March 2, 2026 7:25 am
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राष्ट्र गीत के नाम पर समाज को बांटने की चाल तो नहीं चली जा रही!

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री मोदी के बयान से नया विवाद खड़ा हुआ। जानिए संविधान सभा ने क्यों केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया और इस निर्णय का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है।

‘वंदे मातरम’ पर नया विवाद: इतिहास क्या कहता है और संविधान सभा ने क्या निर्णय लिया था!

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से एक नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि “वंदे मातरम गीत को तोड़ दिया गया, इसके टुकड़े किए गए, और इसी विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिए।”

यह टिप्पणी न केवल राजनीतिक बहस को जन्म दे गई बल्कि कई टीवी चैनलों पर इस बात पर बहस होने लगी कि क्या ‘वंदे मातरम’ को पूरा गाया जाना चाहिए और क्या यह हिंदू अस्मिता से जुड़ा गीत है।

लेकिन इतिहास और तथ्यों के अनुसार मामला इससे कहीं अधिक जटिल और सटीक है।

‘वंदे मातरम’ की उत्पत्ति और संदर्भ

यह गीत बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में लिखा था। यह उपन्यास ब्रिटिश काल में रचा गया था और इसकी कहानी उन क्रांतिकारियों की है जो राजा के शासन से मुक्ति पाना चाहते थे।

उपन्यास में दिखाया गया कि इन क्रांतिकारियों की सफलता का अंत मुस्लिम शासक के शासन से मुक्ति और ब्रिटिश शासन की स्थापना के रूप में प्रस्तुत होता है। यही वह हिस्सा है जो उपन्यास के विचार और टोन को विवादास्पद बनाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका

इसके बावजूद, ‘वंदे मातरम’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक नारे के रूप में अपार लोकप्रियता हासिल की।
जय हिन्द, इंकलाब ज़िंदाबाद, और वंदे मातरम’ – ये तीनों नारे उस दौर में जोश भरने वाले प्रतीक बने।

संविधान सभा में विवाद और फैसला

जब आज़ादी के बाद संविधान सभा में यह तय करना था कि भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song) और राष्ट्रीय गान (National Anthem) क्या होगा, तो इस पर गंभीर बहस हुई।

मोहम्मद अली जिन्ना ने पहले ही ‘वंदे मातरम’ को हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बताते हुए इसे अस्वीकार किया था। इस संदर्भ में संविधान सभा के सामने यह चुनौती आई कि क्या भारत, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर रहा था, ऐसे गीत को अपना राष्ट्रगान बनाए।

नेहरू, टैगोर और संविधान सभा की भूमिका

जवाहरलाल नेहरू और रवीन्द्रनाथ टैगोर दोनों ने यह माना कि ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद पूरे भारत की भूमि और मातृभूमि की वंदना करते हैं, जबकि बाद के पदों में देवी-देवताओं जैसे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की आराधना है।

इसीलिए, टैगोर की राय के आधार पर राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल पहले दो पदों को अपनाने का प्रस्ताव रखा गया।

संविधान सभा की National Anthem Committee, जिसमें बी.आर. अम्बेडकर, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और अन्य सदस्य शामिल थे, ने तीन गीतों पर विचार किया:

  1. सारे जहाँ से अच्छा
  2. वंदे मातरम
  3. जन गण मन

अंततः निर्णय हुआ कि:

  • ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान (National Anthem) के रूप में स्वीकृत किया जाएगा।
  • ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत (National Song) के रूप में सम्मान दिया जाएगा।

‘जन गण मन’ के चयन के कारण

‘जन गण मन’ में भारत की विविधता, भाषाई-सांस्कृतिक समावेशिता और संपूर्णता की भावना स्पष्ट झलकती है।
उसकी धुन (ट्यून) अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गाए जाने योग्य और 52 सेकंड में पूर्ण होने के कारण अधिक व्यावहारिक भी थी।

विभाजन का कारण ‘वंदे मातरम’ नहीं था

प्रधानमंत्री के बयान के विपरीत, देश का विभाजन ‘वंदे मातरम’ से नहीं, बल्कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति, मुस्लिम लीग के धार्मिक राष्ट्रवाद, और हिंदू महासभा व आरएसएस के हिंदू राष्ट्रवाद की टकराती विचारधाराओं से हुआ।

संविधान सभा का निर्णय न तो जिन्ना के दबाव में लिया गया था, न ही किसी तुष्टीकरण के तहत — बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान को संरक्षित रखने के उद्देश्य से लिया गया था।

आज के विवाद का सार

आज जिस तरह वंदे मातरम को लेकर नई बहसें खड़ी की जा रही हैं — कि नेहरू ने इसे जिन्ना के कहने पर ‘तोड़ा’ — वह तथ्यात्मक रूप से गलत है।

यह निर्णय संविधान सभा और उसकी समिति का सामूहिक निर्णय था।
वंदे मातरम का आदर किया जाना चाहिए, लेकिन उसके पहले दो पदों को अपनाना ही भारत के संविधान और उसके धर्मनिरपेक्ष चरित्र के अनुरूप है।

निष्कर्ष

भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ – दोनों ही भारत की आत्मा के दो अलग लेकिन पूरक रूप हैं।
एक विविधता और एकता का प्रतीक है, तो दूसरा भूमि और मातृभूमि के प्रति प्रेम का।

इन दोनों का सम्मान ही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और संवैधानिक दृष्टि का सम्मान है।

राम पुनियानी

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