जेवर एयरपोर्ट कार्यक्रम: भीड़ जुटाने की मजबूरी या लोकप्रियता पर सवाल?
उत्तर प्रदेश के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन को एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में इस परियोजना को विकास के बड़े प्रतीक के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन इस कार्यक्रम को लेकर जिस तरह की तैयारियाँ और आरोप सामने आए, उन्होंने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भीड़ जुटाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल?
रिपोर्ट्स और वायरल दस्तावेज़ों के अनुसार, उद्घाटन समारोह में भीड़ जुटाने के लिए प्रशासन को एक हफ्ते पहले से सक्रिय होना पड़ा। बताया गया कि 800 से अधिक स्कूल बसों का इंतज़ाम किया गया और कई स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद भी कराया गया। यह सवाल उठता है कि अगर कार्यक्रम इतना लोकप्रिय और ऐतिहासिक था, तो क्या लोगों की स्वाभाविक भागीदारी पर्याप्त नहीं थी?
यूनिवर्सिटी छात्रों को लाने के आरोप
सबसे ज्यादा विवाद गल्गोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़ा। एक कथित ईमेल वायरल हुआ जिसमें छात्रों को निर्देश दिया गया:
- सुबह तय समय पर कैंपस पहुंचना अनिवार्य
- यूनिफॉर्म में न आने की सलाह
- कार्यक्रम में भागीदारी के बदले दो दिन की अटेंडेंस का प्रलोभन
यह भी दावा किया गया कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों को हजारों छात्रों को लाने का “टारगेट” दिया गया था। अगर यह सही है, तो यह शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और छात्रों की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
स्वैच्छिक समर्थन या ‘मैनेज्ड’ भीड़?
राजनीतिक रैलियों और सरकारी कार्यक्रमों में भीड़ जुटाना नया नहीं है, लेकिन जब यह काम प्रशासनिक आदेशों और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
क्या यह मान लिया जाए कि:
- नेताओं की लोकप्रियता अब स्वतः भीड़ नहीं खींच पा रही?
- या फिर “बड़ी तस्वीर” दिखाने के लिए भीड़ का प्रबंधन एक सामान्य राजनीतिक रणनीति बन चुकी है?
शिक्षा बनाम राजनीति
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि छात्रों को शिक्षा से हटाकर राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए प्रेरित—या बाध्य—किया जा रहा है।
क्या विश्वविद्यालयों का काम ज्ञान देना है या भीड़ बनाना?
निष्कर्ष
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन निस्संदेह एक महत्वपूर्ण विकास परियोजना है। लेकिन उससे जुड़े विवाद यह संकेत देते हैं कि विकास की कहानी के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थानों की भूमिका पर भी गंभीर बहस की ज़रूरत है।
