रभावित होती है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन भी बिगड़ सकता है।

निष्कर्ष

RSS द्वारा BJP सरकार की नीतियों का समर्थन और ईरान मुद्दे पर अस्पष्टता यह संकेत देती है कि भारत की विदेश नीति में संतुलन की कमी आ रही है। ईरान जैसे पुराने मित्र देश से दूरी बनाना भारत के रणनीतिक हितों के खिलाफ हो सकता है।

आज जरूरत है कि भारत अपने ऐतिहासिक मूल्यों—शांति, संतुलन और कूटनीतिक स्वतंत्रता—को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट और निष्पक्ष रुख अपनाए।

राम पुनियानी

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