सरकार से सवाल पूछने वाले कई फेसबुक पेज भारत में ब्लॉक
हाल के दिनों में भारत में डिजिटल स्पेस पर बढ़ती सेंसरशिप को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म, व्यंग्यकारों और पत्रकारों के सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक या प्रतिबंधित किए जाने की घटनाएँ सामने आई हैं। यह केवल कुछ पेज बंद होने का मामला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा सवाल है।
फेसबुक पेजों पर कार्रवाई: आलोचना या असहमति का दमन?
सूत्रों के अनुसार, कई प्रमुख फेसबुक पेज—जिनमें मोलिटिक्स, नेशनल दस्तक और कॉमेडियन राजीव निगम का पेज शामिल है—को भारत में ब्लॉक कर दिया गया है।
इन पेजों की खासियत यह थी कि ये मुख्यधारा मीडिया से अलग जाकर सरकार से जुड़े सवाल उठाते थे। खासकर राजीव निगम जैसे कलाकार व्यंग्य और हास्य के माध्यम से सत्ता की आलोचना करते रहे हैं।
इस कार्रवाई के बाद विपक्ष, विशेषकर Indian National Congress ने नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आलोचना से डरकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।
केवल फेसबुक नहीं: व्यापक स्तर पर डिजिटल नियंत्रण
यह मामला केवल फेसबुक पेज तक सीमित नहीं है। हाल के समय में कई और घटनाएँ सामने आई हैं:
- फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो को हटाया गया
- महाराष्ट्र के यूट्यूबर मुकेश मोहन पर ₹50 करोड़ का मानहानि मुकदमा
- ट्विटर (अब X) और यूट्यूब पर बड़े पैमाने पर कंटेंट हटवाना
- आलोचनात्मक पोस्ट्स पर एफआईआर और कानूनी कार्रवाई
ये घटनाएँ संकेत देती हैं कि डिजिटल स्पेस में असहमति की आवाज़ों को सीमित करने का एक पैटर्न बनता जा रहा है।
कानूनी ढांचा और सरकार की बढ़ती शक्तियाँ
वर्तमान में Ministry of Electronics and Information Technology (IT मंत्रालय) के पास आईटी कानूनों के तहत ऑनलाइन कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने का अधिकार है।
हालांकि, रिपोर्ट्स के अनुसार अब सरकार इस शक्ति को अन्य मंत्रालयों तक भी विस्तारित करने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह डिजिटल सेंसरशिप को और व्यापक बना सकता है।
सोशल मीडिया: आखिरी स्वतंत्र मंच?
मुख्यधारा मीडिया पर पहले से ही पक्षपात और दबाव के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बना हुआ था जहाँ स्वतंत्र पत्रकार, एक्टिविस्ट और आम नागरिक अपनी बात रख सकते थे।
लेकिन जब:
- अकाउंट ब्लॉक होने लगें
- पोस्ट हटाए जाने लगें
- कानूनी दबाव बढ़े
तो सवाल उठता है—क्या यह मंच भी धीरे-धीरे नियंत्रण में लाया जा रहा है?
लोकतंत्र बनाम सेंसरशिप
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना कोई अपराध नहीं, बल्कि एक आवश्यक प्रक्रिया है।
यदि सत्ता से सवाल पूछने वालों को:
- चुप कराया जाए
- डराया जाए
- या कानूनी जाल में फंसाया जाए
तो यह केवल डिजिटल सेंसरशिप नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने का संकेत है।
निष्कर्ष
डिजिटल सेंसरशिप का यह बढ़ता ट्रेंड केवल कुछ पेजों या व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित है?
सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह आलोचना को लोकतंत्र का हिस्सा माने, न कि खतरा।
