अमेरिका को सैन्य इस्तेमाल से इनकार, तटस्थता की नई मिसाल
भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका ने हाल के घटनाक्रम में एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और तटस्थ रुख को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे इस छोटे देश ने कथित तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के सैन्य विमानों को अपने नागरिक हवाई अड्डों पर उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने श्रीलंका से अनुरोध किया था कि उसके दो सैन्य विमान श्रीलंका के सिविलियन एयरपोर्ट पर उतर सकें। यह अनुरोध ऐसे समय में आया जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है, खासकर ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।
लेकिन श्रीलंका के नेतृत्व, विशेषकर राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे (या हालिया संदर्भ में नेतृत्व व्यवस्था), ने स्पष्ट कर दिया कि उनका देश इस संघर्ष में किसी भी पक्ष का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने इस अनुरोध को ठुकराते हुए कहा कि श्रीलंका अपनी भूमि और हवाई अड्डों का इस्तेमाल किसी युद्ध या सैन्य अभियान के लिए नहीं होने देगा।
‘छोटा देश, बड़ा फैसला’
श्रीलंका का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लंबे समय से आर्थिक संकट से गुजर रहा है। ऐसे में किसी बड़े वैश्विक शक्ति के दबाव में आना आसान हो सकता था। लेकिन इस फैसले ने दिखाया कि:
- संप्रभुता (Sovereignty) केवल आर्थिक ताकत पर निर्भर नहीं करती
- मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति छोटे देशों को भी बड़ी शक्तियों के सामने खड़ा होने का साहस देती है
- तटस्थता (Neutrality) एक सक्रिय और साहसिक नीति हो सकती है
सऊदी अरब और तुलना
इस संदर्भ में सऊदी अरब की भूमिका की तुलना भी की जा रही है, जिसने अतीत में अपने हवाई क्षेत्र और ठिकानों को अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए उपलब्ध कराया है, खासकर ईरान के खिलाफ क्षेत्रीय तनाव के दौरान।
इसके विपरीत, श्रीलंका ने साफ संकेत दिया कि वह किसी भी महाशक्ति के सैन्य एजेंडे का हिस्सा नहीं बनेगा।
भारत और क्षेत्रीय संदर्भ
यह घटनाक्रम भारत के लिए भी अहम है, क्योंकि श्रीलंका हिंद महासागर क्षेत्र में एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश है। भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक संबंध रहे हैं।
अतीत में ऐसे भी मौके आए हैं जब क्षेत्रीय संकटों में देशों के रुख पर सवाल उठे। उदाहरण के तौर पर, ईरान से जुड़े घटनाक्रमों में भारत की भूमिका पर भी बहस होती रही है। इसके उलट, श्रीलंका ने कई मौकों पर मानवीय सहायता और तटस्थता का संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
वैश्विक राजनीति में संदेश
श्रीलंका का यह फैसला केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संदेश भी है:
- छोटे देश भी अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से तय कर सकते हैं
- ‘नॉन-अलाइनमेंट’ (गुटनिरपेक्षता) आज भी प्रासंगिक है
- वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश अपनी शर्तों पर संबंध तय करना चाहते हैं
निष्कर्ष
श्रीलंका का यह ‘बिग नो’ उस दौर में आया है जब दुनिया फिर से ध्रुवीकृत (polarized) हो रही है। ऐसे समय में तटस्थता और संप्रभुता पर जोर देना न केवल साहसिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
